भारतकोश
अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary

महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा

DevanagariSanskritpublished337 पृष्ठ

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(62) अगस्त्य-संहिता

पापी हो या निष्पाप, विद्वान् हो या मूर्ख, श्रीराम की पूजा में सबका अधिकार है, इसमें सन्देह नहीं। पद्मस्वस्तिकभद्रादिरूपेणाकुञ्च्य पद्द्वयम् ।।२८।। पद्मासन, भद्रासन या स्वस्तिकासन के रूप में दोनों पैरों को मोड़कर बैठें। विनायकं नमस्कृत्य सव्यांशे च सरस्वतीम्। दक्षिणांशे पूर्ववच्च दुर्गां च क्षेत्रपं पुनः ।।२९।। प्रणम्याथ गुरून् भूयो नत्वा गुरुपरम्पराम्। गणेशजी को प्रणाम कर बायें भाग में सरस्वती को तथा पूर्ववत् दायें भाग में पर दुर्गा का न्यास कर पुनः वहीं क्षेत्रपाल का न्यास कर उन्हें प्रणाम करें। गुरु को प्रणाम कर अपनी गुरु-परम्परा को प्रणाम करें। ततो देवं नमस्कृत्य कुर्यात् तालत्रयं पुनः ।।३०।। तारमस्त्राय¹ फट् प्रोक्ता भ्रामयेद् दक्षिणं करम्। तब देवता को प्रणाम कर तीन ताल की क्रिया (तेताला) करें। तब “ॐ अस्त्राय फट्” इस मन्त्र से दाहिने हाथ को घुमावें। ततस्तु चिन्तयेद्देवमन्तःस्थानत्रयान्तरे ।।३१।। ज्योतिर्मयमनःपूतं सत्यं ज्ञानसुखात्मकम्। तब ज्योतिःस्वरूप, प्राणियों में पवित्र, सत्य, ज्ञान और सुख-स्वरूप देवता का ध्यान अन्तःकरण के तीनों में करें। आत्मनः परितो वह्निं प्राकारं त्राणाय च ।।३२।। भूतप्रेतपिशाचेभ्यो विधाय तदनन्तरम्। अद्भिः पुण्याक्षतैश्चैव वह्निबीजास्त्रमन्त्रितैः ।।३३।। प्रक्षिपेत् परितो मन्त्री भयविघ्ननिवृत्तये। इसके बाद घर की रक्षा के लिए अपने चारों ओर अग्नि का पूजन करें। तब भूत, प्रेत और पिशाच के लिए जल, अक्षत लेकर वह्निबीज (रं) एवं अस्त्र- मन्त्र ‘फट्’ से अभिमन्त्रित कर भय और विघ्न के नाश के लिए चारों ओर छिड़के। हृदम्बुजे ब्रह्मकन्दसम्भूते ज्ञाननालके ।।३४।। ऐश्वर्याष्टदलोपेते ज्ञानवैराग्यकर्णिके।² आराग्रमात्रो जीवस्तु चिन्तनीयो मनीषिभिः ।।३५।।

  1. क. ॐ कारश्चास्त्राय। 2. घ. परे वैराग्यकर्णिके।