अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)
Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary
महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंत्रयोदशोऽध्यायः (77) शिरोभूमध्यहृदयनाभिगुह्यपदस्थले ।।60।। मूलमन्त्राक्षरैर्न्यासं षडङ्गमपि विन्यसेत्। इसके अतिरिक्त मूलमन्त्र के अक्षरों से शिर, भ्रूमध्य, हृदय, नाभि, गुदा एवं दोनों पैरों में षडङ्गन्यास भी करें। जैसे- ॐ नमः पराय इति शिरसि। रा नमः पराय भ्रूमध्ये मा नमः पराय हृदये य नमः पराय नाभौ न नमः पराय गुदायाम्। मः नमः पराय पादयोः। एवं विन्यस्य विधिवत् साक्षान्नारायणो भवेत् ।।61।। जरारोगाभिचाराद्याः¹ प्रलयं यान्ति नान्यथा। भूतप्रेतपिशाचाश्च तथैव ब्रह्मराक्षसाः ।।62।। कूष्माण्डाश्चैव डाकिन्यो नैव द्रष्टुमपि क्षमाः। य एवं विन्यसेद्धीमान् रामः साक्षात् स्वयं भवेत् ।।63।। ²नातः परतरं किञ्चित् पावनं पुण्यमस्ति हि। इस प्रकार का न्यास कर वह साधक प्रत्यक्ष नारायणस्वरूप हो जाता है। बुढ़ापा, रोग, दूसरे के द्वारा किये गये अभिचार आदि नष्ट हो जाते हैं। भूत, प्रेत, पिशाच, ब्रह्मराक्षस, कूष्माण्ड, डाकिनी आदि तो उसे देखने में भी समर्थ नहीं होते हैं। जो बुद्धिमान् इस प्रकार न्यास करते हैं, वे साक्षात् श्रीराम-स्वरूप हो जाते हैं। इससे अधिक पवित्र पुण्य कुछ भी नहीं है। इत्यगस्त्यसंहितायां परमरहस्ये शरीरन्यासे द्वादशोऽध्यायः। अथ त्रयोदशोऽध्यायः अगस्त्य उवाच सुतीक्ष्ण पात्राण्यासाद्य ततः पूजार्थमादरात्। शङ्खमन्त्रेण संशोध्य सदाधारे निधाय च।।1।।
- घ. ज्वररोगाभिचाराद्याः। 2. क. में अनुपलब्ध।