अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)
Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary
महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचतुर्दशोऽध्यायः (93) पवित्री कुश हाथ में रखकर उन पात्रों का अवेक्षण (अवलोकन) कर उन्हें उत्तान स्थापित कर फिर प्रोक्षण (धोकर) कर पात्रों को शुभ जल से भरकर रखें। कृत्वा कुशपवित्रं च तत्रोत्पूर्य निधाय तत्। दिश्युत्तरस्यां तत्पात्रं प्रणीतेत्युच्यते बुधैः।।५१।। कुश की दो पवित्री का निर्माण जल भरे पात्र के ऊपर रखें। उत्तर दिशा में रखे गये उस पात्र को प्रणीता कहा जाता है। तत्रार्चयेत् प्रभुं विष्णुं ब्रह्माणं ब्रह्मणार्चयेत्।२ आज्यं२ संस्कृत्य विधिवत् स्रुक्स्रुवावोमिति ब्रुवन्।।५२।। वहाँ प्रभु विष्णु तथा ब्रह्मा की अर्चना ब्रह्मसूक्त से करें तथा घृत का संस्कार तापन एवं उद्धरण विधि से कर ॐकार का उच्चारण करते हुए स्रुक् और स्रुव का संस्कार करें। गर्भाधानादिकं वह्नेर्विवाहान्तं समाचरेत्। अष्टावष्टौ च तारेण चेकैकस्य तु कर्मणः।।५३।। तब अग्नि के गर्भाधान से विवाह पर्यन्त की विधि करें। इनमें आठ आठ बार ॐकार का उच्चारण प्रत्येक विधि में करें। जुहुयादर्चिते वह्नौ वौषडन्तं समाप्य च। कर्मान्तरं समारभ्य तदप्येवं समापयेत्।।५४।। इस प्रकार पूजित अग्नि में वौषट् से समाप्त कर हवन करें। अन्य कर्म भी प्रारम्भ कर इसी प्रकार समाप्त करें। एवमग्नौ सुसम्पन्ने वैष्णवं श्रपयेच्चरुम्। इध्माधानादग्निमुखावाज्यभागौ जुहुयात् पुनः।।५५।। इस प्रकार सम्यक् प्रकार से अग्नि-पूजन समाप्त कर विष्णु को समर्पित करने योग्य चरु पकायें। तब अग्नि का आधान से अग्निमुख कर्म पर्यन्त कर दोनों आज्यभाग हवन करें। साङ्गावाहनमन्त्रान्नौ पूजयेद्रघुनन्दनम्।३ समिदाज्यचरूणां च प्रत्येकं षोडशाहुतीः।।५६।। जुहुयान्मूलमन्त्रेण परिवारेभ्य एव च। तिस्रो विनायकादिभ्यः सर्वेभ्योऽप्याहुतीर्मुने।।५७।। १. घ. ब्राह्मणोऽर्चयेत्। २. घ. कामं। ३. घ. पूजयेद्रघुनायकम् Rarest Archiver