भारतकोश
अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary

महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा

DevanagariSanskritpublished337 पृष्ठ

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पृष्ठ 139

(78) अगस्त्य-संहिता पूजयेदग्निसूर्येन्दुबीजैस्तत्तत्कलान्वितैः । तत्तत्कलानां संख्या च दश द्वादश षोडश।।२।। अगस्त्य बोले- हे सुतीक्ष्ण पूजा-पात्रों को एकत्रित कर पूजा के लिए आदर पूर्वक शंख को अस्त्र-मन्त्र से शोधित कर उसे सुन्दर आधार पर रखकर कलाओं के साथ अग्निबीज (रं) सूर्यबीज (सं) एवं चन्द्रबीज (सं) से पूजा करें। उनकी कलाएँ क्रमशः दस, बारह एवं सोलह हैं। आधारशङ्खतीर्थेषु तत्तन्मण्डलमर्चयेत्।¹ तीर्थावाहनमन्त्रैश्च तीर्थान्यावाह्य पूजयेत्।।३।। गन्धपुष्पाक्षतैर्धूपैर्दीपाद्यैरति भक्तितः। शङ्खे पाणितलं दत्त्वा जपेन्मन्त्रं षडक्षरम्।।४।। आधार शंख के जल में उन उन मण्डलों की पूजा करें। तीर्थावाहन मन्त्रों से तीर्थों का आवाहन कर गन्ध, पुष्प, अक्षत, धूप, दीप आदि से अत्यन्त भक्तिपूर्वक पूजा करें। इसके बाद शंख के ऊपर तलहथी रखकर षडक्षर मन्त्र का जप करें। चिन्मयं चिन्तयेत्तीर्थमानीयाङ्कुशमुद्रया। ब्रह्माण्डोदरतीर्थाभ्यां धेनुमुद्रां प्रदर्श्य च।।५।। शङ्खमुद्रां चक्रमुद्रां गरुडाख्याञ्च दर्शयेत्। ब्रह्माण्ड के उदर से तथा पवित्र तीर्थों से अंकुश मुद्रा के द्वारा तीर्थों का धेनु-मुद्रा दिखाकर शंखमुद्रा, चक्रमुद्रा और गरुडमुद्रा दिखावें। परमीकृत्य यत्नेन पावनं² तद्विचिन्तयेत्।।६।। देवस्य मूर्ध्नि तत्सिञ्चेत् पूजाद्रव्येषु चात्मनः। . इस प्रकार यत्न पूर्वक अमृतीकरण कर उस शंख जल को परम पवित्र मानें और उसे देवता के मस्तक पर, पूजा सामग्रियों पर तथा अपने ऊपर छिड़कें। अवेक्षणं प्रोक्षणञ्च वीक्षणं ताडनं तथा।।७।। अर्चनं चैव सर्वेषां पावनत्वं प्रकल्पयेत्। पूतमेवाखिलं पूजायोग्यं भवति सार्थकम्।।८।। उस शंखजल के दर्शन की क्रिया में प्रोक्षणमुद्रा दिखाकर तथा पुनः दर्शन में ताड़न मुद्रा दिखावें किन्तु दोनों क्रियाओं में अर्चन मुद्रा दिखाकर उसकी पवित्रता की कल्पना करें।

  1. क. तत्तदात्मानमर्चयेत्। 2. घ. परमं