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अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary

महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा

DevanagariSanskritpublished337 पृष्ठ

२. मन्त्र-दीक्षा, न्यास व षडङ्ग-पूजा पद्धति

अष्टमोऽध्यायः (45) — — — — — — — — — — — — — — — क्षुद्राः¹ प्रलोभितास्तैस्तैर्निन्दितेभ्यो दिशन्ति ये।² विनश्यत्येव तत्सर्वं सैकते शालिबीजवत् ।।२४।। क्षुद्र बुद्धि वाले, प्रलोभन के फेर में पड़कर जो जो निन्दित कार्य के लिए किसी को उकसाते हैं, उस गुरु का भी सबकुछ बालू की ढेर पर पड़े धान के बीज के समान नष्ट हो जाता है यैः शिष्यैः शश्वदाराध्याः गुरवो ह्यवमानिताः। पुत्रमित्रकलत्रादिसंपद्भ्यः प्रच्युता हि ते।।२५।। जो शिष्य बार बार अपने आराध्य गुरुओं का अपमान करते हैं, वे पुत्र, मित्र, पत्नी और धन सम्पत्ति से विहीन हो जाते हैं। अधिक्षिष्य गुरून् मोहात् परुषं प्रवदन्ति ये। शूकरत्वं भवत्येव तेषां जन्मशतेष्वपि।।२६।। गुरुओं पर आक्षेप लगाकर मूर्खतावश जो गुरु के प्रति कठोर वचन कहते हैं, वे सौ जन्मों तक सूअर होते हैं। ये गुरुद्रोहिणो मूढाः सततं पापकारिणः। तेषां च यावत्सुकृतं दुष्कृतं स्यान्न संशयः।।२७।। जो मूर्ख गुरु से द्रोह करते हुए हमेशा पापाचरण करते हैं उनके द्वारा किये गये अच्छे कार्य भी बुरे फल देते हैं। तारादिर्मुक्तये लक्ष्मीबीजादिर्भुक्तये तथा। वाक्सिद्धये च वाग्बीजं प्रणवान्ते विनिक्षिपेत् ।।२८।। मोक्ष के लिए पंचाक्षर मन्त्र (रामाय नमः) में तार (ॐकार) लगाकर, सुख-सम्पत्ति के लिए लक्ष्मीबीज (श्रीं) लगाकर तथा वाणी की सिद्धि के लिए वाग्बीज(ऐं) लगाकर प्रणव ॐकार अन्त में जोड़कर जपना चाहिए। मान्मथं सर्ववश्याय पदं तत् त्रितयं पुनः। तारान्ते चैव रामादौ सर्वार्थं विनियोजयेत् ।।२९।। सर्ववशीकरण के लिए कामबीज (क्लीं) लगाकर तथा सर्वकामना सिद्धि के लिए तीनों पदों ह्रीं, श्रीं, ऐं के बाद तार (ॐकार) लगाकर रामादि का जप करें।

  1. घ. क्षुब्धाः। 2. घ. निन्दितानादिशन्ति च।

(46) अगस्त्य-संहिता ————————————————————————————————————————— रामाय नम इत्येव मन्त्रः पञ्चाक्षरो मनुः। रामित्येकाक्षरो मन्त्रो राम इत्यपरो मनुः ।।३०।। 'रामाय नमः' यह एक मन्त्र पाँच अक्षरों का है, 'रां' यह एकाक्षर मन्त्र है तथा 'राम' यह एक अन्य मन्त्र है। चन्द्रान्तश्चैव भद्रान्तः पुनर्द्वेधा विभज्यते। स्वकामशक्तिवाग्लक्ष्मीताराद्यः पञ्चवर्णकः ।।३१।। षडक्षरः षड्विधः स्याच्चतुर्वर्गफलप्रदः। पंचाशन्मातृकामन्त्रवर्णप्रत्येकपूर्वकः ।।३२।। 'रामचन्द्राय नमः' और 'रामभद्राय नमः' इस प्रकार दो मन्त्र हो जाते हैं। स्वबीज (रां), कामबीज(क्लीं), शक्ति(ह्रीं), वाक्(ऐं), लक्ष्मी(श्रीं) तथा तार (ॐ) इन छह बीजों का आदि में प्रयोग करने से पंचाक्षर मन्त्र छह प्रकार के षडक्षर मन्त्र हो जाते हैं। जिनमें पचास मातृकावर्णों के बीजरूप प्रत्येक के आदि में जोड़कर जप किया जाता है। लक्ष्मीवाङ्न्मथादिश्च सर्वत्र प्रणवादिकः। रामश्च चन्द्रभद्रान्तश्चतुर्थ्यन्तो हृदा ^1 सह ।।३३।। बहुधा विद्यते तारसहितोऽयं षडक्षरः। लक्ष्मीबीज, वाक्बीज, कामबीज प्रारम्भ में लगाकर तथा प्रत्येक मन्त्र में तार जोड़कर 'राम' शब्द 'चन्द्र' और 'भद्र' जोड़कर चतुर्थी विभक्ति में 'नमः' के साथ तथा तारक बीज ॐकार के साथ अनेक प्रकार के यह षडक्षर मन्त्र होते हैं। एकधा च द्विधा त्रेधा चतुर्धा पंचधा तथा ।।३४।। षट्सप्ताष्टधा चैव बहुधायं व्यवस्थितः। एकाक्षर, द्वयक्षर, त्र्यक्षर, चतुरक्षर, पंचाक्षर, षडक्षर, सप्ताक्षर, अष्टाक्षर एवं अनेकाक्षर, इन अनेक प्रकार के मन्त्रों का निरूपण किया गया है। मन्त्रोऽयमुपदेष्टव्यो ब्राह्मणाद्यनुरूपतः ।।३५।। संपूज्य विधिवत् तत्र संस्थाप्य कलशं नवम्। तत्सामर्थ्यानुरूपेण मृत्सुवर्णमयं तथा। दात्रा प्रदीयते यद्वन्मन्त्रो देयस्तथा मुने ।।३६।।


  1. क. नमः।

नवमोऽध्यायः (47) हे मुनि सुतीक्ष्ण! ब्राह्मण आदि जाति के शिष्यों को उनके अनुरूप विधानपूर्वक पूजा कर सामर्थ्य के अनुसार सोने का या मिट्टी के नवीन कलश की स्थापना कर यह मन्त्र उसी प्रकार शिष्य को दें जैसे कोई दाता किसी को धन देता है। इत्यगस्त्यसंहितायां परमरहस्ये गुरुशिष्यलक्षणं नामाष्टमोऽध्यायः।।8।। अथ नवमोऽध्यायः सुतीक्ष्ण उवाच किं तन्मन्त्रं वद ब्रह्मन् स्वरूपन्तस्य चानघ। कैर्मन्त्रैर्वा कथं कुत्र लेख्यः किं तेन वा भवेत्।।1।। हे ब्रह्मन्! मुनि अगस्त्य! वह मन्त्र क्या है? इसका स्वरूप क्या है? किस मन्त्र से किस प्रकार और किस स्थान पर उपासना करनी चाहिए तथा अंकित करने योग्य यन्त्र कैसा है, यह सब हमें बतलायें। सुतीक्ष्ण उवाच किं तद्यन्त्रं वद ब्रह्मन् स्वरूपं चास्य चानघ। कैर्मन्त्रैर्वा कथं कुत्र जाप्यं किं तेन वा भवेत्।।1।। सुतीक्ष्ण बोले- हे मुनि अगस्त्य! वह यन्त्र क्या है, इसका स्वरूप क्या है और किन मन्त्रों से कैसे कहाँ जप करना चाहिए और उसका क्या फल मिलेगा? अगस्त्य उवाच मनोरथकराण्यत्र नियम्यन्ते तपोधन। कामक्रोधादिदोषोत्थदीर्घदुःखनियन्त्रणात् ।¹।2।। यन्त्रमित्याहुरेतस्मिन् रामः प्रीणाति पूजितः। यन्त्रं मन्त्रमयं प्राहुर्देवता मन्त्ररूपिणी।।3।। अगस्त्य बोले- यहाँ में मनोरथ पूरा करनेवाले यन्त्रों की विधि बतलाता हूँ। काम, क्रोध आदि दोषों से उत्पन्न दुःखों को नियन्त्रित करने के कारण इसे यन्त्र कहा जाता है। इसपर पूजित श्रीराम प्रसन्न होते हैं। मन्त्र से युक्त यन्त्र होता है, जिसमे मन्त्र-स्वरूप देवता स्वयं होते हैं।

  1. घ. कामक्रोधादिदोषोत्थदीर्घयन्त्रनियन्त्रणात्।

(48) अगस्त्य-संहिता यन्त्रेणापूजितो रामः सहसा न प्रसीदति। श्रीरामः पूजितो नित्यं सीतया सह यन्त्रितः।।4।। यदिष्टं तत्करोत्येव तत्तन्मन्त्रवरादृते। यन्त्र के बिना पूजित राम शीघ्र प्रसन्न नहीं होते हैं। किन्तु श्री सीता के साथ यन्त्र पर निर्दिष्ट श्रीराम पूजित होकर उस मन्त्रराज के बिना भी इष्ट सिद्धि करते हैं। शरीरमिव जीवस्य रामस्य मनुरुच्यते।।5।। यन्त्रे मन्त्रं समाराध्य यदभीष्टं तदाप्नुयात्।¹ ²यन्त्रे मन्त्रं समाराध्य प्रसादयति राघवम्।।6।। जैसे जीव का आश्रय शरीर होता है, उसी प्रकार श्रीराम मन्त्र में विराजमान होते हैं। यन्त्र पर मन्त्र की आराधना करने से कामना की पूर्ति होती है तथा श्रीराम प्रसन्न होते हैं। ³सर्वेषामपि मन्त्राणां यन्त्रे पूजा प्रशस्यते। यन्त्रस्वरूपं वक्ष्यामि ब्रह्मा प्राह यथा पुरा।'।7।। सभी मन्त्रों की पूजा यन्त्र पर प्रशस्त मानी जाती है। ब्रह्मा ने जिस प्रकार प्राचीन काल में कहा था वैसा ही मैं भी कहता हूँ। आदौ षट्कोणमुद्धृत्य ततो वृत्तं लिखेन्मुने। दलानि विलिखेदष्टौ ततः स्याच्चतुरस्रकम्।।8।। सबसे पहले षट्कोण लिखकर तब वृत्त लिखना चाहिए। इसके बाद आठ दल लिखकर चतुरस्र (वर्ग) बनाना चाहिए। सर्वलक्षणसम्पन्नं व्यक्तं सर्वमनोहरम्। तदन्तरेऽपि सुव्यक्तं साध्याख्या कर्मगर्भितम्।।9।। सभी लक्षणों से युक्त, स्पष्ट और सुन्दर यन्त्र लिखकर उसके मध्य में स्पष्ट अक्षरो में अभीष्ट वस्तु और कर्म लिखना चाहिए। तद्बीजं विलिखेद् भूयस्तत् क्रोडीकृतमन्मथम्। ततस्तु पञ्चबीजानि पुनरावर्तयेन्मुने।।10।। पुनर्दशाक्षरेणैव तदेव परिवेष्टयेत्।

  1. घ. समाप्नुयात्। 2-3. घ. में अनुपलब्ध। Rarest Archiver

नवमोऽध्यायः (49) तब बीज मन्त्र के दोनों ओर कामबीज (क्लीं) लिखें। इसके बाद पाँचो बीजाक्षर फिर दोहराएँ। पुनः दशाक्षर मन्त्र से वेष्टित करें। षडङ्गान्यग्निकोणादि कोणेष्ववक्रमाल्लिखेत् ।। 11 ।। तथा कोणकपोलेषु ह्रीं श्रीं च विलिखेन्मुने। हुं बीजं प्रतिकोणाग्रं केसराग्रेषु च स्वरान् ।। 12 ।। फिर अग्निकोण से प्रारम्भ कर कोणों में विपरीत क्रम से षडङ्गों को लिखें और कोणों के दोनों ओर 'ह्रीं' और 'श्रीं' लिखें। प्रत्येक कोण के अग्रभाग में 'हुं' बीज लिखें और केसर के अग्रभागों में स्वरों को लिखें। मालामन्त्रस्य वर्णाः स्युः चत्वारिंशच्च पञ्च च। वर्णाः सप्तदलेष्वेव षट् षट् पश्चाष्टमेदले ।। 13 ।। पूर्वतो वेष्टयेत् काद्यैः तत्सर्वं च तपोधन। बीजद्वयं च विलिखेत् नरसिंहवराहयोः ।। 14 ।। दिग्विद्दिक्ष्वपि पूर्वस्मात् ¹ भूगृहे चतुरस्रके। यन्त्रेस्मिन् सम्यगाराध्य भुक्तिं मुक्तिं च विन्दति ।। 15 ।। मालामन्त्र में पैंतालीस वर्ण होते हैं, जिनमें सात दलों में छः छः वर्ण लिखें और आठवें में पाँच वर्ण लिखें। पूर्व से 'क' आदि से सबको वेष्टित करें और वराह एवं नरसिंह के बीज (क्रौं) चारो दिशाओं एवं चारो कोणों में वर्गाकर भूपुर पर लिखें। इस यन्त्र पर आराधना कर भोग और मोक्ष दोनों की प्राप्ति होती है। यद्वा मध्ये लिखेत्तारं षट्सु कोणेष्वपि क्रमात्। मूलमन्त्राक्षराण्येव सन्धिष्वग्रं च मान्मथम् ।। 16 ।। मायां गण्डेषु किंजल्के स्वराणां लेखने मतम्। मन्त्रेषु पूर्ववन्मालामन्त्रो लेख्यः क्रमेण हि ।। 17 ।। दशाक्षरेण संवेष्ट्य कादीनि व्यञ्जनानि च। दिग्विंदिक्षु लिखेद् बीजे नारसिंहवराहयोः ।। 18 ।। अथवा मध्य में तथा छः कोणों में क्रम से तार (ॐ कार) लिखें। इसके बाद मूल मन्त्र के अक्षर कोण की सन्धियों पर लिखकर उसके आगे कामबीज (क्लीं) लिखें। कोणों के दोनों बगल में तिरछी रेखा पर माया बीज (ह्रीं) तथा केसर पर

  1. क. सर्वासु।

(50) अगस्त्य-संहिता स्वर लिखें। पूर्व की तरह मालामन्त्र दलों पर लिखकर दशाक्षरी मन्त्र से संवेष्टित कर ‘क’ आदि व्यञ्जन लिखें तथा दिशा और उसके कोणों में नरसिंह (क्ष्रौं) और वराह के बीज (ह्रौं) लिखें। एतद्यन्त्रान्तरं चात्र साङ्गावरणमर्चयेत्। सौवर्णे राजते भूर्जे लिखित्वाचनमाचरेत् ।।19।। इस यन्त्र अथवा दूसरे यन्त्र की पूजा अंगों एवं आवरण के साथ करें। इस यन्त्र को सोना, चांदी या भूर्जपत्र पर लिखकर पूजा प्रारम्भ करें। हुं जानकीवल्लभाय स्वाहा क्षौ हं विनिर्देशेत्। दशाक्षरो वराहस्य नृसिंहस्य मनुः स्मृतः ।।20।। “हुं जानकीवल्लभाय स्वाहा क्षौं हं” यह नृसिंह और वराह का दशाक्षर मन्त्र है। ह्रीं श्रीं क्लीं चोंन्नमो ब्रूयात् ततो भगवते पदम्। रघुनन्दनायेति पदं ¹ रक्षोघ्नविशदाय च ।।21।। मधुरेति प्रसन्नेति वदनाय पदं वदेत्। विशेषणं पञ्चमं च ब्रूयादमिततेजसे ।। 22 ।। ततो बलाय रामाय विष्णवे नम इत्यपि। ह्रीं श्रीं क्लीं नमो भगवते रघुनन्दनाय रक्षोघ्नविशदाय मधुरप्रसन्नवदनाय अमिततेजसे बलाय रामाय विष्णवे नमः । ² मालामन्त्र का स्वरूप - "ह्रीं श्रीं क्लीं ॐ नमः' बोलें। इसके बाद 'भगवते' यह शब्द बोलें। इसके बाद 'रघुनन्दनाय' यह शब्द, फिर 'रक्षाघ्नविशदाय' भी बोलें। तब 'मधुर' 'प्रसन्न' और 'वदनाय' बोलें। तब विशेष रूप से पाँचवाँ पद 'अमिततेजसे' यह बोलें। तब 'बलाय' 'रामाय' और 'विष्णवे नमः' यह भी बोलें। इस प्रकार मन्त्र का ऐसा स्वरूप होगा- ह्रीं श्रीं क्लीं नमो भगवते रघुनन्दनाय रक्षोघ्नविशदाय मधुरप्रसन्नवदनाय अमिततेजसे बलाय रामाय विष्णवे नमः। मालामन्त्रोऽयमुद्दिष्टो नृणां चिन्तामणिः स्मृतः। ॐश्रीं सीतायै वह्निजाया तु सीतामन्त्र उदाहृतः ।।23।।

  1. घ. रघुनन्दनाय पदं ब्रूयाद्रक्षोघ्नविशदाय च। 2. घ. में अनुपलब्ध।

दशमोऽध्यायः (51)

यह मालामन्त्र कहा जाता है जो साधकों के लिए 'चिन्तामणि के रूप में धारण किया जाता है।' ॐ श्रीं सीतायै' के साथ वह्निजाया (स्वाहा) लगाकर सीतामन्त्र है। यन्त्रेऽस्मिन् राममाराध्य साङ्गावरणमादरात्। आराध्य गुलिकीकृत्य ¹ धारयेद्यन्त्रमन्वहम्।।24।। इस यन्त्र पर आदरपूर्वक अंग-पूजा और आवरण-पूजा के साथ श्रीराम की आराधना कर इस यन्त्र को मोड़कर गोल बनाकर प्रतिदिन धारण करना चाहिए। दारिद्र्यदुःखशमनं पुत्रपौत्रप्रदन्तथा। ऐश्वर्यकृद् वश्यकरं शत्रुसंहारकारकम्।।25।। विद्याप्रदं सौख्यकरं रोगशोकनिवारणम्।।26।। पराभिचारकृत्येषु वज्रपञ्जरमुच्यते। किं मन्त्रं बहुनोक्तेन सर्वसिद्धिप्रदं मुने।।27।। यह यन्त्र दारिद्र्य और दुःख का शमन करता है; पुत्र और पौत्र प्रदान करनेवाला है, ऐश्वर्य देता है, सबको वश में ला देता है शत्रुओं का संहार करता है। यह विद्या देनेवाला, सुख देनेवाला, रोग और शोक को हटानेवाला है। दूसरे पर अभिचार कर्मों में 'वज्रपंजर' कहलाता है। अनेक बार मन्त्र जपने से क्या लाभ? यह यन्त्र ही सभी सिद्धियों को प्रदान करनेवाला है। इत्यगस्त्यसंहितायां यन्त्रविधिर्नाम नवमोऽध्यायः।।9।। दशमोऽध्यायः अगस्त्य उवाच पूजाविधानं वक्ष्यामि नारदाभिमतं च यत्। वाल्मीकये मुनीन्द्राय द्वारपूजादिकं तथा।।1।। आकर्णय मुनिश्रेष्ठ सर्वाभीष्टफलप्रदम्।।2।। अगस्त्य बोले- हे मुनि श्रेष्ठ सुतीक्ष्ण! नारद ने मुनिश्रेष्ठ वाल्मीकि को जो पूजा तथा द्वार पूजा विधि बतलायी थी वह में कहता हूँ, उसे सुनो इससे सभी मनोरथ सफल हो जाते हैं।


  1. क. गुटिकीकृत्य।

(52) अगस्त्य-संहिता ———————————————————————————— श्रीरामद्वारपीठाङ्गपरिवारतया स्थिताः। ये सुरास्तानिह स्तौमितन्मूलाः सिद्धयो यतः। श्रीराम के द्वार पर, पीठ पर, अङ्ग के रूप में तथा परिवार के रूप में जो देवगण उल्लिखित हैं, उनकी स्तुतियाँ मैं करता हूँ; क्योंकि सिद्धियाँ उन्ही के द्वारा प्राप्त होतीं हैं। वन्दे गणपतिं भानुं त्रिलोकस्वामिनं शिवम्।।३।। क्षेत्रपालं तथा धात्रीं विधातारमनन्तरम्। गृहाधीशं गृहं गङ्गां यमुनां कुलदेवताम्।।४।। प्रचण्डचण्डौ च तथा शंखपद्मनिधी अपि। वास्तोष्पतिं द्वारलक्ष्मीं गुरुं वागधिदेवताम्।।५।। सर्वप्रथम गणेश, सूर्य, तीनों लोकों के स्वामी शिव, क्षेत्रपाल तथा धात्री की पूजा करें। इसके बाद ब्रह्मा की पूजा करें। फिर वास्तु के स्वामी, वास्तु, गंगा, यमुना और कुलदेवता की पूजा करें। प्रचण्डा, चण्ड, शंख, पद्म, निधि, वास्तोष्पति, द्वारलक्ष्मी, गुरु और वाक् की देवता सरस्वती की पूजा करें। एताः संपूज्य भक्त्याहं श्रीरामद्वारदेवताः। महामण्डूककालाग्निरुद्राभ्यां प्रणमाम्यहम्।।६।। आधारशक्तिकूर्माभ्यां नागाधिपतये तथा। पृथिव्यै च तथा लक्ष्म्यै सागराय¹ नमो नमः।।७।। श्वेतद्वीपाय रत्नाद्रौ कल्पवृक्षाय ते नमः। सुवर्णमण्डपायाथ पुष्पकाय महार्हते।।८।। विमानायाष्टरत्नाय सम्यक्सिंहासनाय च। उद्यदादित्यसंशोभिपद्माय तदनन्तरम्।।९।। श्रीराम के इन द्वार-देवताओं की पूजा कर प्रार्थना करें- 'महामण्डूक और कालाग्निरुद्र को प्रणाम करता हूँ। आधारशक्ति और कूर्मदेव को प्रणाम। शेषनाग को प्रणाम। पृथ्वी, लक्ष्मी और सागर को प्रणाम। श्वेतद्वीप और रत्नपर्वत पर स्थित कल्पवृक्ष को प्रणाम। सुवर्ण-मण्डप और विशाल पुष्पक विमान को प्रणाम। आठो रत्नों को और सुन्दर सिंहासन को प्रणाम। इसके बाद उगते हुए सूर्य के समान शोभायमान कमल पुष्प को प्रणाम।

  1. क. क्षीरसागराय

दशमोऽध्यायः (53) नमामि धर्मज्ञानाभ्यां वैराग्याद्यग्नितः क्रमात्। ऐश्वर्याय नमो धर्मज्ञानाभ्यां पूर्वतस्तथा।।10।। अवैराग्याय च तथानैश्वर्याय नमो नमः। इसके बाद धर्म, ज्ञान, वैराग्य और ऐश्वर्य को अग्निकोण से आरम्भ चारो कोणों में प्रणाम। पूर्व में धर्म और अज्ञान, दक्षिण में ज्ञान और अवैराग्य पश्चिम में वैराग्य और अनैश्वर्य तथा उत्तर में ऐश्वर्य और अधर्म को प्रणाम। अं अर्कमण्डलायाहमुपुर्युपरि सर्वदा।।11।। सत्त्वाय रजसे नित्यं तमसेपि नमो नमः। चं चन्द्रमण्डलमिति ध्यात्वाध्यात्वा नमाम्यहम्।।12।। रमग्निमण्डलायेति सम्पूज्यैव प्रयत्नतः। विमलोत्कर्षिणीज्ञानाक्रियायोगाभ्य इत्यपि।।13।। नमामि प्रह्वीसत्याभ्यामीशानायै दलान्तरे। पूर्वावितोऽनुग्रहायै प्रणमामि तदन्तरे।।14।। यन्त्र पर सूर्यमण्डल के ऊपर हमेशा सत्त्व, रजस् और तमस् को प्रणाम। चन्द्रमण्डल को बार-बार ध्यान कर प्रणाम। ‘रं’ स्वरूप अग्निमण्डल को प्रणाम। इस प्रकार यत्नपूर्वक पूजित दलों के मध्य में- विमला, उत्कर्षिणी, ज्ञाना, क्रिया, योगा, प्रह्वी, सत्या और ईशाना' को पूर्व से प्रारम्भ कर प्रणाम। इसके बाद अनुग्रहा को प्रणाम। नमो भगवते तद्वद् विष्णवे तदनन्तरम्। सर्वभूतात्मने चेति वासुदेवाय इत्यपि¹।।15।। ततः सर्वात्मकायेति योगपीठात्मने नमः।। प्रणवादिनमोऽन्ताय मन्त्रपीठात्मने नमः।।16।। इसके बाद भगवान् विष्णु को प्रणाम। प्रत्येक प्राणी की आत्मा में रहनेवाले वासुदेव को प्रणाम। तब सभी की आत्मा के स्वरूप योगपीठ स्वरूप सिंहासन को प्रणाम। आदि में प्रणव (ॐकार) और अन्त में ‘नमः’ से युक्त मन्त्र पीठस्वरूप को प्रणाम। यजामहे स्वरामोँ ह्रीं आत्मना संव्यवस्थितौ। नमोऽन्ताय रामाय ससीताय नमो नमः।।17।।

  1. घ. इत्यथ। Rarest Archiver

(54) अगस्त्य-संहिता

सान्निध्याधारयोगेन नियतेन षडात्मना। व्यवस्थिताय रामाय नमोऽनन्ताय विष्णवे¹।।18।। श्रीबीजाद्योऽपि सीतायै स्वाहान्तोऽयं षडक्षरः। तदेतन्मन्तरूपाय रामाय ज्योतिषे नमः।।19।। ॐ रां रां यजामहे, ॐ ह्रीं आत्मने नमः, ॐ रामाय नमः, ॐ ससीताय नमः। सान्निध्य और आधार के संयोग से नियत रूप में जो छह स्वरूपों में स्थित हैं, ऐसे श्रीराम को प्रणाम। ॐ अनन्ताय नमः, ॐ विष्णवे नमः, ॐ श्रीं सीतायै स्वाहा ये षडक्षर मन्त्र हैं। इन मन्त्रों के स्वरूप ज्योतिःस्वरूप राम को प्रणाम। सानुस्वारस्वरान्ताय वह्नये हृदयाय च। नमश्चैव स्वरान्ताय स्वाहान्ताय कृशानवे।।20।। शिरसेऽप्यग्नये चान्तः शिखायै वषडात्मने।। ऐमस्त्राय हृदे नित्यं कवचाय हुं ते नमः²।।21।। चतुर्दशस्वरान्ताय सानुस्वाराय वह्नये।। नेत्राभ्यां वौषडान्ताय परोऽस्त्राय, फडत्मने।।22।। अनुस्वार के साथ अन्त में रेफ लगाकर वह्निदेव से न्यस्त हृदय को प्रणाम। वृद्धि के स्वामी अग्नि को प्रणाम। (एधेश्वराय कृशानवे स्वाहा) शिर पर न्यस्त वकार सहित अग्नि को प्रणाम (वं अग्नये शिरसे स्वाहा) वषट्कार जो शिखा पर न्यस्त हैं उन्हें प्रणाम। (‘शिखायै वषट्’) ऐं सहित वह्नि, जो नित्य कवच स्वरूप हैं उन्हें प्रणाम (ऐं वह्नये कवचाय हुम्) अनुस्वार सहित चतुर्दश स्वरों के साथ वह्नि जो वौषट् स्वरूप दोनों नेत्रों में न्यस्त हैं उन्हें प्रणाम (अं आं इं ईं उं ऊं ऋं ॠं लृं लॄं एं ऐं ओं औं वह्नये नेत्राभ्यां वौषट्) इसके बाद फट् स्वरूप अस्त्र को प्रणाम (अस्त्राय फट्) एवं नमः षडङ्गाय रामाय ज्योतिषे नमः। आत्मान्तरात्मपरमज्ञानात्मभ्योऽग्नितः क्रमात्।।23।। इस प्रकार आत्मा, अन्तरात्मा, परमात्मा, ज्ञानात्मा स्वरूप जो ज्योतिः स्वरूप राम क्रमशः अग्नि, नैर्ऋत्य, वायव्य और ईशान कोण में स्थित हैं, उन्हें प्रणाम। निवृत्त्यै च प्रतिष्ठायै विद्यायै ते नमाम्यहम्। शान्त्यै चात्मादिशक्तित्वे स्थित्यै तद्रूपिणे नमः।।24।।

  1. घ. वह्नये। 2. घ. हुमेव च।

दशमोऽध्यायः (55) वासुदेवाय ते नित्यं तथा संकर्षणाय च। प्रद्युम्नायानिरुद्धाय श्रियै शान्त्यै नमो नमः।।25।। प्रीतै रत्यै नमो राम द्वितीयावरणात्मने। निवृति, प्रतिष्ठा, विद्या और शान्ति जो आत्मा आदि चारों की शक्तियाँ हैं, उन्हें प्रणाम। वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्न, अनिरुद्ध इन चारो को प्रणाम। पुनः श्रीः, शान्ति, प्रीति और रति जो इनकी शक्तियाँ हैं, उन्हें द्वितीयावरण में प्रणाम। अग्रे हनूमान् सुग्रीवो भरतश्च विभीषणः ।।26।। लक्ष्मणोऽप्यङ्गदश्चैव शत्रुघ्नो जाम्बवाँस्तथा। धृष्टिर्जयन्तो¹ विजयः सुराष्ट्रो राष्ट्रवर्द्धनः ।।27।। अकोपो धर्मपालश्च सुमन्तश्चाष्टमन्त्रिणः। एतेभ्यो रामरूपेभ्यो युष्मभ्यं प्रणमाम्यहम् ।।28।। आगे में हनूमान्, सुग्रीव, भरत, विभीषण, लक्ष्मण, अंगद, शत्रुघ्न, जाम्बवान्, धृष्टि, जयन्त, विजय, सुराष्ट्र, राष्ट्रवर्द्धन, अकोप, धर्मपाल और सुमन्त ये आठ मन्त्री हैं। ये सोलह, जो रामस्वरूप हैं, उन्हें प्रणाम। इन्द्राग्नियमदेवेभ्यो सायुधेभ्यो नमो नमः। नमो निर्ऋतये तुभ्यं वरुणाय नमो नमः।।29।। वायवे धनदायाथ रुद्रायेशाय ते नमः। ब्रह्मणेऽनन्तरूपाय दिक्पालायात्मने नमः।।30।। अपने अपने अस्त्र-शस्त्रों के साथ इन्द्र, अग्नि, यम, निर्ऋति, वरुण, वायु, कुबेर, रुद्र, ब्रह्मा और अनन्त इन दश दिक्पालों को प्रणाम। तदायुधाय वज्राय शक्तये दण्डकाय च। नमः खड्गाय पाशाय ध्वजाय च गदात्मने ।।31।। त्रिशूलायाम्बुजायाथ चक्राय सततं नमः। इनके अस्त्र-शस्त्र स्वरूप वज्र, शक्ति, दण्ड, खड्ग, पाश, ध्वज, गदा, त्रिशूल, कमल और चक्र को सदा प्रणाम। वसिष्ठो वामदेवश्च जाबालिर्गौतमस्तथा।।32।। भरद्वाजः कौशिकश्च वाल्मीकिर्नारदस्तथा।

  1. घ. धृतिर्जयन्तो ।

(56) अगस्त्य-संहिता

वसिष्ठ, वामदेव, जाबालि, गौतम, भरद्वाज, कौशिक, वाल्मीकि और नारद ये आठ पार्षद ऋषि हैं। नलं नीलं च गवयं गवाक्षं गन्धमादनम् ।।33।। सुरभिश्चापि मैन्दं च द्विविदं च जपेत् क्रमात् ।¹ नल, नील, गवय, गवाक्ष, गन्धमादन, सुरभि, मैन्द और द्विविद का भी क्रमशः जप करना चाहिए। शङ्खचक्रगदापद्मशार्ङ्गबाणात्मने नमः ।।34।। गरुत्मते नमस्तुभ्यं विष्वक्सेनादिकाश्च ये। शंख, चक्र, गदा, पद्म, शार्ङ्ग और बाण इन शस्त्रास्त्रों को प्रणाम। हे गरुड़ आपको प्रणाम, शार्ङ्ग धारण करने वाले विष्वक्सेन आदि को प्रणाम। सर्वैश्वर्यस्वरूपाय ज्योतिषे सततं नमः ।।35।। मनोवाक्कायसहितं कर्म यद् वा शुभाशुभम् ।। तत्सर्वं प्रीतये भूयान्नमो रामाय शार्ङ्गिणे ।।36।। सभी प्रकार के ऐश्वर्य के स्वरूप तथा प्रकाशस्वरूप श्रीराम को प्रणाम। मेरे मन, वचन तथा शरीर से जो भी शुभ अथवा अशुभ कर्म किये गये हैं उन सबसे श्रीराम प्रसन्न हों। शार्ङ्ग धनुषधारी श्रीराम को प्रणाम। एतद् रहस्यं सततं प्रत्यूषसि समाहितः। यः पठेद् राममाहात्म्यं सर्वैश्वर्यनिधिर्भवेत् ।²।37।। विनाशयेदसौभाग्यं दारिद्र्यौघं निकृन्तयेत्। उपद्रवांश्च शमयेत् सर्वलोकं वशं नयेत् ।।38।। यः पठेत् प्रातरुत्थाय ब्रह्मार्पणधियान्वहम्। स याति शाश्वतं ब्रह्म पुनरावृत्तिदुर्ल्लभम् ।।39।। जो प्रतिदिन प्रातःकाल इस रहस्यमय राम माहात्म्य का पाठ करते हैं, वे सभी ऐश्वर्यों के भण्डार बन जाते हैं। यह माहात्म्य दुर्भाग्य का विनाश करता है; दरिद्रताओं को काटता है, उपद्रवों को शान्त करता है, सबको वश में ला देता है। जो प्रातःकाल उठकर ब्रह्म को समर्पित करने की बुद्धि से प्रतिदिन स्तोत्र का पाठ करते हैं। वे उस अविनाशी ब्रह्म को पा लेते हैं, जहाँ से पुनर्जन्म नहीं होता।

  1. घ. ये चार चरण में अनुपलब्ध। 2. घ. विश्वैश्वर्य० Rarest Archiver

एकादशोऽध्यायः (57) ———————————————————————————————— नारदीयमिदं स्तोत्रं सुतीक्ष्ण मुनिसत्तम। पठितव्यं प्रयत्नेन रामार्चनपरायणैः।।40।। हे मुनिश्रेष्ठ सुतीक्ष्ण! यह नारदोक्त स्तुति है जिसे श्रीराम की उपासना करनेवालों को प्रयत्नपूर्वक पढ़ना चाहिए। गणपत्यादयः सर्वे द्वाराङ्गावृत्तिरूपिणः। प्रणवादिचतुर्थ्यादिनमोन्ताः स्वस्वनामभिः।।41।। पूजनीयाः प्रयत्नेन गन्धपुष्पाक्षतादिभिः। उपचारैः षोडशभिः तथैकादशभिर्मुने¹।।42।। पंचभिर्वा प्रयत्नेन स्वशक्त्यानुरूपतः। गणपति आदि सभी जो द्वारदेवता, अङ्ग देवता और चारो ओर फेरा लगानेवाले (परिक्रमा करनेवाले) देवता हैं, उनकी पूजा गन्ध, पुष्प, अक्षत आदि से प्रणव (ॐकार) आरम्भ में तथा नमः अन्त में लगाकर अपने अपने नाम के चतुर्थ्यन्त पद से पंचोपचार, एकादशोपचार तथा षोडशोपचार से अपनी शक्ति के अनुसार करें। गणपत्यादयोऽप्येवं पूजनीयाः प्रयत्नतः।। ²गणपत्यादयो ह्येते पूजिताः पूजयन्त्यपि।।43।। ³तस्मात् सर्वप्रयत्नेन स्तोत्रमेतत् समभ्यसेत्।।44।। इसी प्रकार गणपति आदि की भी पूजा करनी चाहिए। ये गणपति आदि पूजित होकर स्वयं श्रीराम की पूजा करते हैं, अतः सभी उपायों से इस स्तोत्र का अभ्यास करना चाहिए। इत्यगस्त्यसंहितायां परमरहस्ये पूजाविधिर्नाम दशमोऽध्यायः।


  1. घ. पुनः। 2.-3. घ. में अनुपलब्ध।

(58) अगस्त्य-संहिता एकादशोऽध्यायः अगस्त्य उवाच शरीरं शोधयेदादावधिकारार्थमन्वहम्। तीर्थावगाहनं बाह्येऽप्यन्तर्भूतविशोधनम्।।1।। मातृकान्यासयोगैश्च शोधयेद् विध्यनुष्ठितः। अगस्त्य बोले- प्रतिदिन पूजा के अधिकारी बनने के लिए सबसे पहले शरीर की शुद्धि करें। बाह्य शोधन के लिए जल में डुबकी लगावें तथा आन्तरिक शोधन के लिए विधिपूर्वक मातृकावर्णों का न्यास करें। पूजाद्रव्याणि च ततः शोधयेत् प्रोक्षणादिभिः।।2।। पूजापात्राणि शङ्खञ्च शोधयेत् क्षालनादिना। शुद्धश्च शुद्धद्रव्यैश्च पूजयेत् पुरुषोत्तमम्।।3।। एवमाराधितो देवः सम्यगाराधितो भवेत्। न चेन्निरर्थकं सर्वं सिन्धुसैकतवृष्टिवत्।।4।। इसके बाद पोंछकर पूजा में प्रयुक्त सामग्रियों का शोधन करें। पूजा की थाली, लोटा, शंख, आदि को जल से धोवें। पवित्र पात्रों और सामग्रियों से पुरुषोत्तम की पूजा करनी चाहिए। इस प्रकार आराधना करने से देवता अच्छी तरह प्रसन्न होते हैं, नहीं तो समुद्र की रेत पर हुई वर्षा के समान सब कुछ व्यर्थ हो जाता है। शौचाचमनहीनस्य स्नानसन्ध्यादिकाः क्रियाः। निष्फलाः स्युर्यथा चेतो ह्यन्तरेण भवेत्तथा।।5।। शौच और आचमन किये विना जो स्नान, सन्ध्या आदि करते हैं, उनकी समस्त क्रियाएँ व्यर्थ हो जाती हैं, जैसे चेतन के विना सब कुछ व्यर्थ हो जाता है। संशोध्य पूजाद्रव्याणि स्वस्यापि बहिरन्तरम्। शङ्खञ्च पूजयेत् पूर्वं पूज्यं पूजार्हतां व्रजेत्।।6।। पूजा-सामग्रियों को पवित्र कर स्वयं भी बाहर और भीतर से पवित्र होकर शंख की पूजा करें। पहले पूजित शंख पूजा का साधन बनने योग्य होता है।

एकादशोऽध्यायः (59) पूजकस्याथ पूज्यस्यापावनस्य कृतं वृथा। अपावनान्यपूज्यानि साधनानि विवर्जयेत्।।7।। अपवित्र पूजक और पूज्य दोनों द्वार किए गये कार्य व्यर्थ हो जाते हैं। अतः अपवित्र एवं अपूज्य साधन का त्याग कर देना चाहिए। अतः स्नात्वा प्रकुर्वीत भूतशुद्धिं विधाय च। विन्यस्य मातृकां पूर्वं वैष्णवीं केशवादिकाम्।।8।। इसलिए स्नान करके भूत-शुद्धि कर पहले वैष्णव और केशव की मातृका का न्यास करें। विधाय तत्त्वन्यासञ्च न्यासं तन्मूर्तिपञ्जरम्। तदृषिच्छन्दसोन्यासं¹ तथा तन्मन्त्रदेवताम्।।9।। विन्यस्यैव षडङ्गानि तत्तद्बीजाक्षराणि च। इसके बाद तत्त्वन्यास, मूर्ति-पंजरन्यास, ऋषि-न्यास, छन्दोन्यास, मन्त्र- न्यास तथा देवता-न्यास करें। इस छह अंगों का न्यास कर उनके बीजाक्षरों का भी न्यास करें। अथातो देवताध्यानं ततः पूजनमन्ततः।।10।। ततो निवेद्य तत्सर्वं जपेन्मन्त्रमनन्यधीः। ततो विज्ञाप्य देवेशं परिवारांश्च पूजयेत्।।11।। एवं सम्पूजितो देवः सर्वान् कामान् प्रयच्छति। इसके बाद देवता का ध्यान कर पूजन करें। इसके बाद सब कुछ निवेदित कर अनन्यचित्त होकर मन्त्र का जप करें। तब मुख्य देव श्रीराम को सबकुछ ज्ञापित कर श्रीराम के परिजनों की पूजा करें। इस प्रकार पूजित देव सभी कामनाओं की पूर्ति करते हैं। बाह्यपूजां ततः कुर्यादैहिकाभ्युदयाय वै।।12।। विलिप्य वेदिकां सम्यङ्मण्डलं तत्र कारयेत्। तब सांसारिक उन्नति के लिए बाह्य पूजा करें। तब वेदिका को लीप कर वहाँ उचित रीति से यन्त्र का निर्माण करावें।

  1. घ. छन्दसौऽभ्यासं।

(60) अगस्त्य-संहिता

शालितण्डुलचूर्णैश्च नीलपीतसितासितैः।।13।। लिखेदष्टदलं पद्मं चतुरस्रसमावृतम्। षट्कोणं कर्णिकामध्ये कोणाग्रे वृत्तसंवृतम्।।14।। धान के चावल के चूर्ण से नीला, पीला, सफेद और अन्य रंगों से चौकोर भूपुर सहित अष्टदल कमल बनायें और कर्णिका पर षट्कोण बनाकर उसके कोणाग्रभाग पर वृत्त बनाएँ। साध्यमेतत् ततो शोभारेखाभिरुपशोभितम्। सम्पूज्य मण्डलं चैव तत्र सिंहासनं न्यसेत्।।15।। बीच में साध्य लिखकर सुन्दर रेखाओं से शोभित मण्डल की पूजा कर वहीं श्रीराम और श्रीसीताजी का सिंहासन रखें। चन्द्रोदयपताकैश्च तोरणैरपि सर्वतः। विचित्रं तत्र तत्रापि भित्तिस्तम्भस्थलादिषु।।16।। चाँदोवा, पताका और बंदनवार से सर्वत्र अनेक प्रकार से सुन्दर ढंग से दीवाल खम्भा आदि को सजायें। एवं सुशोभितस्थाने सर्वमङ्गलसंयुते। पुण्यस्त्रीभिर्गृहस्थैश्च परितो व्यवहर्तृभिः।।17।। गायद्भिरपि नृत्यद्भिर्वदद्भिः स्तुतिपूर्वकम्।¹ भेरीमृदङ्गवंश्यादिकांस्यतालादिभिर्बहु² ।।18।। ³वादयद्भिश्च बहुधा सम्यगाराधितो यदि। रघुनाथः स्वयं तत्र प्रसन्नो भगवान् भवेत्।।19।। इस प्रकार शुभ वस्तुओं से सुशोभित, पुण्यवती स्त्रियों और गृहस्यों पूजा- सामग्रियों को लानेवाले लोगों, गायकों, नर्तकों और अनेक स्तुति करनेवालों, तुरही, मृदङ्ग, बाँसुरी, झाल आदि बजानेवालों से घिरे हुए स्थान में सम्यक् पूजित होकर श्रीराम स्वयं वहाँ प्रसन्न होते हैं। संपाद्य विविधैः पुष्पैः पूजयेच्चारुडालिकाम्।⁴ तुलसी पद्मजात्याद्यैर्माल्यैर्बहुविधैरपि।।20।। अनेक प्रकार के फूलों, कमल, जूही, विभिन्न प्रकार की माला तथा तुलसीदल आदि से भरी सुन्दर डाली (चंगेरी) की पूजा करें।

  1. घ. स्तुतिरूपकम्। 2. घ. ºर्मुहुः। 3. घ. में अनुपलब्ध। 4. पूजयेत्पुष्पचंदनीम्।

एकादशोऽध्यायः (61) स्वपुरो दक्षिणे तीर्थशुद्धवारिसुपूरितम्। कलशं स्वपुरो वामभागे तु विनियोजयेत्।।21।। अन्यानि पूजाद्रव्याणि पुरस्तादेव निक्षिपेत्। इसे अपने आगे दाहिने भाग में रखें तथा तीर्थ के जल से भरा हुआ कलश अपने आगे वायें भाग में रखें। पूजा की अन्य सामग्रियाँ सामने में ही रखें। आराधनाय देवस्य वेदिकाधः सुखासने।।22।। कुशास्तरणवैव्याघ्रचर्मवासो - विनिर्मिते । उपविश्य शुचिर्मौनी भूत्वा पूजां समाचरेत्।।23।। देव की आराधना के लिए वेदी के नीचे सुख से बैठने योग्य आसन, जो कुश, व्याघ्रचर्म या कपड़े का बना हुआ हो उसपर मौन होकर बैठें और पूजा का आरम्भ करें। तुलसीकाष्ठघटितैः रुद्राक्षाकारकारितैः। शङ्खचक्रगदापद्मपादुकाकारकारितैः ।।24।। निर्मितां मालिकां कण्ठे¹ निधायार्चनमाचरेत्। रुद्राक्ष, शङ्ख, चक्र, गदा, पद्म या पादुका की आकृति की बनी हुई तुलसीकाष्ठ की माला कण्ठ में धारण कर पूजा प्रारम्भ करें। तथामलकमालां च सम्यक् पुष्करमालिकाम् ।।25।। निर्माल्य तुलसीमालां शिरस्यपि निधाय वै। साथ ही, आँवले के पुष्प की माला, या कमल की सुन्दर माला या तुलसी की माला शिर पर रखकर पूजा आरम्भ करें। निर्लिप्य² चन्दनेनाङ्गमङ्कयेत् तस्य नामभिः। तस्यायुधानि बाह्वोश्च तेनैव द्विजसत्तम। अंगों पर चन्दन से श्रीराम के नामों का लेखन करें तथा बाहों पर उनके धनुष, बाण, गदा आदि आयुधों का अंकन उसी चन्दन से करें। पापिष्ठो वाप्यपापिष्ठः सर्वज्ञोऽप्यज्ञ एव वा।।27।। भवेदेवाधिकारोऽत्र पूजाकर्मण्यसंशयः।

  1. घ. कर्णे। 2. घ. निर्माल्य। Rarest Archiver

(62) अगस्त्य-संहिता

पापी हो या निष्पाप, विद्वान् हो या मूर्ख, श्रीराम की पूजा में सबका अधिकार है, इसमें सन्देह नहीं। पद्मस्वस्तिकभद्रादिरूपेणाकुञ्च्य पद्द्वयम् ।।२८।। पद्मासन, भद्रासन या स्वस्तिकासन के रूप में दोनों पैरों को मोड़कर बैठें। विनायकं नमस्कृत्य सव्यांशे च सरस्वतीम्। दक्षिणांशे पूर्ववच्च दुर्गां च क्षेत्रपं पुनः ।।२९।। प्रणम्याथ गुरून् भूयो नत्वा गुरुपरम्पराम्। गणेशजी को प्रणाम कर बायें भाग में सरस्वती को तथा पूर्ववत् दायें भाग में पर दुर्गा का न्यास कर पुनः वहीं क्षेत्रपाल का न्यास कर उन्हें प्रणाम करें। गुरु को प्रणाम कर अपनी गुरु-परम्परा को प्रणाम करें। ततो देवं नमस्कृत्य कुर्यात् तालत्रयं पुनः ।।३०।। तारमस्त्राय¹ फट् प्रोक्ता भ्रामयेद् दक्षिणं करम्। तब देवता को प्रणाम कर तीन ताल की क्रिया (तेताला) करें। तब “ॐ अस्त्राय फट्” इस मन्त्र से दाहिने हाथ को घुमावें। ततस्तु चिन्तयेद्देवमन्तःस्थानत्रयान्तरे ।।३१।। ज्योतिर्मयमनःपूतं सत्यं ज्ञानसुखात्मकम्। तब ज्योतिःस्वरूप, प्राणियों में पवित्र, सत्य, ज्ञान और सुख-स्वरूप देवता का ध्यान अन्तःकरण के तीनों में करें। आत्मनः परितो वह्निं प्राकारं त्राणाय च ।।३२।। भूतप्रेतपिशाचेभ्यो विधाय तदनन्तरम्। अद्भिः पुण्याक्षतैश्चैव वह्निबीजास्त्रमन्त्रितैः ।।३३।। प्रक्षिपेत् परितो मन्त्री भयविघ्ननिवृत्तये। इसके बाद घर की रक्षा के लिए अपने चारों ओर अग्नि का पूजन करें। तब भूत, प्रेत और पिशाच के लिए जल, अक्षत लेकर वह्निबीज (रं) एवं अस्त्र- मन्त्र ‘फट्’ से अभिमन्त्रित कर भय और विघ्न के नाश के लिए चारों ओर छिड़के। हृदम्बुजे ब्रह्मकन्दसम्भूते ज्ञाननालके ।।३४।। ऐश्वर्याष्टदलोपेते ज्ञानवैराग्यकर्णिके।² आराग्रमात्रो जीवस्तु चिन्तनीयो मनीषिभिः ।।३५।।

  1. क. ॐ कारश्चास्त्राय। 2. घ. परे वैराग्यकर्णिके।

एकादशोऽध्यायः (63) हृदय रूपी कमल के ब्रह्म रूपी कन्द से निकले हुए ज्ञान रूपी नाल पर ऐश्वर्य आदि आठ दलों वाला कमल है, जिसकी कर्णिका (कमल का मध्य भाग) ज्ञान और वैराग्य की है, इस कमल पर आरे की नोंक के समान सूक्ष्म जीव अवस्थित है, इस प्रकार का ध्यान मनीषियों को करना चाहिए। नेतव्यो हंसमन्त्रेण द्वादशान्तः स्थितः परः। तेन संयोज्य विधिवत् भूतशुद्धिमथाचरेत्।।36।। द्वादशार चक्र से इसे 'हं सः' इस मन्त्र से ऊपर लाना चाहिए और उससे शरीर का संयोजन कर भूत-शुद्धि करना चाहिए। भूतानि चाथ¹ पृथिवी जलं तेजो मरुद् वियत्। यद्यतो जायते तस्मिन् प्रलयोत्पादनं पुनः।।37।। पृथिवी, जल, अग्नि, वायु और आकाश ये पाँच भूत हैं, जहाँ से सृष्टि की उत्पत्ति होती है और पुनः उसी से जा मिलती है और पुनः उत्पन्न होती है। शरीराकारभूतानां भूतानां शोधनं विदुः। मरुदग्निसुधाबीजैः पञ्चाशन्मातृमात्रकैः।।38।। प्राणान्निरुध्यात्मदेहं शोधयेत् तत्पुनर्दहेत्। तं देहं पुनराप्लाव्य पुनर्जीवमिहानयेत्।।39।। शरीर के आकार में स्थित इन पाँच भूतों की शुद्धि ही भूतशुद्धि है। वायुबीज (यं) अग्निबीज (रं) और सुधाबीज (वं) के साथ पचास मातृकाओं से यह क्रिया करें। इसमें सबसे पहले प्राणवायु को रोककर अपने सूक्ष्म शरीर का शोधन करें, फिर उस अध्यात्म रूप सूक्ष्म शरीर को अग्नि में जलावें, फिर उसे जल मे डुबोकर जीव को शरीर में प्रविष्ट करावें। जीवने पुनरात्मानं चिन्तयेत् पुरुषाप्तये। जीवस्य तत्त्वसिद्धयै च तस्याप्यात्मत्वसिद्धये।।40।। जीवन में फिर पुरुषस्वरूप की प्राप्ति के लिए जीव के तत्त्व की सिद्धि तथा आत्मत्व की सिद्धि के लिए आत्मतत्त्व का चिन्तन करें। नयनानयनार्थं च हंसः सोऽहमितीरयेत्। भूतशुद्धिरियं नाम कर्त्तव्या मनसार्थकत्²।।41।।

  1. घ. नाम। 2. घ. भूतसाक्ष्यकृत्।

(64) अगस्त्य-संहिता

शरीर से जीव को अलग करने और लाने के लिए क्रमशः 'ॐ हंसः' और 'ॐ सोऽहम्' इन मन्त्रों का प्रयोग करें। यह भूतशुद्धि कहलाती है, जो मन से करनी चाहिए। इससे प्रयोजन की सिद्धि होती है। भूतशुद्धिं विना यस्य तपहोमादिकाः क्रियाः।¹ भवन्ति निष्फलाः सर्वाः प्रकारेणाप्यनुष्ठिताः।।42।। भूत शुद्धि के बिना जो तप, होम आदि क्रियाएँ करते हैं, उनकी सभी क्रियाएँ विधानपूर्वक करने के बाद भी निष्फल होती हैं। गृहोपसर्पणं चैव तथानुगमनं हरेः। भक्त्या प्रदक्षिणं चैव पादयोः शोधनं विदुः²।।43।। भगवान् के गृह (मन्दिर) जाना, श्रीहरि का अनुगमन करना तथा भक्ति पूर्वक प्रदक्षिणा करना ये तीन पैरों की शुद्धि है। पूजार्थं पत्रपुष्पाणां भक्त्यैवोत्तोलनं हरेः। करयोः सर्वशुद्धीनामियं शुद्धिविशिष्यते।।44।। श्रीहरि की पूजा के लिए पत्र-पुष्प पहुँचाना हाथों की अनेक प्रकार की शुद्धियों में विशिष्ट मानी जाती है। तन्नामकीर्तनं चैव गुणानामपि कीर्तनम्। भक्त्या श्रीरामचन्द्रस्य वचसः शुद्धिरिष्यते।।45।। भक्तिपूर्वक श्रीरामचन्द्र के नाम और गुणों का कीर्तन वाणी की शुद्धि मानी जाती है। तत्कथाश्रवणं चैव तस्योत्सवनिरीक्षणम्। श्रोत्रयोर्नेत्रयोश्चैव शुद्धिः सम्यगिहोच्यते।।46।। उनकी कथा को सुनना, उत्सवों को देखना कानों और आँखों की सम्यक् शुद्धि कही गयी है। पादोदकस्य निर्माल्यं मालानामपि धारणम्। उच्यते शिरसः शुद्धिः प्रणतस्य हरेः पुनः।।47।। भगवान् के चरणोदक, निर्माल्य और माला का धारण तथा शिर झुकाकर प्रणाम करना शिर की शुद्धि है।

  1. घ. ध्यानजपहोमार्चनक्रियाः। 2. घ. पुनः