अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)
Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary
महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा
पृष्ठ 115, कुल 337 में से
संदर्भ में पढ़ें(54) अगस्त्य-संहिता
सान्निध्याधारयोगेन नियतेन षडात्मना। व्यवस्थिताय रामाय नमोऽनन्ताय विष्णवे¹।।18।। श्रीबीजाद्योऽपि सीतायै स्वाहान्तोऽयं षडक्षरः। तदेतन्मन्तरूपाय रामाय ज्योतिषे नमः।।19।। ॐ रां रां यजामहे, ॐ ह्रीं आत्मने नमः, ॐ रामाय नमः, ॐ ससीताय नमः। सान्निध्य और आधार के संयोग से नियत रूप में जो छह स्वरूपों में स्थित हैं, ऐसे श्रीराम को प्रणाम। ॐ अनन्ताय नमः, ॐ विष्णवे नमः, ॐ श्रीं सीतायै स्वाहा ये षडक्षर मन्त्र हैं। इन मन्त्रों के स्वरूप ज्योतिःस्वरूप राम को प्रणाम। सानुस्वारस्वरान्ताय वह्नये हृदयाय च। नमश्चैव स्वरान्ताय स्वाहान्ताय कृशानवे।।20।। शिरसेऽप्यग्नये चान्तः शिखायै वषडात्मने।। ऐमस्त्राय हृदे नित्यं कवचाय हुं ते नमः²।।21।। चतुर्दशस्वरान्ताय सानुस्वाराय वह्नये।। नेत्राभ्यां वौषडान्ताय परोऽस्त्राय, फडत्मने।।22।। अनुस्वार के साथ अन्त में रेफ लगाकर वह्निदेव से न्यस्त हृदय को प्रणाम। वृद्धि के स्वामी अग्नि को प्रणाम। (एधेश्वराय कृशानवे स्वाहा) शिर पर न्यस्त वकार सहित अग्नि को प्रणाम (वं अग्नये शिरसे स्वाहा) वषट्कार जो शिखा पर न्यस्त हैं उन्हें प्रणाम। (‘शिखायै वषट्’) ऐं सहित वह्नि, जो नित्य कवच स्वरूप हैं उन्हें प्रणाम (ऐं वह्नये कवचाय हुम्) अनुस्वार सहित चतुर्दश स्वरों के साथ वह्नि जो वौषट् स्वरूप दोनों नेत्रों में न्यस्त हैं उन्हें प्रणाम (अं आं इं ईं उं ऊं ऋं ॠं लृं लॄं एं ऐं ओं औं वह्नये नेत्राभ्यां वौषट्) इसके बाद फट् स्वरूप अस्त्र को प्रणाम (अस्त्राय फट्) एवं नमः षडङ्गाय रामाय ज्योतिषे नमः। आत्मान्तरात्मपरमज्ञानात्मभ्योऽग्नितः क्रमात्।।23।। इस प्रकार आत्मा, अन्तरात्मा, परमात्मा, ज्ञानात्मा स्वरूप जो ज्योतिः स्वरूप राम क्रमशः अग्नि, नैर्ऋत्य, वायव्य और ईशान कोण में स्थित हैं, उन्हें प्रणाम। निवृत्त्यै च प्रतिष्ठायै विद्यायै ते नमाम्यहम्। शान्त्यै चात्मादिशक्तित्वे स्थित्यै तद्रूपिणे नमः।।24।।
- घ. वह्नये। 2. घ. हुमेव च।