अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)
Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary
महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा
पृष्ठ 141, कुल 337 में से
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क्षीरं दशगुणं दध्ना घृतञ्चैव दशोत्तरम्। घृताद् दशगुणं क्षौद्रं क्षौद्राद्दशगुणोत्तरम् ।।17 ।। जो मनुष्य श्रीराम की मूर्द्धा पर दूध से अभिषेक करते हैं, वे प्रत्येक बूँद से सौ सौ अश्वमेध यज्ञ के फल को प्राप्त करते हैं। दही से अभिषेक की अपेक्षा दुग्धाभिषेक दश गुणा फलदायी है तथा घृताभिषेक सौ गुणा। घृताभिषेक का दशगुणा मधु-अभिषेक का फल है। गन्धद्रव्यैश्च बहुभिस्तथा गन्धोदकेन च। ऐक्षवेणोदकेनापि कर्पूरादिसुगन्धिना ।।18 ।। कदलीपनसाम्रोत्थजलेनापि सुगन्धिना। शतं सहस्रमयुतं भक्त्या¹ चाप्यभिषेचयेत् ।।19 ।। चन्दन आदि सुगन्धित पदार्थों से चन्दन मिश्रित जल से अभिषेक करना चाहिए। ईख का रस, कर्पूर आदि सुगन्धित पदार्थ से अथवा केला, कटहल, आम आदि के सुगन्धित रस से सौ बार, हजार बार और दस हजार बार भक्तिपूर्वक अभिषेक करना चाहिए। शङ्खं सम्पूर्य तेनैव सपुष्पेण रघूत्तमम्। सकृष्णागुरुधूपेन धूपयेदन्तरात्मना ।।20 ।। ततः शुद्धजलेनैव स्नापयेत् तमनन्यधीः। राज्यार्थी राज्यसिद्ध्यर्थमैवं वत्सरमादरात् ।।21 ।। एवमेवाभिषिञ्चेत राजा भवति नान्यथा। शंख को उन रसों से भरकर उसमें फूल डालकर अभिषेक करें। गुग्गुल का धूप बीच बीच में हृदय से अर्पित करे। तब शुद्ध जल से राज्य की कामना से एकाग्र होकर स्नान कराएँ। इस प्रकार, राज्यसिद्धि के लिए आदरपूर्वक एक वर्ष तक अभिषेक करे, तो वह राजा होता है, इसमें सन्देह नहीं। दत्वाप्याचमनीयं च वाससी परिधापयेत् ।।22 ।। ततो भूषणदानञ्च सोत्तरीयेण वाससा। यज्ञोपवीतं दत्वा च दद्याच्चन्दनमादरात् ।।23 ।। इसके बाद आचमन समर्पित कर जोड़ा वस्त्र पहनावें। तब आभूषण आदि देकर दुपट्टा के साथ वस्त्र चढ़ावें। फिर यज्ञोपवीत देकर आदरपूर्वक चन्दन दें।
- घ. शक्त्या।