अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)
Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary
महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें(58) अगस्त्य-संहिता एकादशोऽध्यायः अगस्त्य उवाच शरीरं शोधयेदादावधिकारार्थमन्वहम्। तीर्थावगाहनं बाह्येऽप्यन्तर्भूतविशोधनम्।।1।। मातृकान्यासयोगैश्च शोधयेद् विध्यनुष्ठितः। अगस्त्य बोले- प्रतिदिन पूजा के अधिकारी बनने के लिए सबसे पहले शरीर की शुद्धि करें। बाह्य शोधन के लिए जल में डुबकी लगावें तथा आन्तरिक शोधन के लिए विधिपूर्वक मातृकावर्णों का न्यास करें। पूजाद्रव्याणि च ततः शोधयेत् प्रोक्षणादिभिः।।2।। पूजापात्राणि शङ्खञ्च शोधयेत् क्षालनादिना। शुद्धश्च शुद्धद्रव्यैश्च पूजयेत् पुरुषोत्तमम्।।3।। एवमाराधितो देवः सम्यगाराधितो भवेत्। न चेन्निरर्थकं सर्वं सिन्धुसैकतवृष्टिवत्।।4।। इसके बाद पोंछकर पूजा में प्रयुक्त सामग्रियों का शोधन करें। पूजा की थाली, लोटा, शंख, आदि को जल से धोवें। पवित्र पात्रों और सामग्रियों से पुरुषोत्तम की पूजा करनी चाहिए। इस प्रकार आराधना करने से देवता अच्छी तरह प्रसन्न होते हैं, नहीं तो समुद्र की रेत पर हुई वर्षा के समान सब कुछ व्यर्थ हो जाता है। शौचाचमनहीनस्य स्नानसन्ध्यादिकाः क्रियाः। निष्फलाः स्युर्यथा चेतो ह्यन्तरेण भवेत्तथा।।5।। शौच और आचमन किये विना जो स्नान, सन्ध्या आदि करते हैं, उनकी समस्त क्रियाएँ व्यर्थ हो जाती हैं, जैसे चेतन के विना सब कुछ व्यर्थ हो जाता है। संशोध्य पूजाद्रव्याणि स्वस्यापि बहिरन्तरम्। शङ्खञ्च पूजयेत् पूर्वं पूज्यं पूजार्हतां व्रजेत्।।6।। पूजा-सामग्रियों को पवित्र कर स्वयं भी बाहर और भीतर से पवित्र होकर शंख की पूजा करें। पहले पूजित शंख पूजा का साधन बनने योग्य होता है।