अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)
Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary
महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहुतशेषं ततः प्राश्य कुक्कुटाण्डप्रमाणकम् ।। ६४ ।। मन्त्रितं रामगायत्र्या ततस्तस्मै बलिं हरेत् । सन्निधावपि देवस्य बाह्यान्तर्दिक्षु चान्धसा ।। ६५ ।। तब हवन करने से शेष बचे पदार्थ में से मुर्गी के अंडे बराबर मात्रा में लेकर रामगायत्री से अभिमन्त्रित कर भक्षण करें। तब देवता के समीप, बाहर- भीतर एवं सभी दिशाओं में लिए भात (अन्धस्) से बलि दें। नित्ये नैमित्तिके काम्येऽप्येतदग्निमुखं स्मृतम् । सर्वत्राभ्युदयश्राद्धमङ्कुरारोपणं तथा। आदावन्ते प्रकुर्वन्ति कर्माण्यभ्युदयार्थिनः ।¹।। ६६ ।। नित्य, नैमित्तिक एवं काम्य तीनों कर्मों में इस प्रकार हवन स्मृतियों में कहा गया है। इन सभी कर्मों के आरम्भ एवं अंत में आभ्युदयिक श्राद्ध और अंकुरारोपण भी उन्नति के आकांक्षियों के लिए स्मृत है। इत्यगस्त्यसंहितायां परमरहस्ये कुण्डमान- होमान्तादिविधिप्रकरणं नाम चतुर्दशोऽध्यायः ।। १४ ।। अथ पञ्चदशोऽध्यायः अगस्त्य उवाच अथ प्रयोगं² वक्ष्यामि चतुर्णामिष्टदं³ मुने । मन्दभाग्योऽपि येनेष्टमायासेनैति वांछितम् ।। १ ।। अगस्त्य बोले- हे मुनि सुतीक्ष्ण, अब चारो वर्णों को वांछित फल देने वाला प्रयोग बतलाता हूँ, जिसे करने मन्दभाग्य भी इच्छित वस्तु प्राप्त कर लेता है। निधाय विधिवत्सम्यगग्निभागान्तमुक्तवत् । ततोऽग्नौ देवमावाह्य पूजयेदुपचारकैः ।। २ ।। पञ्चभिर्वा षोडशभिः पूज्योपकरणैः पृथक् । पलाशश्वत्थखदिरोदुम्बराम्रवटेन्धनैः ।। ३ ।। अग्निं प्रज्वालयेत् सम्यग्याज्ञिकैर्वाथ वेन्धनैः । तत्रैव पूजयेत् सम्यग् जुहुयादपि राघवम् ⁴ ।। ४ ।। १. घ. कर्मणोऽभ्युदयार्थतः। २. घ. प्रयोगान्। ३. घ. चतुर्णामिष्टदान्। ४. घ. माधवम्।