अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)
Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary
महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा
DevanagariSanskritpublished337 पृष्ठ
पृष्ठ 127, कुल 337 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 127
(66) अगस्त्य-संहिता
विन्यसेत्प्रणवं पाणितलयोः पृष्ठयोरपि। ह्रस्वदीर्घस्वरान्ताद्याः कादयः पञ्चपञ्चकाः।।३।। आम्श्चाद्यं तयोर्यादिक्षान्तश्च दशवर्णकः। अङ्गुष्ठाद्यङ्गुलीनां च तथैव तलपृष्ठयोः।।४।। सबसे पहले दोनों हाथों तथा पैरों के तल और उसके पीछे न्यास ॐकार से करें। ह्रस्व एवं दीर्घ स्वर-वर्ण प्रारम्भ में लगाकर ‘क’ से ‘म’ तक पच्चीस वर्णों का तथा ‘य’ से ‘क्ष’ तक दश वर्णों से अंगुष्ठा से प्रारम्भ कर दोनों हाथों की अंगुलियों तथा करतल और करपृष्ठ में इस प्रकार न्यास करें- अं आं कं खं गं घं ङं अङ्गुष्ठाभ्यां नमः। इं ईं चं छं जं झं ञं तर्जनीभ्यां स्वाहा। उं ऊं टं ठं डं ढं णं मध्यमाभ्यां वषट्। ऋं ॠं तं थं दं धं नं अनामिकाभ्यां हुम्। लृं लॄं पं फं बं भं मं कनिष्ठिकाभ्यां वौषट्। एं ऐं यं रं लं वं करतलाभ्यां फट्। ओं औं शं षं सं हं हौं क्षं करपृष्ठाभ्यां फट्। न्यासस्ततः षडङ्गानां भवत्येवं प्रकल्पना। हृदि मूर्ध्नि शिखायां च सर्वाङ्गे नेत्रयोरपि।।५।। दिक्ष्वस्त्रं च नमः स्वाहा वषट् वौषदप्यथा। अस्त्राय फडित्येवं षडङ्गानाञ्च पल्लवम्।।६।। तत्तत् स्थाने चतुर्थ्यन्ते तत्तत् पल्लवयोगतः। तत्तदङ्गतो न्यासस्तत्तदङ्गो नियोज्यते।।७।। तब षडङ्गन्यास की विधि इस प्रकार करनी चाहिए। हृदय, शिर, शिखा, सर्वाङ्ग और दोनों नेत्रों में। दिशाओं में अस्त्र (फट्), नमः स्वाहा, वषट् तथा वौषट् तथा अस्त्राय फट् से षडङ्गन्यास का विस्तार किया जाता है। इसके बाद अपने बीजों का विस्तार उन अंगों के चतुर्थ्यन्त पद से उन अंगों का विनियोग होता है। जैसे- हृदयाय नमःए शिरसे स्वाहा, शिखायै वषट्, सर्वाङ्गे वौषट्, नेत्रयोः वौषट्, दिक्षु अस्त्राय फट्।
Rarest Archiver