भारतकोश
अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary

महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा

DevanagariSanskritpublished337 पृष्ठ

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(64) अगस्त्य-संहिता

शरीर से जीव को अलग करने और लाने के लिए क्रमशः 'ॐ हंसः' और 'ॐ सोऽहम्' इन मन्त्रों का प्रयोग करें। यह भूतशुद्धि कहलाती है, जो मन से करनी चाहिए। इससे प्रयोजन की सिद्धि होती है। भूतशुद्धिं विना यस्य तपहोमादिकाः क्रियाः।¹ भवन्ति निष्फलाः सर्वाः प्रकारेणाप्यनुष्ठिताः।।42।। भूत शुद्धि के बिना जो तप, होम आदि क्रियाएँ करते हैं, उनकी सभी क्रियाएँ विधानपूर्वक करने के बाद भी निष्फल होती हैं। गृहोपसर्पणं चैव तथानुगमनं हरेः। भक्त्या प्रदक्षिणं चैव पादयोः शोधनं विदुः²।।43।। भगवान् के गृह (मन्दिर) जाना, श्रीहरि का अनुगमन करना तथा भक्ति पूर्वक प्रदक्षिणा करना ये तीन पैरों की शुद्धि है। पूजार्थं पत्रपुष्पाणां भक्त्यैवोत्तोलनं हरेः। करयोः सर्वशुद्धीनामियं शुद्धिविशिष्यते।।44।। श्रीहरि की पूजा के लिए पत्र-पुष्प पहुँचाना हाथों की अनेक प्रकार की शुद्धियों में विशिष्ट मानी जाती है। तन्नामकीर्तनं चैव गुणानामपि कीर्तनम्। भक्त्या श्रीरामचन्द्रस्य वचसः शुद्धिरिष्यते।।45।। भक्तिपूर्वक श्रीरामचन्द्र के नाम और गुणों का कीर्तन वाणी की शुद्धि मानी जाती है। तत्कथाश्रवणं चैव तस्योत्सवनिरीक्षणम्। श्रोत्रयोर्नेत्रयोश्चैव शुद्धिः सम्यगिहोच्यते।।46।। उनकी कथा को सुनना, उत्सवों को देखना कानों और आँखों की सम्यक् शुद्धि कही गयी है। पादोदकस्य निर्माल्यं मालानामपि धारणम्। उच्यते शिरसः शुद्धिः प्रणतस्य हरेः पुनः।।47।। भगवान् के चरणोदक, निर्माल्य और माला का धारण तथा शिर झुकाकर प्रणाम करना शिर की शुद्धि है।

  1. घ. ध्यानजपहोमार्चनक्रियाः। 2. घ. पुनः