भारतकोश
अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary

महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा

DevanagariSanskritpublished337 पृष्ठ

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पृष्ठ 140

त्रयोदशोऽध्यायः (79) अर्घ्यपाद्यप्रदानार्थं • मधुपर्कार्थमप्यथ। तथैवाचमनार्थञ्च न्यसेत् पात्रचतुष्टयम्।।9।। आत्मनः पुरतः शङ्खं पूर्वतः साधयेत्ततः। अर्घ्यपात्रे पाद्यपात्रे सम्पूर्य^1 सलिलं शुभम्।।10।। तथार्घ्यपात्रे दातव्याः गन्धपुष्पयवाक्षताः। कुशाग्रतिलदूर्वाश्च सर्षपाश्चार्थसिद्धये।।11।। अर्घ्य, पाद्य, मधुपर्क एवं आचमन समर्पण के लिए चार पात्र स्थापित करें। अपने सामने में शंख को पूर्व दिशा से रखें। अर्घ्यपात्र और पाद्यपात्र में पवित्र जल भरकर अर्घ्य पात्र में चन्दन, पुष्प, यव, अक्षत, कुश का अगला भाग, तिल, दूर्वा और सरसो कामनाओं की पूर्ति के लिए डालें। पाद्यपात्रे प्रदातव्यं श्यामाकं दूर्वमेव च। अब्जं च विष्णुक्रान्तां च पाद्यसिद्धयै प्रयोजयेत्।।12।। पाद्यपात्र में साँवा, दूर्वा, कमल एवं अपराजिता ये पाद्य के प्रयोजन के लिए डालें। तथाचमनपात्रेऽपि दद्याज्जातीफलं मुने। लवङ्गमपि कङ्कोलं शस्तमाचमनीयकम्।।13।। दध्ना च मधुसर्पिभ्यां मधुपर्को भविष्यति। आचमनपात्र में जायफल, लौंग, कंकोल डालें जो आचमन के लिए प्रशस्त हैं। दही, मधु और घृत मिलकर मधुपर्क बनता है। स्नानं पुरुषसूक्तेन शुद्धशङ्खोदकेन च।।14।। क्षीरदध्याज्यमधुभिः खण्डेन च पृथक् पृथक्। नारिकेरोदकेनापि तथान्यञ्च फलाम्बुना।^2।।15।। शुद्ध शंख जल से, दूध, दही, घी, मधु और शर्करा से पृथक् पुरुषसूक्त से स्नान कराना चाहिए। अथवा नारियल के जल से तथा अन्य फलों के रस से। ^3क्षीरस्नानं प्रकुर्वन्ति ये नराः राममूर्द्धनि। शताश्वमेधजं पुण्यं बिन्दुना बिन्दुना शतम्।।16।।

  1. घ. संपूज्य। 2. घ. तथा तालफलाम्बुभिः। 3. यहाँ से श्लोक सं. 16 एवं 17 'घ' में अनुपलब्ध।