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अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary

महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा

DevanagariSanskritpublished337 पृष्ठ

(78) अगस्त्य-संहिता पूजयेदग्निसूर्येन्दुबीजैस्तत्तत्कलान्वितैः । तत्तत्कलानां संख्या च दश द्वादश षोडश।।२।। अगस्त्य बोले- हे सुतीक्ष्ण पूजा-पात्रों को एकत्रित कर पूजा के लिए आदर पूर्वक शंख को अस्त्र-मन्त्र से शोधित कर उसे सुन्दर आधार पर रखकर कलाओं के साथ अग्निबीज (रं) सूर्यबीज (सं) एवं चन्द्रबीज (सं) से पूजा करें। उनकी कलाएँ क्रमशः दस, बारह एवं सोलह हैं। आधारशङ्खतीर्थेषु तत्तन्मण्डलमर्चयेत्।¹ तीर्थावाहनमन्त्रैश्च तीर्थान्यावाह्य पूजयेत्।।३।। गन्धपुष्पाक्षतैर्धूपैर्दीपाद्यैरति भक्तितः। शङ्खे पाणितलं दत्त्वा जपेन्मन्त्रं षडक्षरम्।।४।। आधार शंख के जल में उन उन मण्डलों की पूजा करें। तीर्थावाहन मन्त्रों से तीर्थों का आवाहन कर गन्ध, पुष्प, अक्षत, धूप, दीप आदि से अत्यन्त भक्तिपूर्वक पूजा करें। इसके बाद शंख के ऊपर तलहथी रखकर षडक्षर मन्त्र का जप करें। चिन्मयं चिन्तयेत्तीर्थमानीयाङ्कुशमुद्रया। ब्रह्माण्डोदरतीर्थाभ्यां धेनुमुद्रां प्रदर्श्य च।।५।। शङ्खमुद्रां चक्रमुद्रां गरुडाख्याञ्च दर्शयेत्। ब्रह्माण्ड के उदर से तथा पवित्र तीर्थों से अंकुश मुद्रा के द्वारा तीर्थों का धेनु-मुद्रा दिखाकर शंखमुद्रा, चक्रमुद्रा और गरुडमुद्रा दिखावें। परमीकृत्य यत्नेन पावनं² तद्विचिन्तयेत्।।६।। देवस्य मूर्ध्नि तत्सिञ्चेत् पूजाद्रव्येषु चात्मनः। . इस प्रकार यत्न पूर्वक अमृतीकरण कर उस शंख जल को परम पवित्र मानें और उसे देवता के मस्तक पर, पूजा सामग्रियों पर तथा अपने ऊपर छिड़कें। अवेक्षणं प्रोक्षणञ्च वीक्षणं ताडनं तथा।।७।। अर्चनं चैव सर्वेषां पावनत्वं प्रकल्पयेत्। पूतमेवाखिलं पूजायोग्यं भवति सार्थकम्।।८।। उस शंखजल के दर्शन की क्रिया में प्रोक्षणमुद्रा दिखाकर तथा पुनः दर्शन में ताड़न मुद्रा दिखावें किन्तु दोनों क्रियाओं में अर्चन मुद्रा दिखाकर उसकी पवित्रता की कल्पना करें।

  1. क. तत्तदात्मानमर्चयेत्। 2. घ. परमं

त्रयोदशोऽध्यायः (79) अर्घ्यपाद्यप्रदानार्थं • मधुपर्कार्थमप्यथ। तथैवाचमनार्थञ्च न्यसेत् पात्रचतुष्टयम्।।9।। आत्मनः पुरतः शङ्खं पूर्वतः साधयेत्ततः। अर्घ्यपात्रे पाद्यपात्रे सम्पूर्य^1 सलिलं शुभम्।।10।। तथार्घ्यपात्रे दातव्याः गन्धपुष्पयवाक्षताः। कुशाग्रतिलदूर्वाश्च सर्षपाश्चार्थसिद्धये।।11।। अर्घ्य, पाद्य, मधुपर्क एवं आचमन समर्पण के लिए चार पात्र स्थापित करें। अपने सामने में शंख को पूर्व दिशा से रखें। अर्घ्यपात्र और पाद्यपात्र में पवित्र जल भरकर अर्घ्य पात्र में चन्दन, पुष्प, यव, अक्षत, कुश का अगला भाग, तिल, दूर्वा और सरसो कामनाओं की पूर्ति के लिए डालें। पाद्यपात्रे प्रदातव्यं श्यामाकं दूर्वमेव च। अब्जं च विष्णुक्रान्तां च पाद्यसिद्धयै प्रयोजयेत्।।12।। पाद्यपात्र में साँवा, दूर्वा, कमल एवं अपराजिता ये पाद्य के प्रयोजन के लिए डालें। तथाचमनपात्रेऽपि दद्याज्जातीफलं मुने। लवङ्गमपि कङ्कोलं शस्तमाचमनीयकम्।।13।। दध्ना च मधुसर्पिभ्यां मधुपर्को भविष्यति। आचमनपात्र में जायफल, लौंग, कंकोल डालें जो आचमन के लिए प्रशस्त हैं। दही, मधु और घृत मिलकर मधुपर्क बनता है। स्नानं पुरुषसूक्तेन शुद्धशङ्खोदकेन च।।14।। क्षीरदध्याज्यमधुभिः खण्डेन च पृथक् पृथक्। नारिकेरोदकेनापि तथान्यञ्च फलाम्बुना।^2।।15।। शुद्ध शंख जल से, दूध, दही, घी, मधु और शर्करा से पृथक् पुरुषसूक्त से स्नान कराना चाहिए। अथवा नारियल के जल से तथा अन्य फलों के रस से। ^3क्षीरस्नानं प्रकुर्वन्ति ये नराः राममूर्द्धनि। शताश्वमेधजं पुण्यं बिन्दुना बिन्दुना शतम्।।16।।

  1. घ. संपूज्य। 2. घ. तथा तालफलाम्बुभिः। 3. यहाँ से श्लोक सं. 16 एवं 17 'घ' में अनुपलब्ध।

(80) अगस्त्य-संहिता

क्षीरं दशगुणं दध्ना घृतञ्चैव दशोत्तरम्। घृताद् दशगुणं क्षौद्रं क्षौद्राद्दशगुणोत्तरम् ।।17 ।। जो मनुष्य श्रीराम की मूर्द्धा पर दूध से अभिषेक करते हैं, वे प्रत्येक बूँद से सौ सौ अश्वमेध यज्ञ के फल को प्राप्त करते हैं। दही से अभिषेक की अपेक्षा दुग्धाभिषेक दश गुणा फलदायी है तथा घृताभिषेक सौ गुणा। घृताभिषेक का दशगुणा मधु-अभिषेक का फल है। गन्धद्रव्यैश्च बहुभिस्तथा गन्धोदकेन च। ऐक्षवेणोदकेनापि कर्पूरादिसुगन्धिना ।।18 ।। कदलीपनसाम्रोत्थजलेनापि सुगन्धिना। शतं सहस्रमयुतं भक्त्या¹ चाप्यभिषेचयेत् ।।19 ।। चन्दन आदि सुगन्धित पदार्थों से चन्दन मिश्रित जल से अभिषेक करना चाहिए। ईख का रस, कर्पूर आदि सुगन्धित पदार्थ से अथवा केला, कटहल, आम आदि के सुगन्धित रस से सौ बार, हजार बार और दस हजार बार भक्तिपूर्वक अभिषेक करना चाहिए। शङ्खं सम्पूर्य तेनैव सपुष्पेण रघूत्तमम्। सकृष्णागुरुधूपेन धूपयेदन्तरात्मना ।।20 ।। ततः शुद्धजलेनैव स्नापयेत् तमनन्यधीः। राज्यार्थी राज्यसिद्ध्यर्थमैवं वत्सरमादरात् ।।21 ।। एवमेवाभिषिञ्चेत राजा भवति नान्यथा। शंख को उन रसों से भरकर उसमें फूल डालकर अभिषेक करें। गुग्गुल का धूप बीच बीच में हृदय से अर्पित करे। तब शुद्ध जल से राज्य की कामना से एकाग्र होकर स्नान कराएँ। इस प्रकार, राज्यसिद्धि के लिए आदरपूर्वक एक वर्ष तक अभिषेक करे, तो वह राजा होता है, इसमें सन्देह नहीं। दत्वाप्याचमनीयं च वाससी परिधापयेत् ।।22 ।। ततो भूषणदानञ्च सोत्तरीयेण वाससा। यज्ञोपवीतं दत्वा च दद्याच्चन्दनमादरात् ।।23 ।। इसके बाद आचमन समर्पित कर जोड़ा वस्त्र पहनावें। तब आभूषण आदि देकर दुपट्टा के साथ वस्त्र चढ़ावें। फिर यज्ञोपवीत देकर आदरपूर्वक चन्दन दें।

  1. घ. शक्त्या।

त्रयोदशोऽध्यायः (81) पुष्पाणि पुष्पमाल्यानि विविधानि समर्पयेत्। धूपं दीपञ्च नैवद्यं ताम्बूलं च प्रदक्षिणम्।।24।। नमस्कारञ्च पूजायामुपचास्तु षोडश। अनेक प्रकार के पुष्प और पुष्पमालाएँ समर्पित करें। तब धूप, दीप, नैवेद्य देकर प्रदक्षिणा (चार बार परिक्रमा) करें। पूजा के क्रम में अन्त में प्रणाम करें; ये षोडश उपचार हैं। आवाहनादिकाश्चैव तथैकादश पञ्चधा।।25।। भवन्त्येवोपचारास्तैः पूजां कुर्यादहर्निशम्। आवाहन आदि एकादशोपचार और पञ्चोपचार भी होते हैं। इनसे भी दिन रात पूजा करें। स्नानाद्यैरपि गन्धाद्यैः भक्त्योपकल्पितैः।।26।। द्वारपीठामरानादौ अभ्यर्च्यैव पुनस्ततः। राममाराध्य विधिना सर्वैरप्युपचारकैः।।27।। अङ्गावरणदेवाश्च सम्पूज्यान्यायुधानि च। स्नान आदि से तथा चन्दन आदि से सामर्थ्यानुसार भक्तिपूर्वक द्वार और पीठ के देवताओं की पूजा करके ही विधिपूर्वक सभी उपचारों से श्रीराम की पूजा कर अंग देवताओं तथा आवरण की पूजा कर, श्रीराम के सभी शस्त्रास्त्रों की पूजा करें। एवं सम्यक् समाराध्य साङ्गावरणवाहनम्।।28।। स्तोतव्यमपि यत्नेन रामं शश्वत्प्रणम्य च। यन्त्रस्था अपि मन्त्रैश्च सम्यक् पूज्या प्रयत्नतः।।29।। इस प्रकार प्रतिदिन अंगदेवताओं, आवरण देवताओं तथा वाहनों के साथ श्रीराम की पूजा कर बार बार प्रणाम कर श्रीराम की स्तुति करें तथा यन्त्र पर अवस्थित देवताओं की पूजा मन्त्रों से अच्छी तरह करें। एवमेव यजेदग्नौ होमादावपि राघवम्। तर्पणादावपि¹ जलेष्येवमाराध्य तर्पयेत्।।30।। इसी प्रकार होम आदि में भी पहले श्रीराम की पूजा अग्नि में करें। तर्पण आदि के क्रम में भी जल में इसी प्रकार पूजा कर तर्पण करें।

  1. घ. दर्पणादा

(82) अगस्त्य-संहिता ────────────────────────────────────────── शालग्रामशिलायां च तुलसीदलकल्पिता। पूजा श्रीरामचन्द्रस्य कोटिकोटिगुणाधिका।।31।। प्रतिमायां च यन्त्रे वा भूमावग्नौ विवस्वति। तले वा हृदये वापि विधायाराधयेद्¹ रहः।।32।। शालग्राम की शिला पर तुलसीदास से श्रीराम की पूजा करोड़ो करोड़ गुणा फल देती है। प्रतिमा पर अथवा यन्त्र पर, भूमि पर अथवा अग्नि में, सूर्य में, हाथ की तलहथी पर अथवा अपने हृदय में श्री राम की पूजा एकान्त में करें। कालेनैवोपचाराणां² पूजयेत्तुलसीदलैः। घण्टां च वादयेद् दद्याद् देवायाचमनीयकम्।।33।। मध्ये मध्ये च तद्वच्च नत्वा नत्वा समर्पयेत्। समयानुसार सभी उपचारों के स्थान में तुलसीदल डालें; घंटा बजावें तथा देवता को आचमनीय समर्पित करें। बीच बीच में उन अर्घ्य वस्तु को नमन कर समर्पित करें। मुकुलैः पतितैश्चैव खण्डितैः शोषितैरपि।।34।। अनर्हैरपि पुष्पैश्च दलैः पत्रैंश्च नार्चयेत्।³। मुरझाए हुए, गिरे हुए, टूटे हुए, सूखे हुए तथा पूजा के अयोग्य पुष्प, पत्र और दल से पूजा न करें। येन केनापि पुष्पेण पत्रेणापि फलेन वा।।35।। यतः कुतश्चिदानीय यत्रकुत्रोद्भवेन च। भवार्थं जीवितार्थं च नोऽर्चयेद् गर्हितस्थले।।36।। जिस किसी भी फूल, पत्र एवं फल से जो इधर उधर जन्में हों और इधर उधर से अर्थात् अपवित्र स्थान से लाये गये हों, उनसे अशुभ स्थान में सांसारिक सुख और जीवन के लिए पूजा नहीं करनी चाहिए। गंगायां गोप्रदानेन दिव्यवर्षशतत्रयम्। तत्फलं प्राप्यते नित्यमाराध्याप्नोति तद्धरिम्।।37।। गंगा के तट पर गोदान करने से जो तीन सौ दिव्य वर्ष तक स्वर्गवास का फल मिलता है वही फल उसे भी मिलता है जो प्रतिदिन श्री हरि की पूजा करें। ──────────────────────────────────────────

  1. घ. विधायावाहयेद्रहः। 2. घ. अभावे चोपचाराणां। 3. घ. पत्रैर्न पूजयेत् Rarest Archiver

चतुर्दशोऽध्यायः (83) — — — — — — — — — — — — — — — — — पत्रं पुष्पं फलं वापि रामाराधनसाधनम्। दद्यादाराधितं यो वै तस्य पुण्यफलं शृणु।।38।। कुरुक्षेत्रे च गङ्गायां प्रयागे पुरुषोत्तमे। गोसहस्रप्रदानेन यत्पुण्यं समवाप्यते।।39।। तदेतदखिलं पुण्यं प्राप्नोत्येव न संशयः। समग्रमसमग्रं वा यो दद्यात् पूजितं हरिम्।।40।। कदाचिदपि नित्यं वा पत्रपुष्पादिकं बहून्। किं तीर्थसेवया दानैरन्यैर्बहुभिरीरितैः।।41।। आराधनासमर्थश्चेद् दद्यादर्चनसाधनम्। श्रीराम की आराधना के साधन पत्र, पुष्प, फल आदि जो दान करते हैं उनके पुण्य का फल सुनें। कुरुक्षेत्र, गंगा के तट, प्रयाग क्षेत्र और पुरुषोत्तम क्षेत्र में हजारों गाय दान करने का फल जो मिलता है, वही समग्र फल वह भी प्राप्त करता है, वही समग्र फल वह भी प्राप्त करता है। पूजा की सभी वस्तुएँ अथवा कुछ वस्तुएँ जो प्रतिदिन अथवा कभी कभी अथवा अधिक मात्रा में पत्र-पुष्प आदि जो दान करते हैं, उनके लिए अन्य स्थलों पर विहित दान और तीर्थ में निवास करना सब व्यर्थ है। स्वयं आराधना करने में जो असमर्थ हों वे आराधना के साधनों का दान करें। ¹प्रदातुं वै नरान् कोऽस्ति कुर्यादर्चनदर्शनम्।।42।। निस्ताराय तदेवालं भवाब्धेः मुनिसत्तम। नैकं च यस्य विद्येत सोऽधो यात्येव नान्यथा।।43।। अथवा मनुष्य को दान करने में भी भला कौन समर्थ है! इसलिए आराधना का दर्शन ही करना चाहिए। संसार के समुद्र में पार लगाने के लिए वही पर्याप्त है। इनमें से जो एक भी नहीं करते उनका अधःपतन निश्चित है। नियमव्यतिरेकेण यः कुर्याद् देवतार्चनम्। किञ्चिदप्यस्य न फलं भस्मनीव हुतं मुने।।44।। योऽर्चयेद् विधिवद् भक्त्या परानीतैश्च साधनैः। पूजा फलार्द्धमेवास्य न समग्रफलं लभेत्।।45।।

  1. घ. में अनुपलब्ध।

(84) ________ अगस्त्य-संहिता नियमों के विपरीत जो देवता की अर्चना करते हैं, उन्हें राख में हवन करने के समान कुछ भी फल नहीं होता है। जो विधानों के अनुसार भक्तिपूर्वक दूसरे के द्वारा लाये गये साधनों से पूजा करते हैं उन्हें आधा फल ही मिलता है; पूरा नहीं। ¹यस्तु भक्त्या प्रयत्नेन स्वयं सम्पाद्य चाखिलम्। साधनं चार्चयेद् विद्वान् समग्रफलभाग् भवेत्।।146।। यो धनव्ययमायासमविचार्यार्चयेद् हरिम्। स्वयं सम्पाद्य तत्सर्वं सवरं तत्फलं लभेत्।²147।। जो भक्तिपूर्वक स्वयं यत्न करके सभी सामग्रियों की व्यवस्था कर अर्चन करते हैं, उन्हें समग्र फल की प्राप्ति होती है। जो धन का व्यय और प्रयत्न दोनों की परवाह किए बिना श्रीहरि की आराधना स्वयं साधन जुटाकर करते हैं तथा उन्हें नैवेद्य आदि अर्पित करते हैं, वे वर के साथ सम्पूर्ण फल पाते हैं। स्वयमानीय चोत्पाद्य पूजोपकरणानि यः। पूजयेत्तद्विधेयं स्यादुत्तमं प्रार्थदं हरिम्।³148।। स्वयं लाकर और स्वयं उगाकर पूजा सामग्रियों से श्रीहरि की पूजा करते हैं वह उत्तम विधि है इससे अच्छी प्रकार प्रयोजनों की सिद्धि होती है। कलत्रपुत्रशिष्यादि⁴ तत्तत् सम्पादितं च यत्। मध्यमं चार्चनं तेन तैः सार्द्धं तत्फलं लभेत्।।149।। पत्नी, पुत्र, शिष्य आदि के द्वारा व्यवस्था किए जाने पर मध्यम प्रकार की पूजा होती है उससे आधा फल मिलता है। अन्यैः सम्पाद्य यद्दत्तं क्रयक्रीतेन तेन वा। गौणमाराधितं तेन पादमात्रफलं लभेत्।।150।। दूसरे के द्वारा व्यवस्था कर दान की गयी सामग्रियों से अथवा खरीदकर की गयी पूजा तुच्छ होती है इससे चौथाई फल ही मिलता है। परारोपितवृक्षेभ्यः पुष्पाणानीय वार्चयेत्। अविज्ञाप्यैव तैर्यस्तु निष्फलं तस्य पूजनम्।।151।। दूसरे के द्वारा लगाये गये वृक्ष से बिना सूचना दिये हुए फूल लाकर जो पूजा करते हैं वह निष्फल होती है।

  1. चार चरण तक 'क' में अनुपलब्ध। 2. घ. सर्वं तत् सफलं भवेत्। 3. घ. मुनिसत्तम। 4. घ. नियोज्य यत्र शिष्यादि।

_________________ चतुर्दशोऽध्यायः (85) राममाराध्य संस्थाप्य संनिरुध्य च मुद्रया।¹ प्रतिष्ठाप्यार्चयेद् विष्णुं न च तन्निष्फलं भवेत् ।।52।। मुद्रा के द्वारा श्रीराम का आराधना स्थापन एवं संनिरोधन कर प्रतिष्ठित कर विष्णु की पूजा करते हैं तो वह निष्फल नहीं होता। ततो² मुद्रान्तराण्यैव दर्शयिच्चैव सादरम्। प्रसाद्य सम्मुखीकृत्य सन्निधाप्य च पूजयेत् ।।53।। सकलीकृत्य प्राणांस्तु तदानीमिन्द्रियाण्यपि। यद्येवं पूजयेद्रामं भुक्तिं मुक्तिं च विन्दति ।।54।। इसके बाद आदरपूर्वक दूसरी मुद्राएँ भी दिखावें। प्रसादजी, सम्मुखीकरणी और सन्निधापनी मुद्रा दिखाकर पूजा करें। उनके प्राण को सकलीकरण कर उनकी इन्द्रियों का भी सकलीकरण करें। यदि इस प्रकार श्रीराम की पूजा करें तो भुक्ति और मुक्ति दोनों प्राप्त करते हैं। इत्यगस्त्यसंहितायां परमरहस्ये रामपूजाविधिर्नाम त्रयोदशोऽध्यायः ।। अथ चतुर्दशोऽध्यायः अगस्त्य उवाच विधिवत् संस्कृतेप्यग्नौ देवमावाह्य पूजयेत्। पूर्वोक्तेनैव विधिना साङ्गावरणवाहनम्³ ।।1।। विधानपूर्वक मार्जन, उल्लेखन आदि से संस्कार की गयी अग्नि में देवती का आवाहन कर पूर्वोक्त विधि से अंग और आवरण के साथ पूजन करें। विधिं तस्य प्रवक्ष्यामि येनेष्टं साध्यतेऽखिलम्। विहितं येऽनुतिष्ठन्ति त एव फलभाजनाः ।।2।। अब इसकी विधि कहूँगा, जिससे सब कुछ सिद्ध होता है। जो विधानपूर्वक अनुष्ठान करते हैं, वे ही सभी इच्छित फलों के भागी होते हैं, अन्यथा नहीं।

  1. घ. इसके बाद घ. में प्रसाद्य सम्मुखीकृत्य इत्यादि चार चरण हैं।। 2. घ. तत्तन्मुद्रा°। 3. घ. साङ्गावरणमन्वहम्। Rarest Archiver

(86) अगस्त्य-संहिता

सर्वेषामीप्सितार्थानामन्यथा वै तथा नहि। न्यायार्जितैः साधनैश्च दानहोमार्चनादिकम् ।।३।। कुर्यान्न चेदधो याति भक्त्या कुर्वन्नपि द्विजः। न्यायपूर्वक स्वयं अर्जित साधनों से दान, होम, अर्चना आदि करें, नहीं तो भक्तिपूर्वक इन्हें करते हुए भी अधोगति प्राप्त करते हैं। भूमिस्थानं समीकृत्य षट्चतुष्काङ्गुलोत्तरम्¹ ।।४।। तावत् तन्निखनेदन्तश्चतुष्कोणन्तथान्ततः। दिशि दिश्यन्तरञ्चैव पार्श्वस्थलचतुष्टयम् ।।५।। भूमि को समतल कर दश अंगुल ऊँची वेदिका बनाएँ। तब अन्दर की ओर चौकोर खनें। तब चारो दिशाओं और कोणों में भी चार पार्श्व बनावें। (इस प्रकार नीचे अष्टकोण बन जाएगा।) एवं सलक्षणं² कृत्वा बहिः कुर्याच्च मेखलाः। द्वादशाष्टचतुर्मानां स्वाङ्गुलैश्च क्रमान्मुने।।६।। एवमुत्सेध आयामश्चतुराङ्गुलमेव तत्। आयामोत्सेधरूपेण चतुष्काधिक्यतः क्रमात् ।।७।। चतुष्कत्रितयं कुर्यादेवं हि मेखलाक्रमः। इस प्रकार के लक्षणों से कुण्ड बनाकर तब बाहर तीन मेखला क्रमशः बारह अंगुल आठ अंगुल और चार अंगुल मान से बनावें। इस प्रकार उठाकर विस्तार चार अंगुल ही रखें। चौड़ाई और ऊँचाई दोनों क्रमशः चार-चार अंगुल क्रमशः होगी। चार अंगुल की तीन मेखला बनावें; यही क्रम है। कुण्डस्य पश्चिमे भागे योनिं कुर्यात्सलक्षणाम् ।।८।। अश्वत्थपत्रसदृशीं कुण्डे किञ्चित् प्रतिष्ठिताम्। षट्चतुर्द्वयङ्गुलाक्षा³ च क्रमान्निम्ना भवेत्पुनः।।९।। विस्तारेणापि सा योनिर्भवत्येव दशांगुला।⁴ मूलं नालं तथाग्रं च व्युत्क्रमात् षट्चतुस्त्रिकम् ।।१०।। तन्मानाङ्गुलमानं स्यादेतत् कुण्डस्य लक्षणम्। एकहस्तस्य कुण्डस्य⁵ प्रकारोऽयं प्रकाशितः ।।११।।

  1. घ. षट्चतुर्द्ध्वङ्गुलोत्तरम्। 2. घ. सुलक्षणम्। 3. घ. षट्चतुस्त्र्यङ्गुला सापि। 4. योनिर्भवेत् पञ्चदशाङ्गुला। 5. घ. चतुष्कोणैकहस्तस्य।

चतुर्दशोऽध्यायः (87) कुण्ड के पश्चिम भाग में लक्षण के अनुसार योनि बनावें। पीपल के पत्ते के आकार की योनि कुण्ड पर प्रतिष्ठित करनी चाहिए। छह अंगुल के बाद चार अंगुल, तब दो अंगुल, इस प्रकार क्रमशः योनि आगे की ओर ढालवाली होनी चाहिए। चौड़ाई और दस अंगुल लम्बाई की योनि होती है। योनिमूल में अवस्थित गाल और योनि के अग्रभाग की ऊँचाई नीचे के क्रम में छह अंगुल, चार अंगुल तथा तीन अंगुल की होनी चाहिए। यह कुण्ड का लक्षण है। यह एक हाथ लंबाई- चौड़ाईवाले कुण्ड का प्रकार स्पष्ट किया गया है। द्विहस्तकुण्डमध्येवं द्विगुणीकृत्य मेखलाम्। नाभेरप्यथवा कुण्डमेकमेखलकं भवेत् ।।12।। संक्षेपकर्मसु तथा वर्त्तुलं स्यात् सुलक्षणम्। इसी प्रकार दो हाथ के कुण्ड में मेखला तथा नाभि दो गुनी होगी। अथवा संक्षिप्त कर्म में एक मेखलावाला कुण्ड हो सकता है तथा सभी लक्षणों से सम्पन्न वर्त्तुल कुण्ड का भी निर्माण किया जा सकता है। चतुष्कोणैकहस्तस्य मध्ये कुण्डस्य चाङ्कनम् ।।13।। मध्यान्निधाय सूत्रेण भ्रामयेदभितो मुने। कोणेषु यच्चाप्यधिकं तद्दिक्ष्वेव विनिर्दिशेत् ।।14।। इदञ्च वर्त्तुलं कुण्डं ततः स्यादर्धचन्द्रकम् । दिशि चोत्तरतः कुण्डकोणभागादर्द्धभागतः ।।15।। बहिरैन्द्र्या च वारुण्या यत्नान्मध्ये तु लांछयेत्। संस्थाप्य भ्रामयेदेतदर्द्धचन्द्रं शुभ्रप्रदम् ¹ ।।16।। एक हाथ के चौकोर भूमि के मध्य में कुण्ड का अंकन करना चाहिए। मध्यभाग से एक धागा लेकर उसे चारो ओर घुमावें। कोणों में और दिशाओं में चिह्न लगावें। यह वर्त्तुल कुण्ड कहलाता है। इसके बाद अर्द्धचन्द्र कुण्ड भी होता है। कुण्ड में उत्तर की ओर से कोण के आधे भाग पर पुनः पूर्व दिशा से पश्चिम दिशा तक सूत्र रखकर मध्य में स्थापित कर घुमावें। यह अर्द्धचन्द्राकार कुण्ड शुभ फल देता है। (महामहोपाध्याय मधुसूदन ओझा ने 'यज्ञमधुसूदन' नामक ग्रन्थ में वर्त्तुल कुण्ड बनाने की तीन विधियाँ दी हैं, जिनमें एक विधि के अनुसार चौकोर क्षेत्र में

  1. घ. सुशोभनम् ।

(88) अगस्त्य-संहिता एक कोण से दूसरे कोण तक की दूरी का आधा कोणार्द्ध कहलाता है। उस कोणार्द्ध का आठवाँ भाग के बराबर की दूरी पर चतुष्कोण में चिह्न लगा लेना चाहिए। तब उन चिह्नों से होकर एक वृत्त बनाना चाहिए। यह वर्तुल कुण्ड कहलाता है। अगस्त्य-संहिता का भी यहीं मत प्रतीत होता है, किन्तु इस स्थल पर पाण्डुलिपि ‘क’ अपठनीय है।) मेखलास्वष्टपत्राणि वर्तुलस्य तपोनिधे। पद्माकारं भवेदेतत् कुण्डं सर्वफलप्रदम्।¹।17।। वर्तुल कुण्ड की मेखलाओं में आठ दल होंगे। इस प्रकार वह कुण्ड कमल के आकार का होगा, जो सभी प्रकार से फलदायक है। शतहोमे रत्निमात्रं तदूर्ध्वं मुष्टिसम्मितम्। सहस्रेप्ययुतेऽप्यर्द्धलक्षे लक्षेऽपि च क्रमात्।।18।। पञ्चपञ्चाङ्गुलाधिक्याद् वर्द्धतेऽरत्निमात्रतः। कुण्डञ्च कोटिहोमेऽपि तदूर्द्धर्वेऽपि कराष्टकम्।।19।। सौ आहुति वाले होम में मुट्ठी बँधे हाथ की लम्बाई के बराबर, इसके ऊपर मुट्ठी खुले हाथ की लम्बाई के बराबर कुण्ड बनावें। हजार, दश हजार और उससे ऊपर लाखों आहुति के लिए क्रमशः मुट्ठी बँधे हाथ की लम्बाई से पाँच पाँच अंगुल क्रमशः बढ़ाते हुए एक हाथ तक बढ़ावें इस प्रकार कोटि होम तक के लिए कुण्ड बनावें। उसके ऊपर आहुति संख्या होने पर आठ हाथ की लंबाई-चौड़ाई वाला कुण्ड बनावें। मुष्ट्यरत्निमिते कुण्डे दशाद्वादशसंख्यया। क्रमेणैवाङ्गुलानां च प्रथमा मेखला भवेत्।।20।। मुट्ठी खोलकर एक हाथ की लम्बाई वाले कुण्ड में बारह अंगुल तथा बन्द मुट्ठी वाले हाथ की लम्बाई के परिमाण के कुण्ड में बारह अंगुल की पहली मेखला होती है। द्वितीये च तृतीये च त्र्यंशे त्र्यंशे विनिर्दिशेत्। सर्वेषामेव कुण्डानामह्लिद्वयवृद्धितः।।21।। प्रथमा मेखला कार्या त्र्यंशेऽप्यन्या तु पूर्ववत्। कण्ठोऽष्टयवमात्रः स्यात् कुण्डे च करमात्रके।।22।। कुण्डे षड्यवमात्रः स्यात् कण्ठो रत्निप्रमाणके। तथा चतुर्यवैः कण्ठो मुष्टिमात्रे विनिर्दिशेत्।।23।।

  1. घ. में अनुपलब्ध। Rarest Archiver

चतुर्दशोऽध्यायः (89) दूसरी और तीसरी मेखला भी एक तिहाई भाग में होनी चाहिए। सभी प्रकार के कुण्डों में दो-दो अंगुलियाँ बढ़ाकर मेखला बनानी चाहिए। पहली मेखला एक तिहाई भाग में बनावें और अन्य मेखलाएँ पूर्ववत् परिमाण में बनाएँ। एक हाथवाले कुण्ड में कण्ठ का भाग (योनि का अग्रभाग, जो कुण्ड में निराधार स्थापित किया जाये) आठ यव के परिमाण का होगा तथा रत्निप्रमाण (मुट्ठी बँधा हाथ) के कुण्ड में कण्ठ छह यव के परिमाण का होगा तथा मुट्ठी वाले भाग से रहित एक हाथ के प्रमाण वाले कुण्ड में चार यव के परिमाण का कण्ठ बनावें। सर्वेषु कुण्डमानेषु चाङ्गुलिद्वयवृद्धितः। कुण्डो यत्नेन कर्तव्यो भुक्तिमुक्तिफलेप्सुभिः ।।२४।। भोग और मोक्ष की इच्छा रखनेवाले सभी प्रकार के कुण्डों में दो-दो अंगुल बढ़ाकर यत्नपूर्वक कुण्ड का निर्माण करें। सात्त्विकी राजसी चैव तामसी च क्रमाद् भवेत्। प्रथमा च द्वितीया च तृतीया मेखला स्मृता ।।२५।। कुण्ड तीन प्रकार के होते हैं- सात्विकी, राजसी एवं तामसी तथा मेखला भी प्रथमा, द्वितीया एवं तृतीया के नाम से तीन होतीं हैं। योनिः कुण्डानुसारेण कुर्यादाद्यन्तमध्यतः। उक्ताङ्गुलिप्रमाणेण द्विगुणाञ्च चतुर्गुणाम् ।।२६।। होमसंख्यानुविधिना सर्वलक्षणलक्षितम् । स्रुवं बाहुप्रमाणेण होमार्थं विदधीत वै ।।२७।। कुण्ड के परिमाण के अनुसार कुण्ड की योनि आरम्भ, अन्त और मध्य भाग का निर्माण पूर्वोक्त अंगुल के प्रमाण से दो दुना या चारगुना करें। होम- संख्या के अनुसार सभी लक्षणों से सम्पन्न मेखलाओं का निर्माण करें। होम के लिए एक हाथ का स्रुव बनावें। चतुरस्रं विधायादौ सप्तपञ्चाङ्गुलं क्रमात्। तृतीयांशेन गर्तः स्यादन्तर्वृत्तशोभितम् ।।२८।। खनित्वा समं तिर्यगूर्ध्वंवतदधः शोधयेद् बहिः। चतुर्थाशं चाङ्गुलस्य शेषं त्वर्द्धं¹ तदन्ततः ।।२९।।

  1. घ. शेषाच्चार्द्धम्।

(90) अगस्त्य-संहिता कुण्ड निर्माण के लिए सबसे पहले समतल भूमि पर बारह अंगुल पर्यन्त चौकोर गड्ढा बनावें। इसके बाद एक तिहाई भाग वृत्ताकार बनावें। इसके बाद टेढ़ा कर ऊपर की ओर खनें। इस क्रम में पहले एक अंगुल के चौथाई भाग तक खनें तथा अन्त तक आधा अंगुल टेढ़ा खनें। रम्यां च मेखलां खाते शिष्टेनार्द्धेन कारयेत्। कुर्यात् त्रिभागविस्तारां चाङ्गुष्ठेन समायुताम्।।30।। सार्द्धमङ्गुष्ठकं चास्य तदग्रे तु मुखं भवेत्। चतुरङ्गुलविस्तारं पञ्चाङ्गुलमथापि वा।।31।। द्वित्रयाङ्गुलकं तस्य मध्यान्तं च शोभनम्। सुषिरं कुण्डदेशे स्याद् विशेद्यावत्कनीयसी।।32।। शेषं दण्डं च कर्त्तव्यं यथारुचि विचित्रकम्।1 तब शेष भाग के बीच में सुन्दर मेखला बनानी चाहिए। यह मेखला तीन अंगूठे की चौड़ाई लेकर बनावें। तब इसके आगे डेढ़ अंगूठे का मुख बनावें। यह मुख चार अंगुल अथवा पाँच अंगुल चौड़ा होगा। दो अथवा तीन अंगुल चौड़ा इसका मध्य भाग तथा अन्तिम भाग होगा, जिसे वह देखने में सुन्दर लगे। कुण्ड के समीप एक छिद्रयुक्त नालिका रखें, जिनमें कनिष्ठा अंगुली घुस सके। एक डंडा भी अपनी रुचि के अनुसार रंग-बिरंगा रखें। चतुःकोणसमायुक्तो हस्तमात्रः स्रुवो भवेत्।।33।। चतुष्कं शोभनं वृत्तं द्व्यङ्गुलं विदधीत वै। यथल्पपङ्के गोः पादं रुचिरं दृश्यते तथा।।34।। एक हाथ की लम्बाई वाला चौकोर स्रुव होता है। दो अंगुल परिमाण के सुन्दर चार वृत्त दो अंगुल के परिमाण में रहना चाहिए। जैसे थोड़े कीचड़ में गाय के खुर की सुन्दर आकृति बन जाती है, उसी प्रकार स्रुव का आकार होना चाहिए। पलाशपत्रे निच्छिद्रे रुचिरे स्रुकुस्रुवौ मुने। विदध्याद् वाश्वत्थपत्रे संक्षिप्ते होमकर्मणि।।35।। संक्षिप्त हवन में बिना छिद्र वाले पलाश अथवा पीपल के पत्ते का उपयोग स्रुव एवं स्रुक् के अनुकल्प में करना चाहिए।

  1. घ. यथाकिञ्चिद विचित्रकम्।

चतुर्दशोऽध्यायः (91)

ततः कुण्डस्थलं सम्यग् गोमयेनोपलिप्य च। शालितण्डुलचूर्णैश्च नीलपीतसितासितैः ।।३६।। शोभोपशोभासंयुक्तं मण्डलं व्यक्तमुज्ज्वलम् । कुण्डस्य सन्निधौ¹ सम्यग् वायव्ये विदधीत वै ।।३७।। तब कुण्ड के स्थल को भलीभाँति गाय के गोबर से लीप कर चावल के नील, पीला, सफेद और काला पीठा से विभिन्न प्रकार से सजाकर स्पष्ट एवं चमकीला यन्त्र कुण्ड के समीप वायुकोण (पश्चिमोत्तर कोण) में लिखें। तत्राष्टपत्रं कमलं वृत्तत्रयपरिवृतम्। सोमसूर्याग्निबिम्बे द्वे तथा कुर्याद् विचक्षणः ।।३८।। वहाँ अष्टदल कमल लिखें, जो तीन वृत्तों से घिरा हुआ हो तथा उसपर चन्द्रमा, सूर्य और अग्नि के दो बिम्ब बनाएँ। चतुरस्रं बहिस्तस्य षट्कोणं कर्णिकान्तरे। पीतं पूर्वे सितं देयं पश्चिमेऽप्युत्तरे तथा ।।३९।। रक्तं तु दक्षिणे कृष्णं पाटलं वह्निसंस्थितम् । निर्ऋति नीलवर्णन्तु वायव्ये धूम्रवर्णकम् ।।४०।। ऐशे गौरं विनिर्दिष्टमष्टपत्रे त्वयं क्रमः। इसके बाहर चतुर्भुज बनाएँ तथा कर्णिका (मध्यभाग) में षट्कोण बनाएँ। शङ्खचक्रगदापद्मं धनुर्बाणांश्च² मण्डले ।।४१।। विलिखेद् वर्णकैः सम्यक् तत्र रामं समर्च्चयेत्। शंख, चक्र, गदा, पद्म, धनुष और बाण इस षट्कोण में सुन्दर ढंग से बनाएँ और वहाँ श्रीराम की अर्चना करें। कुण्डान्तरेष्वेवमेवाराध्य श्रद्धया मुने ।³।४२।। आदौ वह्निमुखं कुर्यादुपविष्टः सुविष्टरे। दूसरे कुण्डों में भी इसी प्रकार श्रद्धा से आराधना कर सुन्दर विष्टर (25 कुशों से निर्मित अधःकेश पुंज) पर बैठकर सबसे पहले अग्निमुख करें। प्राणानायम्य मनसा जपेन्मन्त्रमनन्यधीः ।।४३।। यावन्मरुत् संचरति सर्वाङ्गेष्वपि निश्चलः।

  1. घ. दक्षिणे। 2. घ. धनुर्बाणानि । 3. घ. शृणुयान्मुने । Rarest Archiver

(92) अगस्त्य-संहिता प्राणायाम कर मन ही मन एकाग्र होकर मन्त्र का जप तब तक करें, जबतक कि वायु सभी अंगों में निश्चल होकर संचरण न करने लगे। सङ्कल्प्य स्थण्डिले कुण्डे कृत्वा लेखाश्च मध्यमाः ।।44।। ऊर्ध्वं तिर्यक् तिस्र एव वह्निमत्रादधीत वै। प्रोक्ष्योपसार्य्य¹ तत्पश्चाद्दत्वा विष्टरमादरात् ।।45।। स्थण्डिल अथवा कुण्ड में संकल्प कर मध्य में तीन रेखाएँ नीचे से ऊपर की ओर तथा तीन दायें से बाये आलेखन करें। तब यहाँ अग्नि का आधान करें। इसके बाद अग्नि का प्रोक्षण और अपसारण कर कुश से परिस्तरण करें। लक्ष्मीमृतुमतीं तत्र प्रभोर्नारायणस्य च। ग्राम्यधर्मेण सञ्जातमग्निं तत्र विचिन्तयेत् ।।46।। वहाँ लक्ष्मी को रजस्वला के रूप में ध्यान करें और प्रभु नारायण के संयोग से उत्पन्न अग्नि का स्मरण करें। प्रमथ्य विधिनैवाग्निमाहिताग्नेर्गृहादपि। आनीय चादधीतात्र कुशैः प्रज्वाल्य यत्नतः ।।47।। अग्नि का विधानपूर्वक मन्थन कर अथवा आहिताग्नि के घर से लाकर कुश से अग्नि प्रज्वलित कर यहाँ आधान करें। सम्प्रोक्ष्य याज्ञिकैः काष्ठैः पुनः प्रज्वालयेदपि। प्राणायामन्ततः कुर्यात् परिस्तार्य कुशाङ्कुरैः ।।48।। यज्ञीय काष्ठ से प्रोक्षण कर पुनः उसे प्रज्वलित करें, तब कुश से परिस्तरण कर प्राणायाम करें। स्वगृह्योक्तविधानेन वासुदेवादिभिर्मुने। पात्राण्यासाद्य विधिवदिध्ममन्त्रेण तन्त्रवित् ।।49।। हे मुनि सुतीक्ष्ण! मन्त्र के ज्ञानी अपनी शाखा के गृह्यसूक्त की विधि के अनुसार अथवा वासुदेव आदि की पद्धति के अनुसार पात्रों को यथास्थान विधानपूर्वक इध्ममन्त्र से रखें। तान्यवेक्ष्य पवित्रेण चोत्तमानि विधाय च। पुनः प्रोक्ष्यानयेत् पात्रं परिपूर्य शुभाम्बुना ।।50।।

  1. घ. प्रोक्ष्य प्रसार्य्य।

चतुर्दशोऽध्यायः (93) पवित्री कुश हाथ में रखकर उन पात्रों का अवेक्षण (अवलोकन) कर उन्हें उत्तान स्थापित कर फिर प्रोक्षण (धोकर) कर पात्रों को शुभ जल से भरकर रखें। कृत्वा कुशपवित्रं च तत्रोत्पूर्य निधाय तत्। दिश्युत्तरस्यां तत्पात्रं प्रणीतेत्युच्यते बुधैः।।५१।। कुश की दो पवित्री का निर्माण जल भरे पात्र के ऊपर रखें। उत्तर दिशा में रखे गये उस पात्र को प्रणीता कहा जाता है। तत्रार्चयेत् प्रभुं विष्णुं ब्रह्माणं ब्रह्मणार्चयेत्।२ आज्यं२ संस्कृत्य विधिवत् स्रुक्स्रुवावोमिति ब्रुवन्।।५२।। वहाँ प्रभु विष्णु तथा ब्रह्मा की अर्चना ब्रह्मसूक्त से करें तथा घृत का संस्कार तापन एवं उद्धरण विधि से कर ॐकार का उच्चारण करते हुए स्रुक् और स्रुव का संस्कार करें। गर्भाधानादिकं वह्नेर्विवाहान्तं समाचरेत्। अष्टावष्टौ च तारेण चेकैकस्य तु कर्मणः।।५३।। तब अग्नि के गर्भाधान से विवाह पर्यन्त की विधि करें। इनमें आठ आठ बार ॐकार का उच्चारण प्रत्येक विधि में करें। जुहुयादर्चिते वह्नौ वौषडन्तं समाप्य च। कर्मान्तरं समारभ्य तदप्येवं समापयेत्।।५४।। इस प्रकार पूजित अग्नि में वौषट् से समाप्त कर हवन करें। अन्य कर्म भी प्रारम्भ कर इसी प्रकार समाप्त करें। एवमग्नौ सुसम्पन्ने वैष्णवं श्रपयेच्चरुम्। इध्माधानादग्निमुखावाज्यभागौ जुहुयात् पुनः।।५५।। इस प्रकार सम्यक् प्रकार से अग्नि-पूजन समाप्त कर विष्णु को समर्पित करने योग्य चरु पकायें। तब अग्नि का आधान से अग्निमुख कर्म पर्यन्त कर दोनों आज्यभाग हवन करें। साङ्गावाहनमन्त्रान्नौ पूजयेद्रघुनन्दनम्।३ समिदाज्यचरूणां च प्रत्येकं षोडशाहुतीः।।५६।। जुहुयान्मूलमन्त्रेण परिवारेभ्य एव च। तिस्रो विनायकादिभ्यः सर्वेभ्योऽप्याहुतीर्मुने।।५७।। १. घ. ब्राह्मणोऽर्चयेत्। २. घ. कामं। ३. घ. पूजयेद्रघुनायकम् Rarest Archiver

(94) अगस्त्य-संहिता मूल मन्त्र से परिवार देवताओं को आहुति देकर गणेश आदि सभी देवताओं को आहुति दें। द्वाराङ्गपरिवारेभ्यः सुरेभ्यो जुहुयात्पुनः। हुत्वाज्येनाहुतीस्तत्तत् प्रदद्यात्तत्तदाप्तये ।।58।। द्वारदेवता, अंगदेवता, परिवार देवता एवं अन्य देवताओं को भी आहुति देकर पुनः घृत से उन उन देवताओं की कृपा पाने के लिए आहुतियाँ दें। तत्तद्द्द्रव्यैश्च जुहुयात् सर्वं चारुमनोहरैः। द्वारपीठसुरेभ्यश्च हुत्वादौ जुहुयात्ततः ।।59।। अङ्गादिवैष्णवान्तेभ्यः तिस्र आज्याहुतीः पृथक्। देवताओं के लिए विहित उन मनोहर द्रव्यों से द्वारदेवता एवं पीठदेवता को आहुति देकर तब हवन करें। अङ्ग देवताओं से आरम्भ कर विष्णु-भक्तों तक तीन तीन आहुतियाँ पृथक् पृथक् दें। ततः स्विष्टकृतं हुत्वा घृतेन मुनिसत्तम ।।60।। जलेन विधिना सम्यक् परिषिञ्च्य¹ समं ततः। हे मुनिश्रेष्ठ सुतीक्ष्ण! तब स्विष्टकृत् होम घृत से करें और विधानपूर्वक जल से परिषेचन करें। प्रणीतामार्जनं कृत्वा दद्याच्च ब्रह्मदक्षिणाम् ।।61।। स्वस्ववित्तानुसारेण लोभमोहविवर्जितः। ततो ब्रह्माणमुद्वास्य ब्राह्मणान्भोजयेत्तथा ।।62।। प्रणीतापात्र को खँघाल कर अपने विभव के अनुसार लोभ और मोह का परित्याग करते हुए ब्रह्मा को दक्षिणा दें। तब ब्रह्मा को विसर्जित करें और ब्राह्मणों को भोजन कराएँ। अग्निमध्यगतं देवं पुनः स्वात्मनि योजयेत्। एकीभूतं विचिन्त्येव वाचयेत् स्वस्तिवाचनम् ।।63।। आशीर्वचोभिर्विदुषामेध्यमानः सुखी भवेत्। तब अग्नि के मध्य में स्थित देव श्रीराम का आधान अपने हृदय में करें और श्रीराम के साथ एकाकार हो जाने का चिन्तन करें। तब स्वस्तिवाचन कराएँ। विद्वानों के आशीर्वचन से यजमान वृद्धि करता हुआ सुखी रहता है।

  1. घ. चाभिषिञ्च्य।

हुतशेषं ततः प्राश्य कुक्कुटाण्डप्रमाणकम् ।। ६४ ।। मन्त्रितं रामगायत्र्या ततस्तस्मै बलिं हरेत् । सन्निधावपि देवस्य बाह्यान्तर्दिक्षु चान्धसा ।। ६५ ।। तब हवन करने से शेष बचे पदार्थ में से मुर्गी के अंडे बराबर मात्रा में लेकर रामगायत्री से अभिमन्त्रित कर भक्षण करें। तब देवता के समीप, बाहर- भीतर एवं सभी दिशाओं में लिए भात (अन्धस्) से बलि दें। नित्ये नैमित्तिके काम्येऽप्येतदग्निमुखं स्मृतम् । सर्वत्राभ्युदयश्राद्धमङ्कुरारोपणं तथा। आदावन्ते प्रकुर्वन्ति कर्माण्यभ्युदयार्थिनः ।¹।। ६६ ।। नित्य, नैमित्तिक एवं काम्य तीनों कर्मों में इस प्रकार हवन स्मृतियों में कहा गया है। इन सभी कर्मों के आरम्भ एवं अंत में आभ्युदयिक श्राद्ध और अंकुरारोपण भी उन्नति के आकांक्षियों के लिए स्मृत है। इत्यगस्त्यसंहितायां परमरहस्ये कुण्डमान- होमान्तादिविधिप्रकरणं नाम चतुर्दशोऽध्यायः ।। १४ ।। अथ पञ्चदशोऽध्यायः अगस्त्य उवाच अथ प्रयोगं² वक्ष्यामि चतुर्णामिष्टदं³ मुने । मन्दभाग्योऽपि येनेष्टमायासेनैति वांछितम् ।। १ ।। अगस्त्य बोले- हे मुनि सुतीक्ष्ण, अब चारो वर्णों को वांछित फल देने वाला प्रयोग बतलाता हूँ, जिसे करने मन्दभाग्य भी इच्छित वस्तु प्राप्त कर लेता है। निधाय विधिवत्सम्यगग्निभागान्तमुक्तवत् । ततोऽग्नौ देवमावाह्य पूजयेदुपचारकैः ।। २ ।। पञ्चभिर्वा षोडशभिः पूज्योपकरणैः पृथक् । पलाशश्वत्थखदिरोदुम्बराम्रवटेन्धनैः ।। ३ ।। अग्निं प्रज्वालयेत् सम्यग्याज्ञिकैर्वाथ वेन्धनैः । तत्रैव पूजयेत् सम्यग् जुहुयादपि राघवम् ⁴ ।। ४ ।। १. घ. कर्मणोऽभ्युदयार्थतः। २. घ. प्रयोगान्। ३. घ. चतुर्णामिष्टदान्। ४. घ. माधवम्।

(96) अगस्त्य-संहिता

लक्षं तदर्द्धमथवा जपित्वा तद्दशांशतः। तिलैर्वामलकैर्हुत्वा¹ यद्यदिष्टं तदश्नुते।।५।। विधानपूर्वक पीछे कही गयी विधि से होमकर्म पर्यन्त कर अग्नि में देवता का आवाहन कर पाँच या सोलह उपचारों से पृथक्-पृथक् पूजा कर पलाश, पीपल, खैर, गूलर, आम, बड़, या अन्य यज्ञीय की समिधा से अग्नि प्रज्वलित करें। वहीं 'श्रीराम की पूजा सम्यक् रूप से कर एक लाख अथवा पचास हजार जप कर उसका दशांश हवन करें। तिल से अथवा आँवला से हवन कर अभीष्ट वस्तु की प्राप्ति होती है। बिल्वप्रसूनैरैश्वर्यमर्चितेऽग्नौ हुतैर्भवेत्। पलाशकुसुमैर्हुत्वा मेधावी वेदविद् भवेत्।।६।। दूर्वाभिश्च गुडीचीभिः² प्रत्येकमाप चाक्षतैः। निरामयोऽपि दीर्घायुर्भवत्येव तपोधन³।।७।। पूजित अग्नि में बेल के फूल से हवन करने पर ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है। पलाश के फूल से हवन कर वह मेधावी और वेद ज्ञानी होता है। दूर्वा या गुरुच के साथ अक्षत मिलाकर हवन करने से यजमान नीरोग और दीर्घायु होते हैं। सम्यक् चन्दनतोयेन प्रत्यग्रैश्च समुक्षितैः। जातीप्रसूनैर्हुत्वा तु राजानं वशमानयेत्।।८।। चन्दन के जल से सुगन्धित खिलेहुए तथा उचित रीति से तोड़े गये ताजे जूही के फूल से हवन कर राजा को वश में करे। ध्यात्वा च मन्मथं रामं⁴ सीतामपि रतिं स्मरेत्। सर्ववश्यप्रयोगेषु जपहोमादिकर्मसु।।९।। श्रीराम का कामदेव के रूप में तथा सीता को रति के रूप में सभी वशीकरण के प्रयोग में, जप होम आदि में स्मरण करें। रामं नवोपयन्तारं स्मरेणाराध्य⁵ भक्तितः। उपैति सदृशीं कन्यां लाजहोमेन साधकः।।१०।। कामबीज (क्लीं) से नव विवाहित श्रीराम की भक्तिपूर्वक आराधना कर धान के खील से हवन करने से साधक श्रीसीता के समान कन्या पत्नी के रूप में प्राप्त करता है।

  1. घ. कमलैर्हुत्वा। 2. घ. गुलूचीभिः। 3. घ. तपोनिधे। 4. घ. ध्यात्वापि राघवं कामं। 5. घ. स्मरन्नाराध्य।

पञ्चदशोऽध्यायः (97) वाञ्छितं फलमाप्नोति हुत्वा रक्तोत्पलैर्नवैः । हुत्वा नीलोत्पलैः सम्यग् वशयेदखिलं जगत् ।।11।। ताजे लाल कमल से हवन कर इच्छित फल प्राप्त करता है तथा नीलकमल से हवन कर समग्र संसार को वश में करता है। रामं विधिवदाराध्य ज्वलितेऽग्नौ प्रयोगवित्। मधुरत्रययुक्तेन पायसेन हुतेन तु ।।12।। सर्वाधिपत्यं वैदुष्यं भवत्येव न संशयः। तिलैश्च तण्डुलैराज्यैर्हुत्वा लोकस्य पूज्यताम् ।।13।। प्रज्वलित अग्नि में श्रीराम की विधिपूर्वक आराधना कर प्रयोग जानने वाला तीन मधुर (मधु, गुड़ एवं मिसरी) मिले खीर से हवन कर सभी पर आधिपत्य और वैदुष्य प्राप्त करता है और तिल, चावल एवं घृत से हवन कर संसार में पूजित होता है। आराध्य वत्सरं यावत्¹ षट्सहस्रं दिने दिने। जपेच्च जुहुयादग्नौदशांशं तद्गतान्धसा ।।14।। अयमेवान्नदो लोके सर्वेषामपि जायते। बिल्वप्रसूनैः कुमुदैस्तथा बिल्वदलैरपि ।।15।। हुत्वा स लभते लक्ष्मीमचिरान्मन्त्रसाधकः। प्रतिदिन छह हजार मन्त्र का जप कर अग्नि में पूर्वोक्त विधि उससे युक्त भात (अन्धस्) से दशांश हवन करें। यहीं इस संसार में सबके लिए अन्न देने वाला प्रयोग है। बेल का फूल, कुमुद तथा बिल्वपत्र से हवन कर मन्त्रसाधक शीघ्र लक्ष्मी प्राप्त करता है। आराध्य रामं चण्डांशुमण्डले वत्सरं मुने ।।16।। उदयास्तमने तं च जपेद्राममन्त्रमनन्यधीः।² फलं भवति तस्याशु देवानामपि दुर्लभम् ।।17।। वैदुष्येणाधिपत्येन सभ्यानामुत्तमो³ भवेत्। पूर्णिमासु निशीथिन्यामुदयास्तमयव्रतम् ।।18।।

  1. घ. आरात् संवत्सरं यावत्। 2. घ. उदयास्तमनं यावत् जपेन्मन्त्रमनन्यधीः। 3. घ. समानामुत्तमो।