अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)
Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary
महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा
पृष्ठ 121, कुल 337 में से
संदर्भ में पढ़ें(60) अगस्त्य-संहिता
शालितण्डुलचूर्णैश्च नीलपीतसितासितैः।।13।। लिखेदष्टदलं पद्मं चतुरस्रसमावृतम्। षट्कोणं कर्णिकामध्ये कोणाग्रे वृत्तसंवृतम्।।14।। धान के चावल के चूर्ण से नीला, पीला, सफेद और अन्य रंगों से चौकोर भूपुर सहित अष्टदल कमल बनायें और कर्णिका पर षट्कोण बनाकर उसके कोणाग्रभाग पर वृत्त बनाएँ। साध्यमेतत् ततो शोभारेखाभिरुपशोभितम्। सम्पूज्य मण्डलं चैव तत्र सिंहासनं न्यसेत्।।15।। बीच में साध्य लिखकर सुन्दर रेखाओं से शोभित मण्डल की पूजा कर वहीं श्रीराम और श्रीसीताजी का सिंहासन रखें। चन्द्रोदयपताकैश्च तोरणैरपि सर्वतः। विचित्रं तत्र तत्रापि भित्तिस्तम्भस्थलादिषु।।16।। चाँदोवा, पताका और बंदनवार से सर्वत्र अनेक प्रकार से सुन्दर ढंग से दीवाल खम्भा आदि को सजायें। एवं सुशोभितस्थाने सर्वमङ्गलसंयुते। पुण्यस्त्रीभिर्गृहस्थैश्च परितो व्यवहर्तृभिः।।17।। गायद्भिरपि नृत्यद्भिर्वदद्भिः स्तुतिपूर्वकम्।¹ भेरीमृदङ्गवंश्यादिकांस्यतालादिभिर्बहु² ।।18।। ³वादयद्भिश्च बहुधा सम्यगाराधितो यदि। रघुनाथः स्वयं तत्र प्रसन्नो भगवान् भवेत्।।19।। इस प्रकार शुभ वस्तुओं से सुशोभित, पुण्यवती स्त्रियों और गृहस्यों पूजा- सामग्रियों को लानेवाले लोगों, गायकों, नर्तकों और अनेक स्तुति करनेवालों, तुरही, मृदङ्ग, बाँसुरी, झाल आदि बजानेवालों से घिरे हुए स्थान में सम्यक् पूजित होकर श्रीराम स्वयं वहाँ प्रसन्न होते हैं। संपाद्य विविधैः पुष्पैः पूजयेच्चारुडालिकाम्।⁴ तुलसी पद्मजात्याद्यैर्माल्यैर्बहुविधैरपि।।20।। अनेक प्रकार के फूलों, कमल, जूही, विभिन्न प्रकार की माला तथा तुलसीदल आदि से भरी सुन्दर डाली (चंगेरी) की पूजा करें।
- घ. स्तुतिरूपकम्। 2. घ. ºर्मुहुः। 3. घ. में अनुपलब्ध। 4. पूजयेत्पुष्पचंदनीम्।