भारतकोश
अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary

महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा

DevanagariSanskritpublished337 पृष्ठ

पृष्ठ 126, कुल 337 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 126

द्वादशोऽध्यायः (65) आघ्राणं गन्धपुष्पादेश्चित्तस्य च तपोधन। विशुद्धिः स्यादनन्तस्य घ्राणस्येहाभिधीयते।।48।। पूजा में प्रयोग किए गये निर्माल्य रूप फूल-चन्दन को सूंघना चित्त और नाक की शुद्धि यहाँ कही गयी है। पत्रं पुष्पादिकं यद्यद् रामपादयुगार्पितम्। विशुद्ध्यै तद् भवत्येव स्वात्मना धार्यते यदि।।49।। श्रीराम के चरणकमलों में अर्पित पुष्प आदि जहाँ हो और उन्हें धारण किया जाए तो वह स्थान शुद्ध हो जाता है। अधुनाप्यथवा पूर्वं यद्यविष्णुसमर्पितम्। तदेव पावनं लोके तद्वि सर्वं विशोधयेत्।।50।। यदि इन समय अथवा पूर्व में विष्णु को समर्पित किए बिना भी पुष्पादि उन्हें समर्पित करने के उद्देश से रखे गये हो और मन से ध्यान किया जाए तो वह स्थान पवित्र हो जाता है। वही इस संसार में पवित्र है अतः इस प्रकार पवित्र करना चाहिए। इत्यगस्त्यसंहितायां पूजाविधिभूतशुद्धिर्नाम एकादशोऽध्यायः।। अथ द्वादशोऽध्यायः अथातो मातृकान्यासक्रमोऽत्र परिपठ्यते। नियम्यासून् ऋषिच्छन्दो देवताबीजपोषिताः।।1।। शिरोवदनहृद्गुह्यपादेषुन्यास उच्यते। कराङ्गुलीनां रेखासु स्वरैरेकं प्रविन्यसेत्।।2।। अब यहाँ मातृकान्यास की विधि बतलायी जा रही है। प्राण वायु को नियमित कर ऋषि, छन्द, देवता और बीज का न्यास शिर, मुख, हृदय, गुह्य एवं पैरों में किया जाता है। हाथ की अंगुलियों की प्रत्येक रेखा पर एक एक स्वर का न्यास होता है।