भारतकोश
अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary

महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा

DevanagariSanskritpublished337 पृष्ठ

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पृष्ठ 155

(94) अगस्त्य-संहिता मूल मन्त्र से परिवार देवताओं को आहुति देकर गणेश आदि सभी देवताओं को आहुति दें। द्वाराङ्गपरिवारेभ्यः सुरेभ्यो जुहुयात्पुनः। हुत्वाज्येनाहुतीस्तत्तत् प्रदद्यात्तत्तदाप्तये ।।58।। द्वारदेवता, अंगदेवता, परिवार देवता एवं अन्य देवताओं को भी आहुति देकर पुनः घृत से उन उन देवताओं की कृपा पाने के लिए आहुतियाँ दें। तत्तद्द्द्रव्यैश्च जुहुयात् सर्वं चारुमनोहरैः। द्वारपीठसुरेभ्यश्च हुत्वादौ जुहुयात्ततः ।।59।। अङ्गादिवैष्णवान्तेभ्यः तिस्र आज्याहुतीः पृथक्। देवताओं के लिए विहित उन मनोहर द्रव्यों से द्वारदेवता एवं पीठदेवता को आहुति देकर तब हवन करें। अङ्ग देवताओं से आरम्भ कर विष्णु-भक्तों तक तीन तीन आहुतियाँ पृथक् पृथक् दें। ततः स्विष्टकृतं हुत्वा घृतेन मुनिसत्तम ।।60।। जलेन विधिना सम्यक् परिषिञ्च्य¹ समं ततः। हे मुनिश्रेष्ठ सुतीक्ष्ण! तब स्विष्टकृत् होम घृत से करें और विधानपूर्वक जल से परिषेचन करें। प्रणीतामार्जनं कृत्वा दद्याच्च ब्रह्मदक्षिणाम् ।।61।। स्वस्ववित्तानुसारेण लोभमोहविवर्जितः। ततो ब्रह्माणमुद्वास्य ब्राह्मणान्भोजयेत्तथा ।।62।। प्रणीतापात्र को खँघाल कर अपने विभव के अनुसार लोभ और मोह का परित्याग करते हुए ब्रह्मा को दक्षिणा दें। तब ब्रह्मा को विसर्जित करें और ब्राह्मणों को भोजन कराएँ। अग्निमध्यगतं देवं पुनः स्वात्मनि योजयेत्। एकीभूतं विचिन्त्येव वाचयेत् स्वस्तिवाचनम् ।।63।। आशीर्वचोभिर्विदुषामेध्यमानः सुखी भवेत्। तब अग्नि के मध्य में स्थित देव श्रीराम का आधान अपने हृदय में करें और श्रीराम के साथ एकाकार हो जाने का चिन्तन करें। तब स्वस्तिवाचन कराएँ। विद्वानों के आशीर्वचन से यजमान वृद्धि करता हुआ सुखी रहता है।

  1. घ. चाभिषिञ्च्य।