भारतकोश
अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary

महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा

DevanagariSanskritpublished337 पृष्ठ

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पृष्ठ 120

एकादशोऽध्यायः (59) पूजकस्याथ पूज्यस्यापावनस्य कृतं वृथा। अपावनान्यपूज्यानि साधनानि विवर्जयेत्।।7।। अपवित्र पूजक और पूज्य दोनों द्वार किए गये कार्य व्यर्थ हो जाते हैं। अतः अपवित्र एवं अपूज्य साधन का त्याग कर देना चाहिए। अतः स्नात्वा प्रकुर्वीत भूतशुद्धिं विधाय च। विन्यस्य मातृकां पूर्वं वैष्णवीं केशवादिकाम्।।8।। इसलिए स्नान करके भूत-शुद्धि कर पहले वैष्णव और केशव की मातृका का न्यास करें। विधाय तत्त्वन्यासञ्च न्यासं तन्मूर्तिपञ्जरम्। तदृषिच्छन्दसोन्यासं¹ तथा तन्मन्त्रदेवताम्।।9।। विन्यस्यैव षडङ्गानि तत्तद्बीजाक्षराणि च। इसके बाद तत्त्वन्यास, मूर्ति-पंजरन्यास, ऋषि-न्यास, छन्दोन्यास, मन्त्र- न्यास तथा देवता-न्यास करें। इस छह अंगों का न्यास कर उनके बीजाक्षरों का भी न्यास करें। अथातो देवताध्यानं ततः पूजनमन्ततः।।10।। ततो निवेद्य तत्सर्वं जपेन्मन्त्रमनन्यधीः। ततो विज्ञाप्य देवेशं परिवारांश्च पूजयेत्।।11।। एवं सम्पूजितो देवः सर्वान् कामान् प्रयच्छति। इसके बाद देवता का ध्यान कर पूजन करें। इसके बाद सब कुछ निवेदित कर अनन्यचित्त होकर मन्त्र का जप करें। तब मुख्य देव श्रीराम को सबकुछ ज्ञापित कर श्रीराम के परिजनों की पूजा करें। इस प्रकार पूजित देव सभी कामनाओं की पूर्ति करते हैं। बाह्यपूजां ततः कुर्यादैहिकाभ्युदयाय वै।।12।। विलिप्य वेदिकां सम्यङ्मण्डलं तत्र कारयेत्। तब सांसारिक उन्नति के लिए बाह्य पूजा करें। तब वेदिका को लीप कर वहाँ उचित रीति से यन्त्र का निर्माण करावें।

  1. घ. छन्दसौऽभ्यासं।