अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)
Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary
महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा
प्रस्तावना एवं संहिता मंगलाचरण
अगस्त्य संहिता रामोपासना का प्राचीनतम आगमशास्त्र सम्पादक पं. भवनाथ झा यंत्राद्बहिः प्रदेशेतुवृत्ताकारंयथालिखेत् सर्वदोषशमनंसर्वोपद्रवनाशनम् ७९ आयुरारोग्य मैश्वर्यंपुत्रपौत्रप्रवर्द्धनंम् सर्वान्कामानवाप्नोति विष्णुलोके सगच्छति ७६ इतिअगस्त्यसंहिता यांपरमहंसेहनुमन्मंत्रेजय३श्रीरामकवचोद्धारकथनंनामद्वाविंशोध्यायः॥ ३२ श्लोकसंख्या २०००० लिख्यंतंलालासीतारामश्रीचित्रकूटस्थानेश्रीरामजीरामघाटमंदिराकिनीपैसुरनीतरेसंगमेः ॥ पुस्तकंशीश्रीश्रीश्रीमहंतआचार्यवलभद्रदासजीकीबैसाखवदि १२ संवत् १८०२ रामःरामः रामः महावीर मन्दिर प्रकाशन
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महावीर मन्दिर प्रकाशन माला का 25वाँ पुष्प अगस्त्य - संहिता रामोपासना का प्राचीनतम वैष्णवागमशास्त्रीय ग्रन्थ सम्पादक पं. भवनाथ झा आमुख लेखन आचार्य किशोर कुणाल महावीर मन्दिर प्रकाशन
प्रकाशक : महावीर-मन्दिर-प्रकाशन पाणिनि परिसर, बुद्धमार्ग, पटना-800 001 प्रथम संस्करण श्रीकृष्णजन्माष्टमी, संवत् 2066 (2009 ई०) स्वत्वाधिकार सुरक्षित मूल्य : पेपरबैक - 50 रुपये पुस्तकालय संस्करण- 200 रुपये प्राप्तिस्थान : धर्मग्रन्थ विक्रय केन्द्र, महावीर मन्दिर, पटना मुद्रक : प्रकाश ऑफसेट, धरहरा कोठी, पटना
आमुख – आचार्य किशोर कुणाल 'अगस्त्य-संहिता' रामोपासना का महत्त्वपूर्ण एवं प्राचीन वैष्णवागम- शास्त्रीय ग्रन्थ है। इसका उल्लेख हेमाद्रि के 'चतुर्वर्ग-चिन्तामणि' से लेकर आधुनिक काल तक के शास्त्रीय ग्रन्थों में हुआ है। हेमाद्रि (13वीं शती) ने 'चतुर्वर्ग- चिन्तामणि' में; माधवाचार्य (14वीं शती) ने 'कालमाधव' में; मिथिला के महेश ठाकुर (16वीं शती) ने 'तिथितत्त्वचिन्तामणि' में तथा कमलाकर भट्ट (17वीं शती) ने 'निर्णयसिन्धु' में रामनवमी-तिथि के निर्धारण के प्रसंग में इसके सुसंगत श्लोकों को उद्धृत किया है। मिथिला के प्रसिद्ध आगमाचार्य देवनाथ ठाकुर ने 1564 ई. में 'मन्त्रकौमुदी' की रचना की, जिसमें उन्होंने पाँच स्थलों पर आगमशास्त्र के विभिन्न सिद्धान्तों और विधियों के प्रमाण के रूप में 'अगस्त्य-संहिता' को उद्धृत किया है। हेमाद्रि के 'चतुर्वर्ग-चिन्तामणि' में इसके कम से कम 32 श्लोक उद्धृत किये गये हैं। किन्तु आधुनिक काल में 'अगस्त्य-संहिता' की सर्वाधिक चर्चा रामानन्दाचार्य के चरित-लेखन के सन्दर्भ में हुई है। हिन्दी साहित्य के इतिहासकारों ने इस ग्रन्थ को उद्धृत करते हुए रामानन्दाचार्य का काल प्रामाणिक स्रोत के आधार पर निर्धारित करने का दावा किया है। किन्तु शोध के उपरान्त पाया गया कि मूल 'अगस्त्य-संहिता में रामानन्दाचार्य की कोई चर्चा नहीं है। यह चर्चा हो भी नहीं सकती है; क्योंकि 'अगस्त्य-संहिता' रामानन्दाचार्य से बहुत पहले की शास्त्रीय रचना है। 'दलित-देवो भव' पुस्तक में रामानन्दाचार्य की जीवनी लिखने के सन्दर्भ में मूल 'अगस्त्य संहिता' के अन्वेषण की आवश्यकता पड़ी। अनेक विद्वानों द्वारा लिखी हुई रामानन्द-जीवनी में यह पढ़ने को मिला था कि 'अगस्त्य-संहिता' के आधार पर रामानन्दाचार्य का जन्म सन् 1299 ई० में हुआ था। इसके समर्थन में 'अगस्त्य-संहिता' के ये श्लोक भी उद्धृत किये जाते रहे हैं-
खं 'नभो' 'वेद'⁴ 'वेद'⁴ प्रमिते वर्षे गते कलौ। माघकृष्णस्य सप्तम्यां शुभधर्मप्रवर्तकः।। सप्तदण्डोद्गते सूर्ये सिद्धयोगयुजि प्रभुः। नक्षत्रे त्वाष्ट्रदैवत्ये कुम्भलग्ने शुभग्रहे।। आविर्भूतो महायोगी द्वितीय इव भास्करः। रामानन्द इति ख्यातो लोकोद्धरणकारणः।। अर्थात् कलियुग के 4400 वर्ष बीत जाने पर माघ कृष्ण पक्ष की सप्तमी तिथि के शुभ दिन में सूर्य भगवान् के सात दण्ड चढ़ने पर सिद्ध योग-युक्त चित्रा नक्षत्र तथा कुम्भ लग्न और सभी ग्रहों के शुभ स्थान में होने पर दूसरे सूर्य के समान महायोगी रामानन्द का आविर्भाव हुआ, जो लोगों का उद्धार करनेवाले थे। पूरे रामानन्द सम्प्रदाय में भी स्वामीजी का जन्म इसी दिन माना जाता है। अतः इसकी प्रामाणिकता में सन्देह का कोई अवकाश नहीं था। किन्तु बहुत-से समीक्षकों की यह टिप्पणी जब पढ़ने को मिलती थी कि 1299 ई० में जन्मे रामानन्दाचार्य कबीर और रैदास के गुरु कैसे हो सकते थे, जो क्रमशः 1518 और 1527 ई० तक जीवित रहे। इस तर्क में भी दम दीखता था। पूरी मध्यकालीन परम्परा कबीर और रैदास को रामानन्द का शिष्य मानती रही है; अतः इन दो 'सत्यों' के बीच सामंजस्य बैठाने के लिए मूल 'अगस्त्य-संहिता' का अन्वेषण प्रारम्भ हुआ और प्रस्तुत प्रकाशन का बीज-वपन हुआ। इस मूल 'अगस्त्य-संहिता' में 32 अध्याय हैं और पुष्पिका में ग्रन्थ-समाप्ति की घोषणा है। किन्तु किसी-किसी पाण्डुलिपि में 33वाँ अध्याय भी है, जिसमें सभी देवों की एकत्र की पूजा की पद्धति है। अयोध्या के प्रसिद्ध सन्त बलभद्र दास ने 'वैष्णवमताब्ज-भास्कर' एवं 'रामार्चन-पद्धति' की प्रस्तावना 'प्रस्तुत प्रसंग' में अगस्त्य-संहिता की चर्चा की है और इसमें 33 अध्याय बतलाये हैं। हैन्स बेकर की पुस्तक 'अयोध्या' में भी 33वें अध्याय का उल्लेख है। किन्तु अधिकतर प्रकाशित पुस्तकों एवं पाण्डुलिपियों में यह 32 अध्यायों का ही ग्रन्थ बतलाया गया है; अतः उतने को ही मूल ग्रन्थ में प्रकाशित किया गया है। पाठकों की जिज्ञासा-शान्ति के लिए 33वें सर्ग के कुछ श्लोक, जो हैन्स बेकर की पुस्तक 'अयोध्या' में उद्धृत हैं, भूमिका में संकलित किये गये हैं। Rarest Archiver
अगस्त्य-संहिता सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय में 'अगस्त्य-संहिता' की अनेक पूर्ण-अपूर्ण पाण्डुलिपियाँ उपलब्ध हैं; उनमें से एक पाण्डुलिपि 'अगस्त्य-संहिता' के 41वें अध्याय की बतलायी गयी है; स्पष्टतः यह किसी परवर्ती कवि की रचना है। इस 'अगस्त्य-संहिता' में किसी विद्वान् ने 5 अध्यायों का प्रक्षेप जोड़ा. है, जिसे 'अगस्त्य-संहिता' के उत्तर-खण्ड में 131वें से 135वें अध्याय का बतलाया गया है। इसे पहले भविष्योत्तर-खण्ड का बतलाया गया था। किन्तु 'अगस्त्य-संहिता' में भविष्य या भविष्योत्तर-खण्ड है या नहीं, यह विवेच्य है। वस्तुतः यह ग्रन्थ खण्डों में विभक्त है ही नहीं। इसमें 32 या अधिकतम 33 अध्याय हैं। फिर 131 से 135 अध्याय कहाँ से टपक पड़े? और बीच के अध्याय कहाँ लुप्त हो गये? बलभद्र दास ने लिखा है कि जिसने पाँच अध्यायों का यह क्षेपक जोड़ा है, उसने 'अगस्त्य-संहिता' का दर्शन भी नहीं किया था। मैं भी इससे सहमत हूँ। उसे इतना ही ज्ञात था कि यह संहिता अगस्त्य-सुतीक्ष्ण संवाद के रूप में है; क्योंकि 'अगस्त्य-संहिता' को 'अगस्त्य-सुतीक्ष्ण संवाद' के नाम से भी जाना जाता था। सचमुच, प्रक्षेपक को 'अगस्त्य-संहिता' का दर्शन हुआ होता, तो वह प्रक्षिप्त अंश को 33वें अध्याय से प्रारम्भ करता! किन्तु इस अंश का प्रक्षेपक कौन है? क्या यह गुजरात-राजस्थान की कारयित्री प्रतिभा की परिणति है? या पं० रामनारायण दास हैं, जिन्होंने 1898 ई० में 'अगस्त्य-संहिता' का प्रकाशन लखनऊ से किया था और 1906 ई० में 'रामानन्द जन्मोत्सव कथा' के नाम से पुस्तक का सम्पादन किया था, जिसमें 'वैश्वानर संहिता' और 'श्रीरामानन्दभवोत्सा्राष्टकम्' भी समाविष्ट थे। इस पुस्तक में पण्डित रामनारायण दास ने लिखा था कि यह 'रामानन्दजन्मोत्सव कथा' 'अगस्त्य-संहिता' के भविष्य खण्ड में 131-135 अध्यायों में वर्णित है। इस पुस्तक को डाकोर, गुजरात के वैष्णवरामदासजी ने मुंबई से 1906 ई. में छपवाया। प्रसिद्ध इतिहासकार डी.आर. भण्डारकार ने अपनी पुस्तक 'वैष्णविज्म, शैविज्म एण्ड माइनर रिलीजियस सिस्टम्स' में पहली बार यह लिखा कि उन्हें रामानन्दाचार्य के जन्म की तिथि प्रामाणिक स्रोत से प्राप्त हो गयीं है और इस स्रोत का नाम 'अगस्त्य-संहिता' बतलाया। तबसे इस देश के अधिकतर लेखकों एवं समीक्षकों ने मूल स्रोत की जाँच किये बिना रामानन्दाचार्य का जीवन-वृत्त 'अगस्त्य-संहिता' के फर्जी अंश के आधार पर प्रस्तुत किया है। किन्तु पं. रामनारायण दास इस फर्जी अंश के प्रक्षेपक नहीं हो सकते; क्योंकि उन्हें यदि यह अंश जोड़ना होता, तो 1898 ई. में ही इसका सम्पादन करते समय जोड़ देते। किन्तु 1898 ई. में उनके द्वारा सम्पादित 'अगस्त्य-संहिता' में कोई प्रक्षेप
नहीं है। 1903 ई. में जब अयोध्या के ही दूसरे प्रसिद्ध सन्त रूपकलाजी ने नाभादास के 'भक्तमाल' का सम्पादन कर उसपर तिलक टीका लिखी, जब उन्होंने इस तथ्य का उल्लेख किया कि रामानन्दाचार्य की जीवनी 'अगस्त्य-संहिता' के भविष्योत्तर खण्ड में मिलती है और यह वृत्तान्त उन्होंने काशी की कुंजगली में हजारीलाल गणेश प्रसाद के घर में पढ़ा था और यह पोथी 1878 ई. में सूर्यप्रभाकर छापाखाने में छपी थी। रूपकलाजी ने रामानन्दाचार्य की जीवनी में जो श्लोक उद्धृत किये गये हैं, वे 'अगस्त्य-संहिता' के प्रक्षिप्त अंश के ही हैं और उसका हिन्दी अनुवाद भी श्री सीताराम महाराज ने रामरसरंगमणिजी द्वारा कराकर 'श्रीरामानन्द-यशावली' के नाम से छपवाया था। अतः 'अगस्त्य-संहिता' में यह प्रक्षेप 1876 ई. में जुड़ चुका था। अतः इसके प्रक्षेपक रामनारायण दास नहीं हो सकते। सूक्ष्म दृष्टि से अवलोकन करने पर पता चलता है कि 'रामानन्दजन्मोत्सव कथा' (अगस्त्य-संहिता के प्रक्षिप्त अंश), 'वैश्वानर संहिता' और 'श्रीरामानन्दभवोत्साष्टकम्' के लेखक एक ही विद्वान् प्रतीत होते हैं; क्योंकि तीनों की भाषा एवं भाव में साम्य है। तीनों रचनाओं में रामानन्दाचार्य के प्रति असीम श्रद्धा का भाव है और तीनों रचनाएँ एक ही पुस्तक में छपी हैं। पहली रचना यानी 'अगस्त्य-संहिता' का तथाकथित भविष्य खण्ड 1878 ई. में छप चुका था और 'रामानन्दजन्मोत्साहाष्टकम्' की रचना 1880 ई. (1937 वि) में हुई थी, यह इस अष्टक के 10वें श्लोक में उल्लिखित है। इस श्लोक में रचयिता का नाम भी पण्डित श्रीरामचरण दिया हुआ है। इसमें भी रामानन्दाचार्य के जन्म की वही तिथि दी हुई है; बल्कि इसमें संवत् 1356 वि. मास माघ, पक्ष कृष्ण, तिथि सप्तमी के अलावे भावोत्साह में दिन भी गुरुवार दिया गया है, 'अगस्त्य-संहिता' के प्रक्षिप्त अंश में वर्ष, मास, पक्ष और तिथि का उल्लेख किया गया है; किन्तु दिवस का उल्लेख नहीं है। अष्टक में दिवस भी है और इसकी गणना करने से आचार्य की जन्म-तिथि गलत निकलती है। किन्तु उपर्युक्त सभी तथ्यों के आलोक में यह प्रबल समानता है कि 1880 ई. 'श्रीरामानन्द-भवोत्साहाष्टकम्' के रचनाकार पण्डित श्री रामचरण ने ही अगस्त्य-संहिता में भविष्य-खण्ड के नाम पर पाँच अध्याय 1878 ई. में या इसके पूर्व जोड़े? अब पण्डित श्रीरामचरण कौन हैं? पण्डित श्रीरामचरण नामक कोई विद्वान् अभी ज्ञात नहीं हुआ हैं, किन्तु अयोध्या में जानकीघाट की गुरु-परम्परा में रामचरण दास नामक एक सन्त मिलते हैं। इनके गुरु का नाम रघुनाथ प्रसाद था, जो जानकीघाट के महन्त थे। सं. 1888 वि. (1531 ई.) में माघ शुक्ल नवमी को ये रैवासे से अपने गुरु के पास अयोध्या आये थे।
अगस्त्य-संहिता रामचरणजी द्वारा विरचित ग्रन्थों के नाम 'सीताराम-नवरत्न-संग्रह', 'अष्ट-भाग', 'रस-मालिका' आदि हैं। ये रसिक सम्प्रदाय के महात्मा थे और अयोध्या में रामभक्ति में शृंगार का प्रचार करनेवाले प्रथम सन्त थे। अतः यह प्रश्न उठता है कि क्या रसिक सम्प्रदाय के महात्मा 'श्रीरामानन्द-जन्मोत्सव-कथा' और 'श्रीरामानन्दभवोत्साहाष्टकम्' जैसे ग्रन्थों का रचनाकार हो सकते हैं? क्या महन्त रामचरण दास 1880 ई. तक जीवित थे? इन प्रश्नों के उत्तर तथा अन्य किसी पण्डित श्रीरामचरण की पहचान पर इसका उत्तर निर्भर करता है। उपर्युक्त विवेचन के आधार पर यह स्पष्ट है कि 'अगस्त्य-संहिता' रामोपासना का प्राचीन ग्रन्थ है; जबकि 'अगस्त्य-संहिता' के तथाकथित भविष्य-खण्ड के अध्याय 131-35 में वर्णित रामानन्द जन्मोत्सव-कथा एक प्रक्षिप्त अंश है, जिसमें रामानन्दाचार्य, सन्त कबीर एवं सन्त रैदास की जन्मतिथियाँ गलत रूप से प्रस्तुत हैं। मूल 'अगस्त्य-संहिता' रामोपासना का ऐसा प्रामाणिक धर्मग्रन्थ है, जिसको 12वीं सदी से लगातार इस देश के धर्मशास्त्रियों ने रामार्चना, विशेषकर रामनवमी के सन्दर्भ में उद्धृत किया है। प्राचीन काल में 'रामतापनीयोपनिषद्', बुधकौशिक-विरचित 'रामरक्षास्तोत्र' एवं 'अगस्त्य-संहिता' की गणना रामोपासना के प्रमुख ग्रन्थों में की जाती है। इस महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ 'अगस्त्य-संहिता' का सम्पादन एवं हिन्दी-अनुवाद महावीर मन्दिर के मूर्द्धन्य विद्वान् पं. भवनाथ झा ने किया है। संस्कृत भाषा, साहित्य, व्याकरण एवं अन्य शास्त्रों पर भवनाथजी की जो पकड़ है, वह प्रशंसनीय है। पूरे देश में इनकी टक्कर के विद्वान् बहुत कम मिलेंगे। अतः सम्पादन एवं अनुवाद की प्रामाणिकता में कोई संशय नहीं रह जाता। महावीर मन्दिर प्रकाशन महत्त्वपूर्ण ग्रन्थों का प्रकाशन बहुत कम मूल्य पर करता रहा है, उसी कड़ी में 'अगस्त्य-संहिता' का यह प्रकाशन आपके समक्ष प्रस्तुत है। आशा है कि इसको पढ़ने के बाद पाठक अब इस भ्रान्ति में नहीं पड़ेंगे कि रामानन्दाचार्य का जन्म 1299 ई. में हुआ था। मैंने 'दलित-देवो भव' में संक्षेप में और शीघ्र प्रकाश्य पुस्तक 'युग प्रवर्तक रामानन्द' में यह सिद्ध किया है कि रामानन्दाचार्य 1470 ई. तक अवश्य जीवित थे; अतः यदि उनका जन्म वर्ष 1356 वि.सं. नहीं मानकर 1356 ई. मान लिया जाये, तो उनका काल 1356 से 1470 ई. होगा और तब कबीर एवं रैदास को उनके शिष्य मानने की जो सर्वसम्मत मध्यकालीन परम्परा रही है, उसमें उत्पन्न आशंकाओं का निराकरण हो जायेगा। पटना श्रीकृष्णजन्माष्टमी, 2066 वि. किशोर कुणाल
Here is the transcription of the manuscript page:
श्रीसीतारामाय नमः अगस्त्यनामर्षिर्विप्रश्चन्द्रमौक्तिकातीरे कदाचिद्दण्डकारण्ये स्तुतीज्ञात्वाजगामयो १ प्रशङ्गम संतंमन्नागंघृष्ण्यप्सृतोदकैः पद्यार्घ्यं चोईतां चक्रे तस्मै ब्रह्मविदेमुनिः २ सुतीक्ष्णासंश्राव्यासुत्त्वासीनींततो निविं श्री मद्रागवनेनेदं जीवितंसफलंमम ३ अद्यनन्मत्तह्येवतु तपः फलितंभवितम् क्रुद्धक्रोधादिभिर्भूयो भयो हं पीडितो मुने। ४ नशक्त्यं महिप्राष्टाविक्रतुं भिर्वहुरक्षिशैः सप्ताञ्चे सर्वदानानि दत्वातुमुनिसत्तम। ५ भवोपेतारगोपायं तपक्तस्वाद् दुक्कुरं किं की व्याप्यं हतात कृप्यास्मासीतितद्वर ६ इतक्रः सोव्रीतेनेन भूर्वाद्विगतस्पृहः स्वर्गोविच्याच्यतेते सोवाविपर्ययाम् निपुणवः ७ अगस्त उवाच • ऋत्वि ष्पाभितेते संवरेहत् स्पेरवमखः प्रशत्तपादपर्धमर्मं पावैनेतरूप पत्तात्क्वित् - कदाचित्ता वीतीप्राह भर्त्तारं भऋवत्सलं रूपमेदेनविनातोत्तमद्यवेक्ता तां भवेत् भवक्ष्योमोहिताः सर्वे तद्द्तिप्राप्नुवंतिनी ८ ईश्वर उवाच॥ कामक्रोधादिभिर्दोषैर्व्याप्तश्च जनः पुनः अभ्येतैर्विज्जीयेते ते नैनं मोहित्तास्तया १० गौरवारिद्वयञ्चैतेन जनं संतारितोभुवि । कर्मणीषासनायेतपूबंबधविवितारयः ११ क्रिमिनियारयोधूमन् जनः संतारितो भुवि तज्जातपुत्रहताः के विक्षौवा घ्राणिरिभ र्हताः १२ प्रविशंतिनताद्दोषा देशांतरं ब्रजंतीति परखीधन हेतुंरत्तापयंती ततः सदा देवब्राह्मणविद्वेतुं ते यषंजीवनमन्वहं तजमाः तामसांदेवहृत्तोरीधनजीविनः पुत्रराते रिथं कुः काश्चूर्वावचे नेन मन्त्र हो रजो प्रायेन सर्वे वि तमसातामतातथा १५
बाएँ हाशिए में: ऋ० १
दाएँ हाशिए में: राम १
पाद-टिप्पणी: पाण्डुलिपि 'क' का प्रथम पृष्ठ
गदांधे न्युविभजेत् अङ्गुलो मविलीना मा र्भायारा क्लिरापर्क मैसाव ७१ गद्यवारीदिना मासादिन कोल्यायोजयेत् मे शिरः पालिती त्स्यात्स वैतो वास योजेना ७२ माध्यात्वसंयुक्तं धंधास्त हैतिके श्येमृहे स्विकाम शक्तिं वावर्षानारसिंहमतः परं ७३ लक्ष्म्यीयं शांकुशारो गि वराहं फट्स्वरूप के ला हेतिमभस्म्या दशशास्त्यामी रितं ७४ सौक्रीं रंजेते पाचे भूजें वास मम लिखिद् अथवा ताम्रपत्रे वगलिकी क्रमधारयेत् ७५ यवजीवंतु सौवरौ रोष्ये विशिष्टंति वर्शकं मूर्भेदा शशवधालि तादृर्धेतांम् बर्के ७६ एवे लिखि विशेषेणायंत्र शक्ति प्रतिष्ठितं एतत्सम्मूवलोपे तां मिस्मारिन्नीक षुकं ७७ यत्राहुतिः पुरे प्रोक्तु र्वक्ताकारंयथा लिखित् सर्वोपशमनं सर्वो पशुवनाशनं ७८ आयुरारोग्य मैश्वर्यं पुत्र पौत्र प्रवर्द्धनं सर्व काममवाप्नोति विष्णुलोके स गच्छति ७९ रंगसंग्रह संहिता या मारुते हनुमान् ३५३ श्री सतकवचोद्धार कथने नाम द्वाविंशोध्यायः॥ ३२ श्लोकसंख्या २००० लिखीतं लाला सीताराम श्री वैकुण्ठ स्थाने श्री रामजी रामघाट मे रागिनी ये मुरली तरे संगः ॥ पुस्तके श्री श्री श्री महंत आचार्य वलभ दास जी की वैशाख वदि १२ संवत् १६०२ रामः रामः रामः
यहाँ पृष्ठ पर अंकित पाठ का पंक्ति-दर-पंक्ति देवनागरी लिप्यंतरण प्रस्तुत है:
[शीर्षक / पृष्ठ संख्या]
अ-सं- १ | अगस्त्य-संहिता
[खण्डित पाण्डुलिपि 'ख' का प्रथम पृष्ठ]
॥श्रीगणेशाय नमः। अगस्त्यो नाम विप्रर्षिः सप्तमो गौतमः स्मृतः कराविचे दुंडकारण्य सुतीक्ष्णास्याश्रमं ययो॥ तत्रापृच्छज्जगाम तंभ गवान्पप्रच्छ्या संतोददके । पाद्यं चार्घ्यंचहर्षेण चक्रेतंसो ऽसा विरेनिमुगं॥२॥ सु तीक्ष्ण संमुनिंप्राह सुरवासीनंतयो त्रिश्रीअंम्रीं राम भजते नैव जीविजीवितं सफलंमम॥३॥अद्य जन्मासहे सेतुं तपः फलमिसिंतितो कामं क्रूधंधामिर्मथ्यो मृत्योहं पीहुतो मुनौ ॥४॥ नाऽहं हंस म्मणिष्टिकं तुमिश्रिर क्षिणो गसत्वां त्रसवेंदनाना नि रखायिष्रुमुनिसत्तमः ॥ ५ ॥ भवान् घोस्तरंणा पार्यंत पस्ता द्वापिदुष्करं । किंक रियामहं कृप यास्यामी तितद्बद ॥६॥ सुयुक्तः सो ऽब्रवीत्तेन कुंभ सर विगता स्पृहः॥ शृणुष्विचार्चयंतं सोपर्वयेत्सुनिपुंगवः ॥७॥ एका कसादिवास्यांवती प्राह मन्त्रीरभ हस्यं शुभमंबुजं । यस्यस्मरणमात्रेण सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥८॥ एकान्ते समुपविष्टं च सर्वभूतहितंप्रभुं व त्कवत्सलं । कथं मेरवनिस्तारो भवा दोसार एणचे भवेत्॥९॥ मोहा हतः सर्वभूतहितंप्रभुंव तित्ते ईश्वर उवाच॥ कामक्रोधाहिभिर्दुष्टेवै दीवेषु शास्त्रेषु पुनः २॥१२॥ उपा उत्यद्यतेते विलीयते पुन र्या मोहिता स्तव्या होर वादिषु पच्यंते पुनः संसारारण्येषु विक्षे मे श्वात्सुना यंते पञ्च-
खण्डित पाण्डुलिपि 'ख' का प्रथम पृष्ठ
[खण्डित पाण्डुलिपि 'ग' के 31वें अध्याय का अन्तिम पृष्ठ]
धने व पुरोहितगत कस्य भातः ॥ २८॥ आचार नियता दृष्टास्थितिं दियातः ॥ तद्दुक्तान्मंत्रानुच्चार्योध्याय षाविधिः ॥ ३०॥ सब्रह्म की सुयत्य पापोछा जगन्निर्मेल मानसः पुनरा रलिष्टेहिते शाच्यं ते परंम शुभयातः॥ ३१॥ सक्रोमो बोधितोनु ल क्ष्यो मुक्तेनामनाः मनानांस्य निर्मलं कुरुते सर्वथा यांति विविधाः परंपदा २३॥ यथकर्ती राम में आगए बयाकुः पाथसंभवः तथा मेल स्तमः मनाकिंतु यातिपरो गतिं ॥ ३३॥ संमंत्राण्यस्य संसुक्त नंतप साक्षिंर सूर्ययेश्रेकुर. तेनंमबंद्र सुहिस्तास्टे ॥ ३४॥ मथाप्युपासितोयं वैभक्तियुक्तैचेतसा ॥ पूजयं तं समा सो काम मो वामं कराहीषिं ॥ ३५॥ प्रकाशिनोंम योपास्तिः जी के गुडी झय पुनः॥३६॥ उपम्य्या बहुवेले के मजु मेत दूने कराः ॥३७॥ संप्रणाथ वाछिता नर्थानगमंत दूसमवेस वी॥ अनेन मन्म हे कमें आगया वह वाजे नंअन्र्वित ॥ ३८॥ वैव वेक्ष वस्तोरषू गल्पंचेष वासुने के विन्नभक्तो धर्मेव सुः के विदिदक साधनः ३८॥१॥ सु किश्रुति करमआप वे को विजय तेयरं ॥ ३८॥ २॥ दृपरास्त्य संहिंतायां पञ्चम रत्नस्य एकत्रिंशोऽध्यायः ॥ ३१॥ ॥ सु तीक्ष्ण उवाच ॥ सर्वंवदतां तत्त्वं ज्ञानं नुनी न्तमोत्तमः ॥ सम्यक् संशिक्षितं भगवद्गुणानि कथं विधी॥ १॥ १॥ वयं काहण्ये बिधना पूर्वमुनं तथ्य ऽङ्गं ॥ तल सादिन संजातं ज्ञानं विगंत कल्पषो २॥ राममानं निनि परं ब्रह्म न्यासक
खण्डित पाण्डुलिपि 'ग' के 31वें अध्याय का अन्तिम पृष्ठ
यहाँ चित्र में दी गई दोनों पाण्डुलिपियों (पाण्डुलिपि 'अ' एवं पाण्डुलिपि 'आ') का देवनागरी लिप्यंतरण प्रस्तुत है:
पाण्डुलिपि 'अ'
अगस्त्य-संहिता से उक्त 'रामनवमीव्रतकथा' की पाण्डुलिपि 'अ' का प्रथम पृष्ठ
... श्रीरामचन्द्राय नमः ॥ अगस्त्य उवाच ॥ शृणु वक्ष्यामि विप्रर्षे रामस्य चरितं शुभम् । तव स्नेहात् प्रवक्ष्यामि न प्रकाश्यं कदाचन ॥ १ ॥ ॐ नमः शिवाय ॥ ... संहितायां रामनवमीव्रतकथा समाप्ता ॥ ० ॥ ॐ नमः शिवाय ॥ ॐ नमः शिवाय ॥ अगस्त्य उवाच ॥ रामनवमीव्रतकथा समाप्तः ॥ संवत् १७९२ समये लिवीतं ... श्रीरामजी ... रामजी कल्याण अस्तु ॥ श्री रघुपती जी सहाय ॥
पाण्डुलिपि 'आ'
अगस्त्य-संहिता से उक्त 'रामनवमीव्रतकथा' की पाण्डुलिपि 'आ' का प्रथम पृष्ठ
श्रीमते रामानुजाय नमः ॥ अगस्त्य उवाच ॥ शृणु विप्र प्रवक्ष्यामि रामस्य चरितं शुभम् यस्य श्रवणमात्रेण सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥ १ ॥ अगस्त्य उवाच ॥ शृणु वक्ष्यामि मुनिपुंगव ॥ रामनामाङ्कितां गुटिकां गृहीत्वा जानकीपतिं ॥ ३७ ॥ अगस्त्य उवाच ॥ शृणु वत्स समाहितः चैत्रशुक्लनवम्यां तु यदहं वृष्टवान् पुरा ॥ ३७ ॥ द्रुतहेममयीं रामप्रतिमां लक्ष्मणेन समन्विताम् । जानक्या लक्ष्मणेनैव भरतेन सुमित्रिणा ॥ ३८ ॥ भरतशत्रुघ्नसमेतं लक्ष्मणेन समन्वितम् ॥ ३८ ॥ पवित्रं कुंकुमेनैव कुर्याद्वा जानकीपतिम् ॥ ३९ ॥ चन्दनाद्यैरर्चयित्वा तोरणैरुपशोभयेत् दमनकेन संयुक्तं पूजयेज्जानकीपतिम् ॥ ४० ॥ पूजयेद्गन्धकुसुमैस्तोलकं वा तदर्धकम् श्रीरामचन्द्राय नमः ॥ अगस्त्य उवाच ॥ ४१ ॥ ततो यदहं दृष्टवान् पुरा ॥ ४२ ॥ ॐ नमः शिवाय ॥ श्रीरामजी तस्मै लक्ष्मणार्य्याय नमः ॥ ५७ ॥ श्रीरामनवमीव्रतकथा द्वितीयोऽध्यायः समाप्तः ॥ ० ॥
प्रस्तावना भारतीय परम्परा में वैदिक पद्धति यज्ञ प्रधान है, जिसमें देवताओं के निमित्त अग्नि में आहुति देकर उन देवों की उपासना होती है। इन यज्ञों का विवरण हमें ब्राह्मण-ग्रन्थों एवं श्रौत-सूत्रों में मिलता है। परवर्ती काल में पूजन की एक दूसरी परम्परा आरम्भ हुई, जिसमें देवताओं की पूजा अतिथि-पूजा की शैली में होने लगी। यह उपासना की आगम-पद्धति कहलायी। 'बौधायन- गृह्यसूत्र' में दुर्गापूजन, नवग्रहपूजन आदि की जो पद्धति है, वह आगम की पद्धति है, जिसमें आवाहन, पाद्य, अर्घ्य, पुष्पाञ्जलि आदि विधियाँ हैं। 'महाभारत' में भी इस पद्धति का उल्लेख उपलब्ध होता है, अतः इस आगम पद्धति कौ कम से कम ईशा पूर्व द्वितीय शताब्दी तक प्राचीन माना जा सकता है। प्राचीन काल में इस आगम-पद्धति की पाँच शाखाओं का उल्लेख विभिन्न ग्रन्थों में मिलता है। ये शाखायें थीं- सौर, गाणपत्य, शैव, शाक्त एवं पाञ्चरात्र। इनमें पाञ्चरात्र पद्धति वैष्णव उपासना पद्धति है, जिसके विकास में दक्षिण के आलवार वैष्णव सन्तों का पर्याप्त योगदान रहा है। सभी आगमों की परम्परा की एक मुख्य विशेषता रही है कि इसमें सामाजिक समानता का पर्याप्त पोषण हुआ है। वैदिक उपासना पद्धति में आयी जटिलता एवं कट्टरता के विरुद्ध आगम की परम्परा सामाजिक समरसता, लौकिकता एवं सरलता के कारण समाज में व्यापक प्रसिद्धि पा सकी। अतिथि-पूजन की विधि किसी भी भारतीय के लिए प्रायः न तो जटिल प्रक्रिया थी और न ही अबोधगम्य थी। आगम पद्धति इस सरलता का पोषक रही और जन साधारण ने अतिथि की तरह देवपूजन कर देवता को अधिक सन्निकट पाया। वैदिक ऋचाओं की तरह इसके मन्त्रों के उच्चारण में पाण्डित्य और संस्कृत व्याकरण के ज्ञान की अपेक्षा थी, न ही मध्यकाल में भी कोई जातीय प्रतिबन्ध था।
प्रस्तावना (13) जयन्तभट्ट (नवम शती उत्तरार्द्ध) ने 'आगम-डम्बर' प्रहसन में पाञ्चरात्र के सम्बन्ध में जो लिखा है, उससे यह अर्थ निकलता है कि इस परम्परा के उपासक ब्राह्मणेतर थे और उन्हें समाज में ब्राह्मण के समान सम्मान प्राप्त था। वे पाञ्चरात्र आगम के ग्रन्थों का पारायण करते थे और उनके प्रति वैदिक संहिताओं के समान आदर की भावना रखते थे। जिस प्रकार वैदिक संहिताओं में एक भी शब्द का हेरफेर या आगे-पीछे करना अक्षम्य माना गया है, उसी प्रकार पाञ्चरात्र के ग्रन्थों के लिए भी वे ध्यान रखते थे। जयन्त भट्ट की इस रचना में आगम के विभिन्न सम्प्रदायों तथा वैदिक सम्प्रदाय की विशेषताओं का हास्यपरक वर्णन किया गया है। सभी सम्प्रदाय के अनुयायी आपस में लड़ते हैं, नोंकझोंक करते हैं, अपने वर्चस्व के लिए दूसरे सम्प्रदाय पर छींटाकशी करते हैं, किन्तु अन्त में जयन्त भट्ट ने अपने न्यायशास्त्र के पाण्डित्य का उपयोग करते हुए सबके बीच समन्वय करने का प्रयास किया है। इसी क्रम में आगम-डम्बर का प्रसिद्ध श्लोक है- एकः शिवः पशुपतिः कपिलोऽथ विष्णुः संकर्षणो जिनमुनिः सुगतो मनुर्वा। संज्ञाः परं पृथगिमास्तनवोऽपि काम- मव्याकृते तु परमात्मनि नास्ति कोऽपि भेदः।। 4।57 इस 'आगम-डम्बर' के चतुर्थ अंक में वैदिक ऋत्विक् बेचैन होकर कहते हैं कि कानों में बर्छी की तरह मुझे यह बात लग रही है। ऋत्विक्- किं क्रियते? किन्चिदमधिकं मे कर्णशल्यम्। उपाध्यायः- किमिव? ऋत्विक्- यदमी पाञ्चरात्रिकाः भागवताः ब्राह्मणवद् व्यवहरन्ति। ब्राह्मणसमाजमनुप्रविश्य निर्विशङ्कमभिवादय इति जल्यन्ते। विशिष्टस्वरवर्णानुपूर्वीकृतया वेदपाठमनुसरन्त इव पञ्चरात्रग्रन्थमधीयते। ब्राह्मणाः स्म इत्यात्मानं व्यपदिशन्ति व्यपदेशयन्ति च। शैवादयस्तु न चातुर्वर्ण्यमध्यपतिताः, श्रुतिस्मृतिविहितमाश्रममवजहतः शासनान्तरपरिग्रहेणान्यथा वर्तन्ते। एते पुनराजन्मन आसन्ततेः ब्राह्मणा एव वयमिति ब्रुवाणास्तथैव चातुराश्रम्यमनुकुर्वन्तीति महत् दुःखम्। अर्थात् ये पांचरात्रवाले वैष्णव ब्राह्मण के समान व्यवहार करते हैं। ब्राह्मणों के समाज के बीच जाकर कहते हैं कि 'मुझे विना किसी भय के अभिवादन करो। विशेष प्रकार से स्वरों के साथ वर्गों को यथास्थान रखते हुए पाञ्चरात्र के ग्रन्थों का
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पाठ करते हैं, जैसे वेदपाठ का अनुसरण कर रहे हों। हमलोग ब्राह्मण हैं' यह अपने बारे में उपदेश करते हैं और दूसरे से भी कराते हैं। शैव आदि आगमवाले तो खैर चातुर्वर्ण्य के भीतर आते ही नहीं, वेद और स्मृतियों में वर्णित आश्रम का त्याग कर अपने बनाये हुए दूसरे ही नियमों का पालन करते हैं। किन्तु ये (पांचरात्रवाले) कहते हैं कि मैं जन्म से ब्राह्मण हूँ तथा मेरी सन्तति भी ब्राह्मण रहेंगे। इस प्रकार कहते हुए उसी रूप में बोलते हुए चारों आश्रमों का अनुकरण करते हैं।" एक ऋत्विक् का आक्रोशपूर्ण कथन होने के कारण इसकी शैली व्यंग्यात्मक है, किन्तु इससे पांचरात्र आगम में ब्राह्मणेतर साधकों का प्रवेश तथा समाज में उनका सम्मान स्पष्ट प्रतीत है। इसीलिए वे कट्टर वैदिकों के लिए कर्णशल्य बने हुए हैं। जयन्त भट्ट का यह कथन इसलिए भी ऐतिहासिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण है क्योंकि इसमें पांचरात्र आगम के अनेक ग्रन्थों का भी संकेत किया गया है, जिनका पाठ वे अनुयायी किया करते थे। बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना से प्रकाशित 'पांचरात्रागम' ग्रन्थ में डा. राघवप्रसाद चौधरी ने 'नारायण-संहिता' का हवाला देते हुए पांचरात्र की तीन प्रकार की संहिताओं की सूची दी है। इस सूची में 21 सात्विक संहिताएँ, 33 राजम संहिताएँ तथा 33 तामस संहिताएँ सम्मिलित हैं। इनके अतिरिक्त अन्य संहिताओं का भी संकेत है। आधुनिक विद्वानों में डा. एच डेनियल स्मिथ ने 'वैष्णव आइकोनोग्राफी' नामक पुस्तक में कुल 35 संहिता-ग्रन्थों की सूची दी है, जिनका संकलन उन्होंने किया था। ये संहिताएँ निम्नलिखित हैं- (1) अगस्त्य-संहिता (2) अनिरुद्ध-संहिता (3) अहिर्बुध्न्य-संहिता (4) ईश्वर-संहिता (5) कपिंजल-संहिता (6) काश्यप-संहिता (7) गरुड़-संहिता (8) जयाख्य-संहिता (9) नारदीय-संहिता (10) परम-संहिता (11) पराशर-संहिता (12) पाद्म-संहिता (13) पारमेश्वर-संहिता (14) पुरुषोत्तम-संहिता (15) पौष्कर-संहिता (16) बृहद् ब्रह्म-संहिता (17) भार्गव-तन्त्र (18) मार्कण्डेय-संहिता (19) मार्कण्डेय-संहिता 2 (20) लक्ष्मी-संहिता (21) वायु-संहिता (22) वाशिष्ठ-संहिता (23) विश्वामित्र-संहिता (24) विष्णुत्तत्त्व-संहिता (25) विष्णुतान्त्र-संहिता (26) विष्णुतिलक-संहिता (27) विष्णु-संहिता (28) विष्वक्सेन-संहिता (29) विहगेन्द्र-संहिता (30) शाण्डिल्य-संहिता (31) शेष-संहिता (32) श्रीप्रश्न-संहिता (33) सनत्कुमार-संहिता (34) सात्वत-संहिता 2 (35) हयशीर्ष-संहिता
प्रस्तावना (15)
इन संहिता-ग्रन्थों में ‘अगस्त्य-संहिता’ एवं ईश्वर-संहिता के दो पाठों का उल्लेख डा. स्मिथ ने किया है। अगस्त्य-संहिता का प्राचीन ग्रन्थों में उल्लेख धर्मशास्त्र की परम्परा में कई निबन्धकारों ने इस ‘अगस्त्य-संहिता’ का उल्लेख किया है। हेमाद्रि (1260-1270 ई0) ने भी चतुर्वर्ग-चिन्तामणि के ‘व्रत प्रकरण’ में इसका उल्लेख किया है, जिसे कमलाकर भट्ट ने ‘निर्णय-सिन्धु’ में ‘हेमाद्रौ अगस्तिसंहितायां’ कहकर उद्धृत किया है। हेमाद्रि का काल ज्ञात है। ये देवगिरि के यादववंशीय राजा महादेव (1260-70 ई.) के सर्वश्रीकरण-प्रभु, यानी सभी अभिलेखों के प्रभारी थे। महादेव के शासनकाल में ही ‘चतुर्वर्ग- चिन्तामणि’ की रचना हुई थी। ‘चतुर्वर्ग-चिन्तामणि’ के श्राद्धकाण्ड के आरम्भ में उन्होंने अपने आश्रयदाता नृपति का वर्णन विस्तार से किया है, जिसके आधार पर ग्रन्थ के सम्पादक प्रो. विश्वनाथ शास्त्री ने हेमाद्रि का पद्यबद्ध परिचय इस प्रकार दिया है— विध्वस्ताखिलवैरिणा किल महादेवस्य पृथ्वीपतेः राज्यक्षीरसमुद्रवर्द्धनशशी हेमाद्रिसूरिः परः। येन श्रीकरणाधिपत्यपदवीमासाद्य विद्यामपि न्यस्ता श्रीश्च सरस्वती च विदुषां गेहेषु देहेषु च।।10।। कमलाकर भट्ट कृत ‘निर्णयसिन्धु’ में ‘चतुर्वर्ग-चिन्तामणि’ से उद्धृत श्लोक परिशिष्ट 1 में ग्रन्थान्त में एकत्रित हैं। ये श्लोक ‘अगस्त्य-संहिता’ के विभिन्न अध्यायों में विद्यमान हैं। जिनका संदर्भ-संकेत भी वहीं दिया गया है। ‘कालमाधव’ माधवाचार्य की प्रामाणिक रचना मानी जाती है। इसका रचना-काल 1336-1350 ई. माना जाता है। इसमें भी रामनवमी निर्णय के क्रम में ‘अगस्त्य संहिता’ का उल्लेख हुआ है— इहागस्त्यः चैत्रमासे नवम्यां तु जातो रामः स्वयं हरिः। पुनर्वस्वृक्षसंयुक्ता सा च पूर्वाह्णगामिनी।। श्रीरामनवमी प्रोक्ता कोटिसूर्यग्रहात्मिका। सैव मध्याह्नयोगेन सर्वकर्मफलप्रदा।। (चतुर्थ प्रकरण : नवमी निर्णय)
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(16) अगस्त्य-संहिता ────────────────────────────────────────── रामोपासना की परम्परा में 'अध्यात्म-रामायण' का महत्त्वपूर्ण स्थान है। इसमें भी 'अगस्त्य संहिता' का उल्लेख हुआ है। इसके किष्किन्धाकाण्ड के चतुर्थ अध्याय में श्रीराम के मुख से लक्ष्मण को क्रियायोग अर्थात् रामोपासना का कर्मकाण्ड सुनाने की कथा है। इस सम्पूर्ण अध्याय में संक्षेप में पूजा-विधान का वर्णन किया गया है। इस पूजा-विधान पर 'अगस्त्य-संहिता की पद्धति' का पूर्ण प्रभाव है। इसके अतिरिक्त होमविधि के क्रम में कुण्डनिर्माण की विधि का उल्लेख न कर अगस्त्य-प्रोक्त मार्ग का उल्लेख कर दिया गया है। यहाँ कहा गया है कि आगमशास्त्र के ज्ञाता अगस्त्य मुनि द्वारा प्रतिपादित पद्धति से कुण्ड का निर्माण कर मूल मन्त्र से या पुरुषसूक्त से हवन करें— अगस्त्येनोक्तमार्गेण कुण्डेनागमवित्तमः। जुहुयान्मूलमन्त्रेण पुंसूक्तेनाथवा बुधः।।31।। अगस्त्य संहिता में 18वें अध्याय में कुण्ड निर्माण विधि विस्तार से उल्लिखित है। 'काव्यप्रकाश' के चर्चित प्रदीप-टीकाकार म.म. गोविन्द ठाकुर के पंचम पुत्र महामहोपाध्याय तर्कपञ्चानन आगमाचार्य देवनाथ ठक्कुर ने 1564 ई0 में अपनी 75 वर्ष की अवस्था में 'मन्त्रकौमुदी' नामक आगम के सिद्धान्त ग्रन्थ की रचना की। इसमें कुल 37 प्रकरण हैं, जिनमें आगम-कर्मकाण्ड के विविध विषयों का सविस्तर उल्लेख है। इस ग्रन्थ में पाँच स्थलों पर 'अगस्त्य-संहिता' का उल्लेख किया गया है- (1) इसके 'मण्डलविचार' नामक सप्तम प्रकरण के अन्त में पुरश्चरण के लक्षण पर विचार करते हुए पञ्चाङ्ग उपासना को पुरश्चरण मानकर प्रमाण के रूप में 'अगस्त्य-संहिता' का उल्लेख किया है- एतत् कण्ठरवेणैव प्राह चागस्त्यसंहिता। पञ्चाङ्गोपासनं भक्त्या पुरश्चरणमुच्यते।। अर्थात् अगस्त्य संहिता भी मुक्तकण्ठ से कहती है कि भक्तिपूर्वक पंचाङ्ग उपासना को पुरश्चरण कहते हैं। 'अगस्त्य-संहिता' 16।51 में भी इन्हीं शब्दों में पुरश्चरण को परिभाषित किया गया है। (2) 22वें प्रकरण में अर्ध्यादिस्थापन की विधि का उल्लेख करते हुए आवरण-पूजा का विस्तृत विवेचन न कर अगस्त्य-संहिता में उल्लिखित आवरण- पूजा को अपनाने का निर्देश किया है- Rarest Archiver
प्रस्तावना (17) शेषं वक्तव्यमार्गेण विदध्यादविरोधिनाम्। अगस्त्यसंहितायान्तु प्रोक्तमावरणार्चनम्।।29।। (3) 24वें प्रकरण में होम-विधान में देवनाथ ठक्कुर का मत है कि नैमित्तिक कर्म में ही होम करना चाहिए, नित्यकर्म में नहीं। यह मिथिला की परम्परा है, अतः वहाँ पूजन आदि कर्म में हवन नहीं किया जाता है। किन्तु उन्होंने 'अगस्त्य-संहिता' के उस मत का भी उल्लेख किया है, जिसमें नित्य, नैमित्तिक एवं काम्य तीनों कर्मों में होम का विधान किया गया है- संहितायामगस्त्यस्य समस्तविधिशेषतः। नित्ये नैमित्तिके काम्येऽप्येतदग्निमुखं मतम्।।175।। वर्तमान अगस्त्य-संहिता के चतुर्दश अध्याय में 66वें श्लोक में उपर्युक्त श्लोक का उत्तरार्द्ध इसी रूप में उपलब्ध है। (4) इसी प्रकार सानत्कुमारीय होमविधि का विवेचन करते हुए 24वें प्रकरण में प्रतिदिन जप की संख्या का निर्धारण करते हुए अगस्त्य-संहिता के मत का उल्लेख किया गया है, जिसके अनुसार छह हजार, एक हजार अथवा एक सौ आठ बार जप प्रतिदिन करना चाहिए- षट्सहस्रं सहस्रं वा शतमष्टोत्तरं जपेत्। अगस्त्य-संहितायामप्येष शेषिको विधिः।।44।। वर्तमान अगस्त्य-संहिता के षोडश अध्याय के तीसरे श्लोक में पुरश्चरण- विधान के क्रम में भी यहीं बात कही गयी है- षट्सहस्रं सहस्रं वा शतं वाष्टोत्तरं शुचिः।।3। (5) 'मन्त्रकौमुदी' के अन्तिम प्रकरण में म.म. देवनाथ ठाकुर ने उन प्राचीन ग्रन्थों का उल्लेख किया है जिनका अध्ययन करके वे प्रस्तुत ग्रन्थ को लिखने में प्रवृत्त हुए। इनमें 'प्रपञ्चसार', 'शारदा-तिलक', 'सारसमुच्चय', 'दीपिका', 'पूजाप्रदीप', 'श्रीरामार्चनचन्द्रिका', 'तन्त्रमुक्तावली', 'सनत्कुमार-तन्त्र', 'नारदीय- तन्त्र' आदि के साथ 'अगस्त्य-संहिता' का भी उल्लेख किया है- तूर्णायागं सोमशम्भुमतं चागस्त्यसंहिताम्। संहितां वैष्णवीं तद्वत् तत्त्वसागरसंहिताम्।।5।। इस प्रकार म.म. देवनाथ ठाकुर ने 'अगस्त्य-संहिता' का उल्लेख जिन विषयों के सन्दर्भ में किया है वे इस संहिता में उपलब्ध हैं।
(18) अगस्त्य-संहिता 16वीं शती में मिथिला के महेश ठाकुर ने भी 'अगस्त्य-संहिता' का उल्लेख रामनवमी-प्रकरण में ही किया है- चैत्रशुक्लनवमी रामनवमी, सा च मध्याह्नयोगिनी ग्राह्या। इसके प्रमाण में उन्होंने 'अगस्त्य-संहिता' को उद्धृत करते हुए लिखा है कि- चैत्रशुक्ले तु नवमी पुनर्वसुयुता यदि। सैव मध्याह्नयोगेन महापुण्यतमा भवेत्। इत्यगस्त्यसंहितोक्तेश्च इति मत्कृतस्मृतिरत्नाकरे। (तिथितत्त्वचिन्तामणि) महेश ठाकुर ने इसके अतिरिक्त नवमी चाष्टमीविद्धा त्याज्या विष्णुपरायणैः। इस पंक्ति को भी अगस्त्य-संहिता से उद्धृत माना है। प्रस्तुत 'अगस्त्य संहिता' में यह पंक्ति 28वें अध्याय के 13वें श्लोक का पूर्वार्द्ध है, जहाँ रामपरायणैः पाठान्तर है। इसके अतिरिक्त महेश ठाकुर ने निम्नलिखित श्लोकों को भी अगस्त्य- संहितोक्त मानकर उद्धृत किया है- उपोषणं जागरणं पितृनुद्दिश्य तर्पणम्। तस्मिन् दिने तु कर्तव्यं ब्रह्मप्राप्तिमभीप्सुभिः।। सर्वेषामप्ययं धर्मो भुक्तिमुक्त्यैकसाधनम्। अशुचिर्वापि पापिष्ठः कृत्वेदं व्रतमुत्तमम्।। पूज्यः स्यात् सर्वभूतानां यथा रामस्तथैव सः।। 17वीं शती में अनन्तदेव ने भी 'स्मृति-कौस्तुभ' में इसी रामनवमी-निर्णय के प्रसंग में अगस्त्य-संहिता का उल्लेख किया है- अगस्तिसंहितायां- चैत्रे नवम्यां प्राक्पक्षे दिवा पुण्ये पुनर्वसौ। मेषे पूषणि संप्राप्ते लग्ने कर्कटकाह्वये। आविरासीत्स कलया कौसल्यायां परः पुमान्। तस्मिन्दिने तु कर्तव्यमुपवासव्रतं सदा। तत्र जागरणं कुर्याद्रघुनाथपरो भुवि। प्रातर्दशम्यां कृत्वा तु संध्याद्याः कालिकाः क्रियाः। संपूज्य विधिवद्रामं भक्त्या वित्तानुसारतः।