भारतकोश
अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary

महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा

DevanagariSanskritpublished337 पृष्ठ

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पृष्ठ 128

द्वादशोऽध्यायः (67) अथान्तर्मातृकान्यासः कण्ठहृन्नाभिगुह्यके।¹ पायौ भ्रूमध्यके पद्मे षोडशद्वादशच्छदम्।।8।। दशपत्रे च षट्पत्रे चतुःपत्रे द्विपत्रके। पञ्चाशद्वर्णविन्यासः पत्रसंख्याक्रमाद् भवेत्।।9।। एकैकवर्णमेकैकपत्रान्ते विन्यसेन्मुने। इसके बाद अन्तर्मातृकान्यास कण्ठ, हृदय, नाभि, लिंगमूल, गुदा एवं भ्रूमध्य में होता है। क्रमशः षोडशदल कमल, द्वादशदल कमल, दशदलकमल, षड्दलकमल स्वरूप यन्त्र, चतुर्दल कमल तथा द्विदल कमल में दलों की संख्या में पचासों वर्णों का न्यास करना चाहिए। एक एक वर्ण को एक एक दल पर न्यास करें। जैसे- अं आं इं ईं उं ऊं ऋं ॠं लूं लूं एं ऐं ओं औं अं अः षोडशदलकमलाय कण्ठाय नमः। कं खं गं घं ङं चं छं जं झं ञं टं ठं द्वादशदलकमलाय हृदयाय स्वाहा। डं ढं णं तं थं दं धं नं पं फं दशदलकमलाय नाभये वषट्। बं भं मं यं रं लं षड्दलकमलाय लिङ्गमूलाय वौषट्। वं शं षं सं चतुर्दलकमलाय मूलाधाराये गुदायै वौषट्। हं क्षं द्विदलकमलाय भ्रूमध्याय फट्। एवमन्तः प्रविन्यस्य मनसातो बहिर्न्यसेत्।।10।। शिरोवदनवृत्ते च चक्षुश्रोत्रयुगेऽपि च। नासाकपोलयुगलं तथोष्ठाधरयोरपि।।11।। ऊर्ध्वाधो दन्तपङ्क्तौ च मूर्द्धास्ये षोडशस्वरान्।² कचवर्गे द्वयं बाह्वोः पञ्चसन्धिस्थले न्यसेत्।।12 तटवर्गद्वयं पादे सन्ध्यग्रेऽपि तथा न्यसेत्।³ पवर्गं पार्श्वयुगले पृष्ठनाभ्युदरेऽपि च।।13।। हृदोर्मूलककुत्कक्षे⁴ हृदयादिकरद्वयोः।⁵ जठराननयोश्चैव व्यापकं विनियोजयेत्।।14।। पञ्चाशद्वर्णविन्यासः क्रमेणैवं विधीयते।

  1. घ. कण्ठहृन्नाड़ीगुह्यके। 2. घ. द्वादशस्वरान्। 3. घ. पुनः। 4. स्कन्धे। 5. घ. हृदयादिकरपद्द्वये।