भारतकोश
अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary

महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा

DevanagariSanskritpublished337 पृष्ठ

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पृष्ठ 118

एकादशोऽध्यायः (57) ———————————————————————————————— नारदीयमिदं स्तोत्रं सुतीक्ष्ण मुनिसत्तम। पठितव्यं प्रयत्नेन रामार्चनपरायणैः।।40।। हे मुनिश्रेष्ठ सुतीक्ष्ण! यह नारदोक्त स्तुति है जिसे श्रीराम की उपासना करनेवालों को प्रयत्नपूर्वक पढ़ना चाहिए। गणपत्यादयः सर्वे द्वाराङ्गावृत्तिरूपिणः। प्रणवादिचतुर्थ्यादिनमोन्ताः स्वस्वनामभिः।।41।। पूजनीयाः प्रयत्नेन गन्धपुष्पाक्षतादिभिः। उपचारैः षोडशभिः तथैकादशभिर्मुने¹।।42।। पंचभिर्वा प्रयत्नेन स्वशक्त्यानुरूपतः। गणपति आदि सभी जो द्वारदेवता, अङ्ग देवता और चारो ओर फेरा लगानेवाले (परिक्रमा करनेवाले) देवता हैं, उनकी पूजा गन्ध, पुष्प, अक्षत आदि से प्रणव (ॐकार) आरम्भ में तथा नमः अन्त में लगाकर अपने अपने नाम के चतुर्थ्यन्त पद से पंचोपचार, एकादशोपचार तथा षोडशोपचार से अपनी शक्ति के अनुसार करें। गणपत्यादयोऽप्येवं पूजनीयाः प्रयत्नतः।। ²गणपत्यादयो ह्येते पूजिताः पूजयन्त्यपि।।43।। ³तस्मात् सर्वप्रयत्नेन स्तोत्रमेतत् समभ्यसेत्।।44।। इसी प्रकार गणपति आदि की भी पूजा करनी चाहिए। ये गणपति आदि पूजित होकर स्वयं श्रीराम की पूजा करते हैं, अतः सभी उपायों से इस स्तोत्र का अभ्यास करना चाहिए। इत्यगस्त्यसंहितायां परमरहस्ये पूजाविधिर्नाम दशमोऽध्यायः।


  1. घ. पुनः। 2.-3. घ. में अनुपलब्ध।