भारतकोश
अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary

महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा

DevanagariSanskritpublished337 पृष्ठ

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पृष्ठ 122

एकादशोऽध्यायः (61) स्वपुरो दक्षिणे तीर्थशुद्धवारिसुपूरितम्। कलशं स्वपुरो वामभागे तु विनियोजयेत्।।21।। अन्यानि पूजाद्रव्याणि पुरस्तादेव निक्षिपेत्। इसे अपने आगे दाहिने भाग में रखें तथा तीर्थ के जल से भरा हुआ कलश अपने आगे वायें भाग में रखें। पूजा की अन्य सामग्रियाँ सामने में ही रखें। आराधनाय देवस्य वेदिकाधः सुखासने।।22।। कुशास्तरणवैव्याघ्रचर्मवासो - विनिर्मिते । उपविश्य शुचिर्मौनी भूत्वा पूजां समाचरेत्।।23।। देव की आराधना के लिए वेदी के नीचे सुख से बैठने योग्य आसन, जो कुश, व्याघ्रचर्म या कपड़े का बना हुआ हो उसपर मौन होकर बैठें और पूजा का आरम्भ करें। तुलसीकाष्ठघटितैः रुद्राक्षाकारकारितैः। शङ्खचक्रगदापद्मपादुकाकारकारितैः ।।24।। निर्मितां मालिकां कण्ठे¹ निधायार्चनमाचरेत्। रुद्राक्ष, शङ्ख, चक्र, गदा, पद्म या पादुका की आकृति की बनी हुई तुलसीकाष्ठ की माला कण्ठ में धारण कर पूजा प्रारम्भ करें। तथामलकमालां च सम्यक् पुष्करमालिकाम् ।।25।। निर्माल्य तुलसीमालां शिरस्यपि निधाय वै। साथ ही, आँवले के पुष्प की माला, या कमल की सुन्दर माला या तुलसी की माला शिर पर रखकर पूजा आरम्भ करें। निर्लिप्य² चन्दनेनाङ्गमङ्कयेत् तस्य नामभिः। तस्यायुधानि बाह्वोश्च तेनैव द्विजसत्तम। अंगों पर चन्दन से श्रीराम के नामों का लेखन करें तथा बाहों पर उनके धनुष, बाण, गदा आदि आयुधों का अंकन उसी चन्दन से करें। पापिष्ठो वाप्यपापिष्ठः सर्वज्ञोऽप्यज्ञ एव वा।।27।। भवेदेवाधिकारोऽत्र पूजाकर्मण्यसंशयः।

  1. घ. कर्णे। 2. घ. निर्माल्य। Rarest Archiver