अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)
Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary
महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा
पृष्ठ 124, कुल 337 में से
संदर्भ में पढ़ेंएकादशोऽध्यायः (63) हृदय रूपी कमल के ब्रह्म रूपी कन्द से निकले हुए ज्ञान रूपी नाल पर ऐश्वर्य आदि आठ दलों वाला कमल है, जिसकी कर्णिका (कमल का मध्य भाग) ज्ञान और वैराग्य की है, इस कमल पर आरे की नोंक के समान सूक्ष्म जीव अवस्थित है, इस प्रकार का ध्यान मनीषियों को करना चाहिए। नेतव्यो हंसमन्त्रेण द्वादशान्तः स्थितः परः। तेन संयोज्य विधिवत् भूतशुद्धिमथाचरेत्।।36।। द्वादशार चक्र से इसे 'हं सः' इस मन्त्र से ऊपर लाना चाहिए और उससे शरीर का संयोजन कर भूत-शुद्धि करना चाहिए। भूतानि चाथ¹ पृथिवी जलं तेजो मरुद् वियत्। यद्यतो जायते तस्मिन् प्रलयोत्पादनं पुनः।।37।। पृथिवी, जल, अग्नि, वायु और आकाश ये पाँच भूत हैं, जहाँ से सृष्टि की उत्पत्ति होती है और पुनः उसी से जा मिलती है और पुनः उत्पन्न होती है। शरीराकारभूतानां भूतानां शोधनं विदुः। मरुदग्निसुधाबीजैः पञ्चाशन्मातृमात्रकैः।।38।। प्राणान्निरुध्यात्मदेहं शोधयेत् तत्पुनर्दहेत्। तं देहं पुनराप्लाव्य पुनर्जीवमिहानयेत्।।39।। शरीर के आकार में स्थित इन पाँच भूतों की शुद्धि ही भूतशुद्धि है। वायुबीज (यं) अग्निबीज (रं) और सुधाबीज (वं) के साथ पचास मातृकाओं से यह क्रिया करें। इसमें सबसे पहले प्राणवायु को रोककर अपने सूक्ष्म शरीर का शोधन करें, फिर उस अध्यात्म रूप सूक्ष्म शरीर को अग्नि में जलावें, फिर उसे जल मे डुबोकर जीव को शरीर में प्रविष्ट करावें। जीवने पुनरात्मानं चिन्तयेत् पुरुषाप्तये। जीवस्य तत्त्वसिद्धयै च तस्याप्यात्मत्वसिद्धये।।40।। जीवन में फिर पुरुषस्वरूप की प्राप्ति के लिए जीव के तत्त्व की सिद्धि तथा आत्मत्व की सिद्धि के लिए आत्मतत्त्व का चिन्तन करें। नयनानयनार्थं च हंसः सोऽहमितीरयेत्। भूतशुद्धिरियं नाम कर्त्तव्या मनसार्थकत्²।।41।।
- घ. नाम। 2. घ. भूतसाक्ष्यकृत्।