अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)
Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary
महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा
पृष्ठ 151, कुल 337 में से
संदर्भ में पढ़ें(90) अगस्त्य-संहिता कुण्ड निर्माण के लिए सबसे पहले समतल भूमि पर बारह अंगुल पर्यन्त चौकोर गड्ढा बनावें। इसके बाद एक तिहाई भाग वृत्ताकार बनावें। इसके बाद टेढ़ा कर ऊपर की ओर खनें। इस क्रम में पहले एक अंगुल के चौथाई भाग तक खनें तथा अन्त तक आधा अंगुल टेढ़ा खनें। रम्यां च मेखलां खाते शिष्टेनार्द्धेन कारयेत्। कुर्यात् त्रिभागविस्तारां चाङ्गुष्ठेन समायुताम्।।30।। सार्द्धमङ्गुष्ठकं चास्य तदग्रे तु मुखं भवेत्। चतुरङ्गुलविस्तारं पञ्चाङ्गुलमथापि वा।।31।। द्वित्रयाङ्गुलकं तस्य मध्यान्तं च शोभनम्। सुषिरं कुण्डदेशे स्याद् विशेद्यावत्कनीयसी।।32।। शेषं दण्डं च कर्त्तव्यं यथारुचि विचित्रकम्।1 तब शेष भाग के बीच में सुन्दर मेखला बनानी चाहिए। यह मेखला तीन अंगूठे की चौड़ाई लेकर बनावें। तब इसके आगे डेढ़ अंगूठे का मुख बनावें। यह मुख चार अंगुल अथवा पाँच अंगुल चौड़ा होगा। दो अथवा तीन अंगुल चौड़ा इसका मध्य भाग तथा अन्तिम भाग होगा, जिसे वह देखने में सुन्दर लगे। कुण्ड के समीप एक छिद्रयुक्त नालिका रखें, जिनमें कनिष्ठा अंगुली घुस सके। एक डंडा भी अपनी रुचि के अनुसार रंग-बिरंगा रखें। चतुःकोणसमायुक्तो हस्तमात्रः स्रुवो भवेत्।।33।। चतुष्कं शोभनं वृत्तं द्व्यङ्गुलं विदधीत वै। यथल्पपङ्के गोः पादं रुचिरं दृश्यते तथा।।34।। एक हाथ की लम्बाई वाला चौकोर स्रुव होता है। दो अंगुल परिमाण के सुन्दर चार वृत्त दो अंगुल के परिमाण में रहना चाहिए। जैसे थोड़े कीचड़ में गाय के खुर की सुन्दर आकृति बन जाती है, उसी प्रकार स्रुव का आकार होना चाहिए। पलाशपत्रे निच्छिद्रे रुचिरे स्रुकुस्रुवौ मुने। विदध्याद् वाश्वत्थपत्रे संक्षिप्ते होमकर्मणि।।35।। संक्षिप्त हवन में बिना छिद्र वाले पलाश अथवा पीपल के पत्ते का उपयोग स्रुव एवं स्रुक् के अनुकल्प में करना चाहिए।
- घ. यथाकिञ्चिद विचित्रकम्।