अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)
Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary
महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा
एकादशोऽध्यायः (61) स्वपुरो दक्षिणे तीर्थशुद्धवारिसुपूरितम्। कलशं स्वपुरो वामभागे तु विनियोजयेत्।।21।। अन्यानि पूजाद्रव्याणि पुरस्तादेव निक्षिपेत्। इसे अपने आगे दाहिने भाग में रखें तथा तीर्थ के जल से भरा हुआ कलश अपने आगे वायें भाग में रखें। पूजा की अन्य सामग्रियाँ सामने में ही रखें। आराधनाय देवस्य वेदिकाधः सुखासने।।22।। कुशास्तरणवैव्याघ्रचर्मवासो - विनिर्मिते । उपविश्य शुचिर्मौनी भूत्वा पूजां समाचरेत्।।23।। देव की आराधना के लिए वेदी के नीचे सुख से बैठने योग्य आसन, जो कुश, व्याघ्रचर्म या कपड़े का बना हुआ हो उसपर मौन होकर बैठें और पूजा का आरम्भ करें। तुलसीकाष्ठघटितैः रुद्राक्षाकारकारितैः। शङ्खचक्रगदापद्मपादुकाकारकारितैः ।।24।। निर्मितां मालिकां कण्ठे¹ निधायार्चनमाचरेत्। रुद्राक्ष, शङ्ख, चक्र, गदा, पद्म या पादुका की आकृति की बनी हुई तुलसीकाष्ठ की माला कण्ठ में धारण कर पूजा प्रारम्भ करें। तथामलकमालां च सम्यक् पुष्करमालिकाम् ।।25।। निर्माल्य तुलसीमालां शिरस्यपि निधाय वै। साथ ही, आँवले के पुष्प की माला, या कमल की सुन्दर माला या तुलसी की माला शिर पर रखकर पूजा आरम्भ करें। निर्लिप्य² चन्दनेनाङ्गमङ्कयेत् तस्य नामभिः। तस्यायुधानि बाह्वोश्च तेनैव द्विजसत्तम। अंगों पर चन्दन से श्रीराम के नामों का लेखन करें तथा बाहों पर उनके धनुष, बाण, गदा आदि आयुधों का अंकन उसी चन्दन से करें। पापिष्ठो वाप्यपापिष्ठः सर्वज्ञोऽप्यज्ञ एव वा।।27।। भवेदेवाधिकारोऽत्र पूजाकर्मण्यसंशयः।
- घ. कर्णे। 2. घ. निर्माल्य। Rarest Archiver
(62) अगस्त्य-संहिता
पापी हो या निष्पाप, विद्वान् हो या मूर्ख, श्रीराम की पूजा में सबका अधिकार है, इसमें सन्देह नहीं। पद्मस्वस्तिकभद्रादिरूपेणाकुञ्च्य पद्द्वयम् ।।२८।। पद्मासन, भद्रासन या स्वस्तिकासन के रूप में दोनों पैरों को मोड़कर बैठें। विनायकं नमस्कृत्य सव्यांशे च सरस्वतीम्। दक्षिणांशे पूर्ववच्च दुर्गां च क्षेत्रपं पुनः ।।२९।। प्रणम्याथ गुरून् भूयो नत्वा गुरुपरम्पराम्। गणेशजी को प्रणाम कर बायें भाग में सरस्वती को तथा पूर्ववत् दायें भाग में पर दुर्गा का न्यास कर पुनः वहीं क्षेत्रपाल का न्यास कर उन्हें प्रणाम करें। गुरु को प्रणाम कर अपनी गुरु-परम्परा को प्रणाम करें। ततो देवं नमस्कृत्य कुर्यात् तालत्रयं पुनः ।।३०।। तारमस्त्राय¹ फट् प्रोक्ता भ्रामयेद् दक्षिणं करम्। तब देवता को प्रणाम कर तीन ताल की क्रिया (तेताला) करें। तब “ॐ अस्त्राय फट्” इस मन्त्र से दाहिने हाथ को घुमावें। ततस्तु चिन्तयेद्देवमन्तःस्थानत्रयान्तरे ।।३१।। ज्योतिर्मयमनःपूतं सत्यं ज्ञानसुखात्मकम्। तब ज्योतिःस्वरूप, प्राणियों में पवित्र, सत्य, ज्ञान और सुख-स्वरूप देवता का ध्यान अन्तःकरण के तीनों में करें। आत्मनः परितो वह्निं प्राकारं त्राणाय च ।।३२।। भूतप्रेतपिशाचेभ्यो विधाय तदनन्तरम्। अद्भिः पुण्याक्षतैश्चैव वह्निबीजास्त्रमन्त्रितैः ।।३३।। प्रक्षिपेत् परितो मन्त्री भयविघ्ननिवृत्तये। इसके बाद घर की रक्षा के लिए अपने चारों ओर अग्नि का पूजन करें। तब भूत, प्रेत और पिशाच के लिए जल, अक्षत लेकर वह्निबीज (रं) एवं अस्त्र- मन्त्र ‘फट्’ से अभिमन्त्रित कर भय और विघ्न के नाश के लिए चारों ओर छिड़के। हृदम्बुजे ब्रह्मकन्दसम्भूते ज्ञाननालके ।।३४।। ऐश्वर्याष्टदलोपेते ज्ञानवैराग्यकर्णिके।² आराग्रमात्रो जीवस्तु चिन्तनीयो मनीषिभिः ।।३५।।
- क. ॐ कारश्चास्त्राय। 2. घ. परे वैराग्यकर्णिके।
एकादशोऽध्यायः (63) हृदय रूपी कमल के ब्रह्म रूपी कन्द से निकले हुए ज्ञान रूपी नाल पर ऐश्वर्य आदि आठ दलों वाला कमल है, जिसकी कर्णिका (कमल का मध्य भाग) ज्ञान और वैराग्य की है, इस कमल पर आरे की नोंक के समान सूक्ष्म जीव अवस्थित है, इस प्रकार का ध्यान मनीषियों को करना चाहिए। नेतव्यो हंसमन्त्रेण द्वादशान्तः स्थितः परः। तेन संयोज्य विधिवत् भूतशुद्धिमथाचरेत्।।36।। द्वादशार चक्र से इसे 'हं सः' इस मन्त्र से ऊपर लाना चाहिए और उससे शरीर का संयोजन कर भूत-शुद्धि करना चाहिए। भूतानि चाथ¹ पृथिवी जलं तेजो मरुद् वियत्। यद्यतो जायते तस्मिन् प्रलयोत्पादनं पुनः।।37।। पृथिवी, जल, अग्नि, वायु और आकाश ये पाँच भूत हैं, जहाँ से सृष्टि की उत्पत्ति होती है और पुनः उसी से जा मिलती है और पुनः उत्पन्न होती है। शरीराकारभूतानां भूतानां शोधनं विदुः। मरुदग्निसुधाबीजैः पञ्चाशन्मातृमात्रकैः।।38।। प्राणान्निरुध्यात्मदेहं शोधयेत् तत्पुनर्दहेत्। तं देहं पुनराप्लाव्य पुनर्जीवमिहानयेत्।।39।। शरीर के आकार में स्थित इन पाँच भूतों की शुद्धि ही भूतशुद्धि है। वायुबीज (यं) अग्निबीज (रं) और सुधाबीज (वं) के साथ पचास मातृकाओं से यह क्रिया करें। इसमें सबसे पहले प्राणवायु को रोककर अपने सूक्ष्म शरीर का शोधन करें, फिर उस अध्यात्म रूप सूक्ष्म शरीर को अग्नि में जलावें, फिर उसे जल मे डुबोकर जीव को शरीर में प्रविष्ट करावें। जीवने पुनरात्मानं चिन्तयेत् पुरुषाप्तये। जीवस्य तत्त्वसिद्धयै च तस्याप्यात्मत्वसिद्धये।।40।। जीवन में फिर पुरुषस्वरूप की प्राप्ति के लिए जीव के तत्त्व की सिद्धि तथा आत्मत्व की सिद्धि के लिए आत्मतत्त्व का चिन्तन करें। नयनानयनार्थं च हंसः सोऽहमितीरयेत्। भूतशुद्धिरियं नाम कर्त्तव्या मनसार्थकत्²।।41।।
- घ. नाम। 2. घ. भूतसाक्ष्यकृत्।
(64) अगस्त्य-संहिता
शरीर से जीव को अलग करने और लाने के लिए क्रमशः 'ॐ हंसः' और 'ॐ सोऽहम्' इन मन्त्रों का प्रयोग करें। यह भूतशुद्धि कहलाती है, जो मन से करनी चाहिए। इससे प्रयोजन की सिद्धि होती है। भूतशुद्धिं विना यस्य तपहोमादिकाः क्रियाः।¹ भवन्ति निष्फलाः सर्वाः प्रकारेणाप्यनुष्ठिताः।।42।। भूत शुद्धि के बिना जो तप, होम आदि क्रियाएँ करते हैं, उनकी सभी क्रियाएँ विधानपूर्वक करने के बाद भी निष्फल होती हैं। गृहोपसर्पणं चैव तथानुगमनं हरेः। भक्त्या प्रदक्षिणं चैव पादयोः शोधनं विदुः²।।43।। भगवान् के गृह (मन्दिर) जाना, श्रीहरि का अनुगमन करना तथा भक्ति पूर्वक प्रदक्षिणा करना ये तीन पैरों की शुद्धि है। पूजार्थं पत्रपुष्पाणां भक्त्यैवोत्तोलनं हरेः। करयोः सर्वशुद्धीनामियं शुद्धिविशिष्यते।।44।। श्रीहरि की पूजा के लिए पत्र-पुष्प पहुँचाना हाथों की अनेक प्रकार की शुद्धियों में विशिष्ट मानी जाती है। तन्नामकीर्तनं चैव गुणानामपि कीर्तनम्। भक्त्या श्रीरामचन्द्रस्य वचसः शुद्धिरिष्यते।।45।। भक्तिपूर्वक श्रीरामचन्द्र के नाम और गुणों का कीर्तन वाणी की शुद्धि मानी जाती है। तत्कथाश्रवणं चैव तस्योत्सवनिरीक्षणम्। श्रोत्रयोर्नेत्रयोश्चैव शुद्धिः सम्यगिहोच्यते।।46।। उनकी कथा को सुनना, उत्सवों को देखना कानों और आँखों की सम्यक् शुद्धि कही गयी है। पादोदकस्य निर्माल्यं मालानामपि धारणम्। उच्यते शिरसः शुद्धिः प्रणतस्य हरेः पुनः।।47।। भगवान् के चरणोदक, निर्माल्य और माला का धारण तथा शिर झुकाकर प्रणाम करना शिर की शुद्धि है।
- घ. ध्यानजपहोमार्चनक्रियाः। 2. घ. पुनः
द्वादशोऽध्यायः (65) आघ्राणं गन्धपुष्पादेश्चित्तस्य च तपोधन। विशुद्धिः स्यादनन्तस्य घ्राणस्येहाभिधीयते।।48।। पूजा में प्रयोग किए गये निर्माल्य रूप फूल-चन्दन को सूंघना चित्त और नाक की शुद्धि यहाँ कही गयी है। पत्रं पुष्पादिकं यद्यद् रामपादयुगार्पितम्। विशुद्ध्यै तद् भवत्येव स्वात्मना धार्यते यदि।।49।। श्रीराम के चरणकमलों में अर्पित पुष्प आदि जहाँ हो और उन्हें धारण किया जाए तो वह स्थान शुद्ध हो जाता है। अधुनाप्यथवा पूर्वं यद्यविष्णुसमर्पितम्। तदेव पावनं लोके तद्वि सर्वं विशोधयेत्।।50।। यदि इन समय अथवा पूर्व में विष्णु को समर्पित किए बिना भी पुष्पादि उन्हें समर्पित करने के उद्देश से रखे गये हो और मन से ध्यान किया जाए तो वह स्थान पवित्र हो जाता है। वही इस संसार में पवित्र है अतः इस प्रकार पवित्र करना चाहिए। इत्यगस्त्यसंहितायां पूजाविधिभूतशुद्धिर्नाम एकादशोऽध्यायः।। अथ द्वादशोऽध्यायः अथातो मातृकान्यासक्रमोऽत्र परिपठ्यते। नियम्यासून् ऋषिच्छन्दो देवताबीजपोषिताः।।1।। शिरोवदनहृद्गुह्यपादेषुन्यास उच्यते। कराङ्गुलीनां रेखासु स्वरैरेकं प्रविन्यसेत्।।2।। अब यहाँ मातृकान्यास की विधि बतलायी जा रही है। प्राण वायु को नियमित कर ऋषि, छन्द, देवता और बीज का न्यास शिर, मुख, हृदय, गुह्य एवं पैरों में किया जाता है। हाथ की अंगुलियों की प्रत्येक रेखा पर एक एक स्वर का न्यास होता है।
(66) अगस्त्य-संहिता
विन्यसेत्प्रणवं पाणितलयोः पृष्ठयोरपि। ह्रस्वदीर्घस्वरान्ताद्याः कादयः पञ्चपञ्चकाः।।३।। आम्श्चाद्यं तयोर्यादिक्षान्तश्च दशवर्णकः। अङ्गुष्ठाद्यङ्गुलीनां च तथैव तलपृष्ठयोः।।४।। सबसे पहले दोनों हाथों तथा पैरों के तल और उसके पीछे न्यास ॐकार से करें। ह्रस्व एवं दीर्घ स्वर-वर्ण प्रारम्भ में लगाकर ‘क’ से ‘म’ तक पच्चीस वर्णों का तथा ‘य’ से ‘क्ष’ तक दश वर्णों से अंगुष्ठा से प्रारम्भ कर दोनों हाथों की अंगुलियों तथा करतल और करपृष्ठ में इस प्रकार न्यास करें- अं आं कं खं गं घं ङं अङ्गुष्ठाभ्यां नमः। इं ईं चं छं जं झं ञं तर्जनीभ्यां स्वाहा। उं ऊं टं ठं डं ढं णं मध्यमाभ्यां वषट्। ऋं ॠं तं थं दं धं नं अनामिकाभ्यां हुम्। लृं लॄं पं फं बं भं मं कनिष्ठिकाभ्यां वौषट्। एं ऐं यं रं लं वं करतलाभ्यां फट्। ओं औं शं षं सं हं हौं क्षं करपृष्ठाभ्यां फट्। न्यासस्ततः षडङ्गानां भवत्येवं प्रकल्पना। हृदि मूर्ध्नि शिखायां च सर्वाङ्गे नेत्रयोरपि।।५।। दिक्ष्वस्त्रं च नमः स्वाहा वषट् वौषदप्यथा। अस्त्राय फडित्येवं षडङ्गानाञ्च पल्लवम्।।६।। तत्तत् स्थाने चतुर्थ्यन्ते तत्तत् पल्लवयोगतः। तत्तदङ्गतो न्यासस्तत्तदङ्गो नियोज्यते।।७।। तब षडङ्गन्यास की विधि इस प्रकार करनी चाहिए। हृदय, शिर, शिखा, सर्वाङ्ग और दोनों नेत्रों में। दिशाओं में अस्त्र (फट्), नमः स्वाहा, वषट् तथा वौषट् तथा अस्त्राय फट् से षडङ्गन्यास का विस्तार किया जाता है। इसके बाद अपने बीजों का विस्तार उन अंगों के चतुर्थ्यन्त पद से उन अंगों का विनियोग होता है। जैसे- हृदयाय नमःए शिरसे स्वाहा, शिखायै वषट्, सर्वाङ्गे वौषट्, नेत्रयोः वौषट्, दिक्षु अस्त्राय फट्।
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द्वादशोऽध्यायः (67) अथान्तर्मातृकान्यासः कण्ठहृन्नाभिगुह्यके।¹ पायौ भ्रूमध्यके पद्मे षोडशद्वादशच्छदम्।।8।। दशपत्रे च षट्पत्रे चतुःपत्रे द्विपत्रके। पञ्चाशद्वर्णविन्यासः पत्रसंख्याक्रमाद् भवेत्।।9।। एकैकवर्णमेकैकपत्रान्ते विन्यसेन्मुने। इसके बाद अन्तर्मातृकान्यास कण्ठ, हृदय, नाभि, लिंगमूल, गुदा एवं भ्रूमध्य में होता है। क्रमशः षोडशदल कमल, द्वादशदल कमल, दशदलकमल, षड्दलकमल स्वरूप यन्त्र, चतुर्दल कमल तथा द्विदल कमल में दलों की संख्या में पचासों वर्णों का न्यास करना चाहिए। एक एक वर्ण को एक एक दल पर न्यास करें। जैसे- अं आं इं ईं उं ऊं ऋं ॠं लूं लूं एं ऐं ओं औं अं अः षोडशदलकमलाय कण्ठाय नमः। कं खं गं घं ङं चं छं जं झं ञं टं ठं द्वादशदलकमलाय हृदयाय स्वाहा। डं ढं णं तं थं दं धं नं पं फं दशदलकमलाय नाभये वषट्। बं भं मं यं रं लं षड्दलकमलाय लिङ्गमूलाय वौषट्। वं शं षं सं चतुर्दलकमलाय मूलाधाराये गुदायै वौषट्। हं क्षं द्विदलकमलाय भ्रूमध्याय फट्। एवमन्तः प्रविन्यस्य मनसातो बहिर्न्यसेत्।।10।। शिरोवदनवृत्ते च चक्षुश्रोत्रयुगेऽपि च। नासाकपोलयुगलं तथोष्ठाधरयोरपि।।11।। ऊर्ध्वाधो दन्तपङ्क्तौ च मूर्द्धास्ये षोडशस्वरान्।² कचवर्गे द्वयं बाह्वोः पञ्चसन्धिस्थले न्यसेत्।।12 तटवर्गद्वयं पादे सन्ध्यग्रेऽपि तथा न्यसेत्।³ पवर्गं पार्श्वयुगले पृष्ठनाभ्युदरेऽपि च।।13।। हृदोर्मूलककुत्कक्षे⁴ हृदयादिकरद्वयोः।⁵ जठराननयोश्चैव व्यापकं विनियोजयेत्।।14।। पञ्चाशद्वर्णविन्यासः क्रमेणैवं विधीयते।
- घ. कण्ठहृन्नाड़ीगुह्यके। 2. घ. द्वादशस्वरान्। 3. घ. पुनः। 4. स्कन्धे। 5. घ. हृदयादिकरपद्द्वये।
(68) अगस्त्य-संहिता इस प्रकार अन्तर्मातृका न्यास कर मन ही मन बहिर्मातृकान्यास करें। शिर, मुखवृत्त, दोनों नेत्रों और कानों में, दोनों नाकों और दोनों गालों, अधर, एवं ओष्ठ, ऊर्ध्वदन्त पंक्ति, अधोदन्त पंक्ति, मूर्द्धा एवं मुख इन सोलह अंगों में सोलह स्वरों का न्यास करें। इसके बाद क वर्ग एवं च वर्ग से क्रमशः दक्षिण और वाम बाहु के पाँच सन्धि स्थलों (बाहुमूल, कूर्प्पर, मणिबन्ध, अंगुलिमूल एवं अंगुल्यग्र) में न्यास करें। इस प्रकार ट वर्ग एवं त वर्ग से दक्षिण एवं वामपाद के पाँच सन्धिस्थलों (पादमूल, कूर्प्पर, मणिबन्ध, पादमूल एवं पादमूलाग्र) पर न्यास करें। प वर्ग से क्रमशः दक्षिणपार्श्व, वामपार्श्व, पृष्ठ, नाभि एवं उदर में न्यास करें। हृदय, दक्षिण बाहुमूल, ककुत्, वामबाहुमूल, हृदादिदक्षकर, हृदादिवामकर, हृदादिमुख में क्रमशः य से क्ष तक वर्णों का न्यास करें। पचास मातृकावर्णों का इस प्रकार न्यास विहित है। ॐ माद्यन्तो नमोन्तो वा सबिन्दुबिन्दुवर्जितः ।।15।। मायालक्ष्मीकामबीजपूर्वो न्यस्तव्य उच्यते। केशवाय च कीर्त्यै च तथा नारायणाय च।।16।। कान्त्यै तथा माधवाय तुष्ट्यै नम इति न्यसेत् ।। गोविन्दाय च तुष्ट्यै¹ च विष्णुर्धृत्यै वदेत् ततः।।17।। मधुसूदनाय शान्त्यै च त्रिविक्रमाय क्रियायै च। वामनाय च पुष्ट्यै² च श्रीधराय वदेत्तदा।।18।। मेधायै हृषीकेशाय हृष्ट्यै³ चापि नमस्तथा। पद्मनाभाय श्रद्धायै⁴ तथा दामोदराय च।।19।। लज्जायै वासुदेवाय लक्ष्म्यै संकर्षणाय च। सरस्वत्यै प्रद्युम्नाय प्रीत्यै नम इतीरयेत् ।।20।। अनिरुद्धाय रत्यै च स्वरान्ते प्रवदेदथ। मातृकान्यास में आदि और अन्त में ॐ लगाकर अथवा आदि में ॐ और अन्त में नमः लगाकर, बिन्दु सहित अथवा बिन्दु रहित माया बीज (ह्रीं) लक्ष्मीबीज (श्रीं) एवं कामबीज (क्लीं) आदि में जोड़कर न्यास करें।
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ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं अं केशवाय कीर्त्यै नमः। -
ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं आं नारायणाय कान्त्यै नमः।
- घ. पुष्ट्यै। 2. घ. दयायै। 3. हर्षायै। 4. घ. शुद्धायै।
द्वादशोऽध्यायः (69) 3. ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं इं माधवाय तुष्ट्यै नमः। 4. ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं ईं गोविन्दाय पुष्ट्यै नमः। 5. ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं उं विष्णवे धृत्यै नमः। 6. ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं ऊं मधुसूदनाय शान्त्यै नमः। 7. ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं ऋं त्रिविक्रमाय क्रियायै नमः। 8. ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं ॠं वामनाय पुष्ट्यै नमः। 9. ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं ऌं श्रीधराय मेधायै नमः। 10. ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं ॡं हृषीकेशाय हृष्ट्यै नमः। 11. ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं एं पद्मनाभाय श्रद्धायै नमः। 12. ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं ऐं दामोदराय लज्जायै नमः। 13. ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं ओ वासुदेवाय लक्ष्म्यै नमः। 14. ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं औं संकर्षणाय सरस्वत्यै नमः। 15. ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं अं प्रद्युम्नाय प्रीतये नमः। 16. ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं अः अनिरुद्धाय रत्यै नमः। ये स्वर मातृकाओं के अन्त में बोलें। यहाँ श्लोक संख्या 18 में 'वामनायं' के बाद 'दयायै' शब्द 'क' पाण्डुलिपि में है। ध्यातव्य है कि यहाँ विष्णु के 16 रूपों के साथ षोडशमातृकाओं का उल्लेख हुआ है। 'पुष्टि' को छोड़कर शेष 15 मातृकाएँ स्पष्ट हैं, अतः यहाँ 'पुष्ट्यै च' पाठ माना जाना चाहिए। चक्रिणे विजयायै च गदिने शार्ङ्गिणे तथा ।।21।। दुर्गायै च प्रभायै च [सत्यायै] खङ्गिने [तथा] । [शंखिने च चण्डायै नमो तदनन्तरं वदेत्] ।।22।। हलिने च तथा वाण्यै नमो मुसलिने वदेत्। विलासिन्यै शूलिने च जयायै तदनन्तरम् ।।23।। पाशिने विरजायै च तथा चाङ्कुशिने वदेत्। विश्वायै च मुकुन्दाय विमदायै नमस्ततः।। 24 ।। नन्दजाय सुनन्दायै नन्दिने स्मृतये नमः। नराय ऋद्ध्यै तद्वच्च नरकजिते तथा वदेत् ।।25।। समृद्धयै हरये शुद्ध्यै कृष्णाय तुष्ट्यै तथा।
(70) अगस्त्य-संहिता सत्याय मत्यै सात्विताय सत्यै नमो वदेत्।।26।। शौरये च क्षमायै च शूराय परमायै नमः। जनार्दनाय चोमायै ततः स्याद् भूधराय च।।27।। क्लेदिन्यै च विश्वमूर्त्यै क्लिन्नायै तदनन्तरम्। वैकुण्ठाय नमस्तद्वद् वसुदायै नमस्ततः।।28।। पुरुषोत्तमाय वसुधायै बलिनेऽपराजितायै। तथा बलानुजाय परायणायै नम इतीरयेत्।।29।। वृषभाय च सूक्ष्मायै वृषाय सन्ध्यायै नमः। हंसाय च प्रज्ञायै वराहाय प्रभायै तथा।।30।। विमलाय निशायै च नृसिंहाय तदन्तरम्। अमोघायै नमस्तद्वद् वैष्णवीं मातृकां न्यसेत्।।31।। क्रमेण कामबीजं च मातृकाक्षरमेव च। 1केशवं चापि कीर्तिं च नमोऽन्तं विन्यसेत् पुनः।।32।। 2शिरोवदनवृत्तादिस्थानेष्वेवं विधिः स्मृतः। 1 ॐ क्लीं कं चक्रिणे विजयायै केशवाय कीर्त्यै नमः। 2 ॐ क्लीं खं गदिने दुर्गायै केशवाय कीर्त्यै नमः। 3 ॐ क्लीं गं शार्ङ्गिणे प्रभायै केशवाय कीर्त्यै नमः। 4 ॐ क्लीं घं खङ्गिने सत्यायै केशवाय कीर्त्यै नमः। 5 ॐ क्लीं ङं शङ्खिने चण्डायै केशवाय कीर्त्यै नमः। 6 ॐ क्लीं चं हलिने वाण्यै केशवाय कीर्त्यै नमः। 7 ॐ क्लीं छं मुसलिने विलासिन्यै केशवाय कीर्त्यै नमः। 8 ॐ क्लीं जं शूलिने जयायै केशवाय कीर्त्यै नमः। 9 ॐ क्लीं झं पाशिने विरजायै केशवाय कीर्त्यै नमः। 10 ॐ क्लीं ञं अङ्कुशिने विश्वायै केशवाय कीर्त्यै नमः। 11 ॐ क्लीं टं मुकुन्दाय विमदायै केशवाय कीर्त्यै नमः। 12 ॐ क्लीं ठं नन्दजाय सुनन्दायै केशवाय कीर्त्यै नमः। 13 ॐ क्लीं डं नन्दिने स्मृतये केशवाय कीर्त्यै नमः। 14 ॐ क्लीं ढं नराय ऋद्धयै केशवाय कीर्त्यै नमः। 15 ॐ क्लीं णं नरकजिते समृद्धयै केशवाय कीर्त्यै नमः। 1.-2. घ. में अनुपलब्ध।
द्वादशोऽध्यायः (71) 16 ॐ क्लीं तं हरये शुद्धौ केशवाय कीर्त्यै नमः। 17 ॐ क्लीं थं कृष्णाय तुष्ट्यै केशवाय कीर्त्यै नमः। 18 ॐ क्लीं दं सत्याय मत्यै केशवाय कीर्त्यै नमः। 19 ॐ क्लीं धं सात्विताय सत्यै केशवाय कीर्त्यै नमः। 20 ॐ क्लीं नं शौरये क्षमायै केशवाय कीर्त्यै नमः। 21 ॐ क्लीं पं शूराय परमायै केशवाय कीर्त्यै नमः। 22 ॐ क्लीं फं जनार्दनाय उमायै केशवाय कीर्त्यै नमः। 23 ॐ क्लीं बं भूधराय क्लेदिन्यै केशवाय कीर्त्यै नमः। 24 ॐ क्लीं भं विश्वमूर्तये क्लिन्नायै केशवाय कीर्त्यै नमः। 25 ॐ क्लीं मं वैकुण्ठाय वसुदायै केशवाय कीर्त्यै नमः। 26 ॐ क्लीं यं पुरुषोत्तमाय वसुधायै केशवाय कीर्त्यै नमः। 27 ॐ क्लीं रं बलिने अपराजितायै केशवाय कीर्त्यै नमः। 28 ॐ क्लीं लं बलानुजाय परायणायै केशवाय कीर्त्यै नमः। 29 ॐ क्लीं वं वृषध्वाय च सूक्ष्मायै केशवाय कीर्त्यै नमः। 30 ॐ क्लीं शं वृषाय सन्ध्यायै केशवाय कीर्त्यै नमः। 31 ॐ क्लीं षं हंसाय च केशवाय कीर्त्यै प्रज्ञायै नमः। 32 ॐ क्लीं सं वराहाय प्रभायै केशवाय कीर्त्यै नमः। 33 ॐ क्लीं हं विमलाय निशायै केशवाय कीर्त्यै नमः। 34 ॐ क्लीं क्षं नृसिंहाय अमोघायै केशवाय कीर्त्यै नमः। इस प्रकार वैष्णव मन्त्रों से मातृकान्यास करें। क्रम से कामबीज (क्लीं) एवं मातृका के अक्षर बोलकर केशवाय कीर्त्यै नमः यह जोड़कर न्यास करें। शिर, मुखवृत्त आदि स्थानों में यह विधि कही गयी है। (केशवादिन्यास के स्थल पर मूल 'क' पाण्डुलिपि का वाचन कष्टसाध्य होने के कारण पाठोद्धार के लिए म. म. गोविन्द ठाकुर (14वीं शती) कृत पूजा-प्रदीप के केशवादिन्यास का सहयोग लिया गया है, जो परम्परा की दृष्टि से प्रामाणिक है तथा पाण्डुलिपि 'क' के अनुरूप है। ये सम्पादित अंश कोष्ठ के अन्तर्गत हैं। बंगाल से प्रकाशित प्रति घ. में यह केशवादिन्यास बहुधा भिन्न है, अतः इसे पृथक् उद्धृत किया जा रहा है— [चक्रिणे दयायै च गदिने शार्ङ्गिणे तथा।।21।। दुर्गायै च प्रभायै च खङ्गिने विन्यसेदथ।
(72) अगस्त्य-संहिता सत्यायै शङ्खिने चैव चण्डायै च नमो नमः ।।२२।। हलिने वाण्यै दद्याच्च तथा मुषलिने वदेत्। विलासिन्यै शूलिने विजयायै तदनन्तरम् ।।२३।। पाशिने विरजायै च तथा चाङ्कुशिने वदेत्। विश्वायै च मुकुन्दाय विनदायै नमस्ततः ।।२४।। नन्दजाय सुनन्दायै नन्दिने स्मृतये नमः। नराय ऋद्ध्यै च तथा तद्वन्नरकजिते तथा ।।२५।। समृद्ध्यै हरये शुद्ध्यै कृष्णाय बुद्धये तथा। सत्याय भुक्त्यै सात्वताय मत्यै नम इतीरयेत् ।।२६।। शौराय च क्षमायै च शूराय रमायै नमः। जनार्दनाय चोमायै ततः स्याद् भूधराय च ।।२७।। क्लेदिन्यै च विश्वमूर्त्यै क्लिन्नायै तदनन्तरम्। वैकुण्ठाय नमस्तद्वद् वसुदायै नमस्ततः। पुरुषोत्तमाय वसुधायै बलिने परायै ततः ।।२८।। बलानुजाय परायणायै नम इतीरयेत्। महाबलाय सूक्ष्मायै नमः स्यात्तदनन्तरम्। वृषघ्नाय सन्ध्यायै वृषाय प्रज्ञायै नमः ।।२९।। हंसाय च प्रभायै वराहाय निशायै तथा। विमलाय अमोघायै नृसिंहाय तदन्तरम्। विद्युतायै नमस्तद्वद् वैष्णवी मातृकां न्यसेत् ।।३०।। क्रमेण कामबीजञ्च मातृकाक्षरमेव च।] ¹ॐकारं कामबीजं च मातृकाक्षरमेव च ।।३३।। ²एकं देवं तथा शक्तिमेकां नम इति क्रमः। ॐकार, कामबीज, मातृकाक्षर इसके बाद एक देव एक शक्ति तथा इसके बाद नमः बोलें यहीं क्रम है। केशवादिरयं न्यासो न्यासमात्रेण देहिनाम् ।।३४।। अच्युतत्वं ददात्येव सत्यं सत्यं न संशयः। यह केशवादि न्यास कहलाता है। केवल इस न्यास से प्राणियों को अच्युतत्व मिल जाता है, यह सत्य है, इसमें सन्देह नहीं। 1.-2. घ. में अनुपलब्ध।
द्वादशोऽध्यायः (73) सुतीक्ष्ण तत्त्वं बक्ष्यामि तत्त्वन्यासमतः शृणु ।।३५।। यत्तत्त्वन्यासमात्रेण तत्त्वमेव प्रजायते। मादयः प्रतिलोमेन कान्ताः स्युस्तत्त्वसंज्ञया।।३६।। हे सुतीक्ष्ण! अब मैं तत्त्व को बतलाता हूँ। इसलिए तत्त्वन्यास सुनो। केवल तत्त्वन्यास से तत्त्व उत्पन्न होता है। मकार से प्रारम्भ कर 'क' से अन्त कर किया गया न्यास तत्त्वन्यास कहलाता है। नमः पराय पूर्वन्तु प्रणवान्ते व्यवस्थिताः। जीवः प्राणाश्च बुद्धिश्चाहंकारो मनस्तथा।।३७।। सर्वाङ्गे हृदि विन्यस्य श्रोत्रादीनीन्द्रियाण्यपि।¹ मूर्ध्नि घ्राणे च हृदयेऽप्युपस्थे पादयोरपि।।३८।। ‘नमः पराय’ इस मन्त्र को सबसे पहले प्रणव के बाद जोड़कर जीव, प्राण, बुद्धि, अहंकार एवं मन को सर्वाङ्ग एवं हृदय में न्यास कर श्रोत्र आदि पाँच इन्द्रियों को भी मूर्द्धा, घ्राण, हृदय, उपस्थ एवं दोनों पैरों में न्यास करें। श्रोत्रत्वक्चक्षुर्जिह्वा च घ्राणरूपाणि देहिनाम्। ज्ञानेन्द्रियाणि पञ्चापि तत्तत्स्थाने न्यसेत् पुनः।।३९।। वाक्पाणिपायुपादांश्च कर्माख्यानि ह्युपस्थकम्। तथैव तत्तत् स्थानेषु तत्तदेव प्रविन्यसेत्।।४०।। दोनों कान, त्वचा, दोनों आँखें, जीभ, और नासिका, ये पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ है तथा वाणी, दोनों हाथ, दोनों पैर, गुदा, और जननेन्द्रिय, ये पाँच कर्मेन्द्रिय हैं। उन उन स्थानों में न्यास करें। इसी क्रम से उन उन स्थानों उन उन तत्त्वों का न्यास करें। शिरोमुखे च हृदये तथा गुह्येपि पादयोः। आकाशानिलतेजांसि सलिलं पृथिवी तथा।।४२।। विन्यसेत् पूर्ववच्चैव न्यासविद्भिरुदीरितम्।² शिर, मुख, हृदय, गुह्य एवं दोनों पैरों में क्रमशः आकाश, वायु, तेज, जल एवं पृथिवी का न्यास पूर्ववत् मन्त्र के साथ न्यास के ज्ञानियों के द्वारा कही गयी विधि से करें।
- घ. शब्दादीनि ततः परम्। 2. घ. ०रुदाहृतम्।
(74) अगस्त्य-संहिता
सहौ शरौ च यश्चापि षश्च लश्च वलावपि। । 43 ।। क्षौं चेति दश वर्णांश्च प्रणवान्ते च पूर्ववत्।¹ स एवं ह, श एवं र, य, ष, ल, व, ल तथा क्षौं ये दश वर्ण हैं, जो पूर्वोक्त विधि से प्रणव ॐकार के बाद लगाये जायेंगे। हृत्पद्मे सोमसूर्याग्नित्वकलायुक्तमण्डलम् ।। 44 ।। त्रयं हृद्येव विन्यस्य वासुदेवादयस्तथा। परमेष्ठी च पुरुषो विश्वस्यापि निवर्तकः ।²। 45 ।। नारायणो नृसिंहश्च सर्वकोपाख्यपूर्वकौ। मूर्द्धास्ये हृदि गुह्ये च पादयोर्व्यापकं तथा ।। 46 ।। तदात्मने नम इति तत्तत्स्थाने न्यसेत् ततः। हृदय रूपी कमल में, अपनी कलाओं के साथ सोममण्डल, सूर्यमण्डल एवं अग्निमण्डल की कल्पना कर इन तीनों का हृदय में ही न्यास करें और वासुदेवादि न्यास करें। वासुदेव, परमेष्ठी, पुरुष, विश्वनिवर्तक, नारायण और नृसिंह, ये छह देव हैं। यहाँ दोनों प्रकार के न्यासों में कोप-मन्त्र (हुम्) को पूर्व में व्यवहार करें। इसमें 'तदात्मने नमः' यह योग कर मूर्द्धा, मुख, हृदय, गुह्य, दोनों पैर एवं सर्वांग में न्यास करें। जैसे- ॐ हुं वासुदेवाय मूर्द्धात्मने नमः इति मूर्ध्नि। ॐ हुं परमेष्ठिने मुखात्मने नमः इति मुखे। ॐ हुं पुरुषाय हृदयात्मने नमः इति हृदि। ॐ हुं विश्वनिवर्तकाय गुह्यात्मने इति गुह्ये। ॐ हुं नारायणाय पादात्मने इति पादयोः। ॐ हुं नृसिंहाय सर्वाङ्गात्मने नमः इति सर्वाङ्गे। अतत्त्वस्याप्यपूज्यस्य तत्प्राप्तेर्हेतुना³ पुनः ।। 47 ।। तत्त्वन्यासमिदं प्राहुर्न्यासं तत्त्वविदो बुधाः। जो तत्त्व नहीं है और पूज्य भी नहीं है उसकी प्राप्ति के लिए कारण के साथ उन तत्त्वों के न्यास को मनीषियों ने तत्त्व-न्यास कहा है। यः कुर्यात् तत्त्वविन्यासं स एव भवति ध्रुवम् ।। 48 ।। तदात्मनानुप्रविश्य भगवानिह तिष्ठति। यतः स एव तत्त्वानि तस्मिन् सर्वं प्रतिष्ठितम् ।। 49 ।।
- घ. प्रणम्यान्ते च पूर्ववत्। 2. घ. विश्वकोऽपि निवृत्तिकः। 3. क. तत्प्राप्तौ हेतना।
द्वादशोऽध्यायः (75)
जो तत्त्वविन्यास करता है, वह तत्त्व ही हो जाता है। इन स्थानों में आत्मस्वरूप में प्रवेश कर भगवान् अवस्थित होते हैं; क्योंकि तत्त्व वही है, जिसमें सबकुछ अवस्थित है। तन्मूर्तिपञ्जरं न्यासस्तस्य तन्मूर्तिसिद्धये। आकर्ण्यैकचित्तः सन् यतोऽस्ति न फलान्तरम् ।। ५० ।। भगवान् मूर्तिरूपी शरीर का यह न्यास उनके स्वरूप की सिद्धि के लिए एकाग्र होकर सुनो; क्योंकि इससे अधिक फल कही भी नहीं है। नमो भगवते ब्रूयाद् वासुदेवाय इत्यथ। ॐआदिरस्य¹ मन्त्रस्य आदायैकाक्षरं ततः ।। ५१ ।। एकैकमक्षरं तद्वत् श्रीरामाख्यमनोरपि। द्विरावृत्याक्षरादानं विष्णोर्द्वादशनामसु ।। ५२ ।। नामैकैकमुपादाय सूर्यस्यापि च नामसु। सबसे पहले ॐ नमो भगवते कहें। इसके बाद वासुदेवाय कहें। फिर इस मन्त्र के ॐकारसहित इस मन्त्र के एक एक अक्षर लें। इसी प्रकार श्रीराम के षडक्षर मन्त्र दो-दो बार लेकर विष्णु के बारह नामों में से एक-एक नाम जोड़कर फिर सूर्य के बारह नामों में से भी एक-एक नाम लगाकर मन्त्र बनायें। ओमन्तश्च स्वरस्तद्वद् वासुदेवाक्षरं ततः ।। ५३ ।। श्रीराममन्त्रवर्णश्च ततः स्युः केशवादयः। धात्रादयो नमोऽन्तोयं न्यस्तव्यो न्यासयोगतः ।। ५४ ।। इस मन्त्र में सबसे पहले ॐकार, तब स्वर-वर्ण, तब उसी प्रकार वासुदेव- मन्त्र के वर्ण, तब श्रीराममन्त्र के वर्ण तब केशव आदि बारह नाम, तब धाता आदि सूर्य के नाम तब अन्त में नमः लगाकर न्यास के योग से अङ्गन्यास करें। ललाटे नाभिहृदये कण्ठपार्श्वांशकन्धरे। पार्श्वान्तरांशे स्कन्धे च पृष्ठे ककुदि च क्रमात् ।। ५५ ।। इस मन्त्रों को क्रमशः ललाट, नाभि, हृदय, कण्ठ, पार्श्वभाग, कन्धर, वामपार्श्व, दक्षिणपार्श्व, स्कन्ध, पृष्ठ, ककुत् में न्यास करें।
- घ. ओमादावस्य मन्त्रस्य। Rarest Archiver
(76) अगस्त्य-संहिता केशवस्य ततो ब्रूयान्नारायण इति स्वयम्। माधवश्चैव गोविन्दो विष्णुश्च मधुसूदनः ।। ५६ ।। त्रिविक्रमो वामनश्च श्रीधरो नवमः स्मृतः । हृषीकेशः पद्मनाभस्तथा दामोदरः प्रभुः ।। ५७ ।। विष्णोर्द्वादशनामानि चेमानि मुनिसत्तम । हे मुनिश्रेष्ठ! भगवान् विष्णु के ये बारह नाम हैं- केशव, नारायण, माधव, गोविन्द, विष्णु, मधुसूदन, त्रिविक्रम, वामन, श्रीधर, हृषीकेश, पद्मनाभ, दामोदर। धातार्यमा च मित्रः वरुणो हंसो भगस्तथा।¹ ।। ५८ ।। विवश्वदिन्द्रः पूषा च पर्जन्यः दशमः स्मृतः। त्वष्टा च विष्णुरित्येवं नामानि द्वादशात्मनः ।। ५९ ।। तन्मूर्तिपंजरन्यासोऽभिहितः परमेष्ठिना। द्वादशात्मन् सूर्य के ये बारह नाम हैं- धाता, अर्यमा, मित्र, वरुण, हंस, भग, विवस्वान्, इन्द्र, पूषा, पर्जन्य, त्वष्टा, विष्णु। इस प्रकार मूर्तिपंजर-न्यास ब्रह्मा ने कहा है। इस न्यास के मन्त्र इस प्रकार बनते हैं- ॐ अ ॐ ॐ केशवाय द्वादशात्मने नमः। इति ललाटे ॐ आ न रा नारायणाय धात्रे नमः। इति नाभौ ॐ इ मो मा माधवाय अर्यम्णे नमः। इति हृदये ॐ ई भ य गोविन्दाय मित्राय नमः। इति कण्ठे ॐ उ ग न विष्णवे वरुणाय नमः। इति श्वासे ॐ ऊ व मः मधुसूदनाय शोभगाय नमः। इति प्रश्वासे ॐ ऋ ते ॐ त्रिविक्रमाय विवस्वते नमः। इति कन्धे ॐ लृ वा रा वामनाय इन्द्राय नमः। इति ललाटे वामपार्श्वे ॐ ए सु मा श्रीधराय पूषणे नमः। इति ललाटे दक्षिणपार्श्वे ॐ ऐ दे य हृषीकेशाय पर्जन्याय नमः। इति ललाटे स्कन्धे ॐ ओ वा न पद्मनाभाय त्वष्ट्रे नमः। इति ललाटे पृष्ठे ॐ औ य मः दामोदराय विष्णवे नमः। इति ललाटे ककुदि
- घ. वरुणोऽहंशुभगस्तथा, क. वरुणोसोभगस्तथा।
त्रयोदशोऽध्यायः (77) शिरोभूमध्यहृदयनाभिगुह्यपदस्थले ।।60।। मूलमन्त्राक्षरैर्न्यासं षडङ्गमपि विन्यसेत्। इसके अतिरिक्त मूलमन्त्र के अक्षरों से शिर, भ्रूमध्य, हृदय, नाभि, गुदा एवं दोनों पैरों में षडङ्गन्यास भी करें। जैसे- ॐ नमः पराय इति शिरसि। रा नमः पराय भ्रूमध्ये मा नमः पराय हृदये य नमः पराय नाभौ न नमः पराय गुदायाम्। मः नमः पराय पादयोः। एवं विन्यस्य विधिवत् साक्षान्नारायणो भवेत् ।।61।। जरारोगाभिचाराद्याः¹ प्रलयं यान्ति नान्यथा। भूतप्रेतपिशाचाश्च तथैव ब्रह्मराक्षसाः ।।62।। कूष्माण्डाश्चैव डाकिन्यो नैव द्रष्टुमपि क्षमाः। य एवं विन्यसेद्धीमान् रामः साक्षात् स्वयं भवेत् ।।63।। ²नातः परतरं किञ्चित् पावनं पुण्यमस्ति हि। इस प्रकार का न्यास कर वह साधक प्रत्यक्ष नारायणस्वरूप हो जाता है। बुढ़ापा, रोग, दूसरे के द्वारा किये गये अभिचार आदि नष्ट हो जाते हैं। भूत, प्रेत, पिशाच, ब्रह्मराक्षस, कूष्माण्ड, डाकिनी आदि तो उसे देखने में भी समर्थ नहीं होते हैं। जो बुद्धिमान् इस प्रकार न्यास करते हैं, वे साक्षात् श्रीराम-स्वरूप हो जाते हैं। इससे अधिक पवित्र पुण्य कुछ भी नहीं है। इत्यगस्त्यसंहितायां परमरहस्ये शरीरन्यासे द्वादशोऽध्यायः। अथ त्रयोदशोऽध्यायः अगस्त्य उवाच सुतीक्ष्ण पात्राण्यासाद्य ततः पूजार्थमादरात्। शङ्खमन्त्रेण संशोध्य सदाधारे निधाय च।।1।।
- घ. ज्वररोगाभिचाराद्याः। 2. क. में अनुपलब्ध।
(78) अगस्त्य-संहिता पूजयेदग्निसूर्येन्दुबीजैस्तत्तत्कलान्वितैः । तत्तत्कलानां संख्या च दश द्वादश षोडश।।२।। अगस्त्य बोले- हे सुतीक्ष्ण पूजा-पात्रों को एकत्रित कर पूजा के लिए आदर पूर्वक शंख को अस्त्र-मन्त्र से शोधित कर उसे सुन्दर आधार पर रखकर कलाओं के साथ अग्निबीज (रं) सूर्यबीज (सं) एवं चन्द्रबीज (सं) से पूजा करें। उनकी कलाएँ क्रमशः दस, बारह एवं सोलह हैं। आधारशङ्खतीर्थेषु तत्तन्मण्डलमर्चयेत्।¹ तीर्थावाहनमन्त्रैश्च तीर्थान्यावाह्य पूजयेत्।।३।। गन्धपुष्पाक्षतैर्धूपैर्दीपाद्यैरति भक्तितः। शङ्खे पाणितलं दत्त्वा जपेन्मन्त्रं षडक्षरम्।।४।। आधार शंख के जल में उन उन मण्डलों की पूजा करें। तीर्थावाहन मन्त्रों से तीर्थों का आवाहन कर गन्ध, पुष्प, अक्षत, धूप, दीप आदि से अत्यन्त भक्तिपूर्वक पूजा करें। इसके बाद शंख के ऊपर तलहथी रखकर षडक्षर मन्त्र का जप करें। चिन्मयं चिन्तयेत्तीर्थमानीयाङ्कुशमुद्रया। ब्रह्माण्डोदरतीर्थाभ्यां धेनुमुद्रां प्रदर्श्य च।।५।। शङ्खमुद्रां चक्रमुद्रां गरुडाख्याञ्च दर्शयेत्। ब्रह्माण्ड के उदर से तथा पवित्र तीर्थों से अंकुश मुद्रा के द्वारा तीर्थों का धेनु-मुद्रा दिखाकर शंखमुद्रा, चक्रमुद्रा और गरुडमुद्रा दिखावें। परमीकृत्य यत्नेन पावनं² तद्विचिन्तयेत्।।६।। देवस्य मूर्ध्नि तत्सिञ्चेत् पूजाद्रव्येषु चात्मनः। . इस प्रकार यत्न पूर्वक अमृतीकरण कर उस शंख जल को परम पवित्र मानें और उसे देवता के मस्तक पर, पूजा सामग्रियों पर तथा अपने ऊपर छिड़कें। अवेक्षणं प्रोक्षणञ्च वीक्षणं ताडनं तथा।।७।। अर्चनं चैव सर्वेषां पावनत्वं प्रकल्पयेत्। पूतमेवाखिलं पूजायोग्यं भवति सार्थकम्।।८।। उस शंखजल के दर्शन की क्रिया में प्रोक्षणमुद्रा दिखाकर तथा पुनः दर्शन में ताड़न मुद्रा दिखावें किन्तु दोनों क्रियाओं में अर्चन मुद्रा दिखाकर उसकी पवित्रता की कल्पना करें।
- क. तत्तदात्मानमर्चयेत्। 2. घ. परमं
त्रयोदशोऽध्यायः (79) अर्घ्यपाद्यप्रदानार्थं • मधुपर्कार्थमप्यथ। तथैवाचमनार्थञ्च न्यसेत् पात्रचतुष्टयम्।।9।। आत्मनः पुरतः शङ्खं पूर्वतः साधयेत्ततः। अर्घ्यपात्रे पाद्यपात्रे सम्पूर्य^1 सलिलं शुभम्।।10।। तथार्घ्यपात्रे दातव्याः गन्धपुष्पयवाक्षताः। कुशाग्रतिलदूर्वाश्च सर्षपाश्चार्थसिद्धये।।11।। अर्घ्य, पाद्य, मधुपर्क एवं आचमन समर्पण के लिए चार पात्र स्थापित करें। अपने सामने में शंख को पूर्व दिशा से रखें। अर्घ्यपात्र और पाद्यपात्र में पवित्र जल भरकर अर्घ्य पात्र में चन्दन, पुष्प, यव, अक्षत, कुश का अगला भाग, तिल, दूर्वा और सरसो कामनाओं की पूर्ति के लिए डालें। पाद्यपात्रे प्रदातव्यं श्यामाकं दूर्वमेव च। अब्जं च विष्णुक्रान्तां च पाद्यसिद्धयै प्रयोजयेत्।।12।। पाद्यपात्र में साँवा, दूर्वा, कमल एवं अपराजिता ये पाद्य के प्रयोजन के लिए डालें। तथाचमनपात्रेऽपि दद्याज्जातीफलं मुने। लवङ्गमपि कङ्कोलं शस्तमाचमनीयकम्।।13।। दध्ना च मधुसर्पिभ्यां मधुपर्को भविष्यति। आचमनपात्र में जायफल, लौंग, कंकोल डालें जो आचमन के लिए प्रशस्त हैं। दही, मधु और घृत मिलकर मधुपर्क बनता है। स्नानं पुरुषसूक्तेन शुद्धशङ्खोदकेन च।।14।। क्षीरदध्याज्यमधुभिः खण्डेन च पृथक् पृथक्। नारिकेरोदकेनापि तथान्यञ्च फलाम्बुना।^2।।15।। शुद्ध शंख जल से, दूध, दही, घी, मधु और शर्करा से पृथक् पुरुषसूक्त से स्नान कराना चाहिए। अथवा नारियल के जल से तथा अन्य फलों के रस से। ^3क्षीरस्नानं प्रकुर्वन्ति ये नराः राममूर्द्धनि। शताश्वमेधजं पुण्यं बिन्दुना बिन्दुना शतम्।।16।।
- घ. संपूज्य। 2. घ. तथा तालफलाम्बुभिः। 3. यहाँ से श्लोक सं. 16 एवं 17 'घ' में अनुपलब्ध।
(80) अगस्त्य-संहिता
क्षीरं दशगुणं दध्ना घृतञ्चैव दशोत्तरम्। घृताद् दशगुणं क्षौद्रं क्षौद्राद्दशगुणोत्तरम् ।।17 ।। जो मनुष्य श्रीराम की मूर्द्धा पर दूध से अभिषेक करते हैं, वे प्रत्येक बूँद से सौ सौ अश्वमेध यज्ञ के फल को प्राप्त करते हैं। दही से अभिषेक की अपेक्षा दुग्धाभिषेक दश गुणा फलदायी है तथा घृताभिषेक सौ गुणा। घृताभिषेक का दशगुणा मधु-अभिषेक का फल है। गन्धद्रव्यैश्च बहुभिस्तथा गन्धोदकेन च। ऐक्षवेणोदकेनापि कर्पूरादिसुगन्धिना ।।18 ।। कदलीपनसाम्रोत्थजलेनापि सुगन्धिना। शतं सहस्रमयुतं भक्त्या¹ चाप्यभिषेचयेत् ।।19 ।। चन्दन आदि सुगन्धित पदार्थों से चन्दन मिश्रित जल से अभिषेक करना चाहिए। ईख का रस, कर्पूर आदि सुगन्धित पदार्थ से अथवा केला, कटहल, आम आदि के सुगन्धित रस से सौ बार, हजार बार और दस हजार बार भक्तिपूर्वक अभिषेक करना चाहिए। शङ्खं सम्पूर्य तेनैव सपुष्पेण रघूत्तमम्। सकृष्णागुरुधूपेन धूपयेदन्तरात्मना ।।20 ।। ततः शुद्धजलेनैव स्नापयेत् तमनन्यधीः। राज्यार्थी राज्यसिद्ध्यर्थमैवं वत्सरमादरात् ।।21 ।। एवमेवाभिषिञ्चेत राजा भवति नान्यथा। शंख को उन रसों से भरकर उसमें फूल डालकर अभिषेक करें। गुग्गुल का धूप बीच बीच में हृदय से अर्पित करे। तब शुद्ध जल से राज्य की कामना से एकाग्र होकर स्नान कराएँ। इस प्रकार, राज्यसिद्धि के लिए आदरपूर्वक एक वर्ष तक अभिषेक करे, तो वह राजा होता है, इसमें सन्देह नहीं। दत्वाप्याचमनीयं च वाससी परिधापयेत् ।।22 ।। ततो भूषणदानञ्च सोत्तरीयेण वाससा। यज्ञोपवीतं दत्वा च दद्याच्चन्दनमादरात् ।।23 ।। इसके बाद आचमन समर्पित कर जोड़ा वस्त्र पहनावें। तब आभूषण आदि देकर दुपट्टा के साथ वस्त्र चढ़ावें। फिर यज्ञोपवीत देकर आदरपूर्वक चन्दन दें।
- घ. शक्त्या।