अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)
Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary
महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा
पृष्ठ 153, कुल 337 में से
संदर्भ में पढ़ें(92) अगस्त्य-संहिता प्राणायाम कर मन ही मन एकाग्र होकर मन्त्र का जप तब तक करें, जबतक कि वायु सभी अंगों में निश्चल होकर संचरण न करने लगे। सङ्कल्प्य स्थण्डिले कुण्डे कृत्वा लेखाश्च मध्यमाः ।।44।। ऊर्ध्वं तिर्यक् तिस्र एव वह्निमत्रादधीत वै। प्रोक्ष्योपसार्य्य¹ तत्पश्चाद्दत्वा विष्टरमादरात् ।।45।। स्थण्डिल अथवा कुण्ड में संकल्प कर मध्य में तीन रेखाएँ नीचे से ऊपर की ओर तथा तीन दायें से बाये आलेखन करें। तब यहाँ अग्नि का आधान करें। इसके बाद अग्नि का प्रोक्षण और अपसारण कर कुश से परिस्तरण करें। लक्ष्मीमृतुमतीं तत्र प्रभोर्नारायणस्य च। ग्राम्यधर्मेण सञ्जातमग्निं तत्र विचिन्तयेत् ।।46।। वहाँ लक्ष्मी को रजस्वला के रूप में ध्यान करें और प्रभु नारायण के संयोग से उत्पन्न अग्नि का स्मरण करें। प्रमथ्य विधिनैवाग्निमाहिताग्नेर्गृहादपि। आनीय चादधीतात्र कुशैः प्रज्वाल्य यत्नतः ।।47।। अग्नि का विधानपूर्वक मन्थन कर अथवा आहिताग्नि के घर से लाकर कुश से अग्नि प्रज्वलित कर यहाँ आधान करें। सम्प्रोक्ष्य याज्ञिकैः काष्ठैः पुनः प्रज्वालयेदपि। प्राणायामन्ततः कुर्यात् परिस्तार्य कुशाङ्कुरैः ।।48।। यज्ञीय काष्ठ से प्रोक्षण कर पुनः उसे प्रज्वलित करें, तब कुश से परिस्तरण कर प्राणायाम करें। स्वगृह्योक्तविधानेन वासुदेवादिभिर्मुने। पात्राण्यासाद्य विधिवदिध्ममन्त्रेण तन्त्रवित् ।।49।। हे मुनि सुतीक्ष्ण! मन्त्र के ज्ञानी अपनी शाखा के गृह्यसूक्त की विधि के अनुसार अथवा वासुदेव आदि की पद्धति के अनुसार पात्रों को यथास्थान विधानपूर्वक इध्ममन्त्र से रखें। तान्यवेक्ष्य पवित्रेण चोत्तमानि विधाय च। पुनः प्रोक्ष्यानयेत् पात्रं परिपूर्य शुभाम्बुना ।।50।।
- घ. प्रोक्ष्य प्रसार्य्य।