भारतकोश
अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary

महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा

DevanagariSanskritpublished337 पृष्ठ

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पृष्ठ 148

चतुर्दशोऽध्यायः (87) कुण्ड के पश्चिम भाग में लक्षण के अनुसार योनि बनावें। पीपल के पत्ते के आकार की योनि कुण्ड पर प्रतिष्ठित करनी चाहिए। छह अंगुल के बाद चार अंगुल, तब दो अंगुल, इस प्रकार क्रमशः योनि आगे की ओर ढालवाली होनी चाहिए। चौड़ाई और दस अंगुल लम्बाई की योनि होती है। योनिमूल में अवस्थित गाल और योनि के अग्रभाग की ऊँचाई नीचे के क्रम में छह अंगुल, चार अंगुल तथा तीन अंगुल की होनी चाहिए। यह कुण्ड का लक्षण है। यह एक हाथ लंबाई- चौड़ाईवाले कुण्ड का प्रकार स्पष्ट किया गया है। द्विहस्तकुण्डमध्येवं द्विगुणीकृत्य मेखलाम्। नाभेरप्यथवा कुण्डमेकमेखलकं भवेत् ।।12।। संक्षेपकर्मसु तथा वर्त्तुलं स्यात् सुलक्षणम्। इसी प्रकार दो हाथ के कुण्ड में मेखला तथा नाभि दो गुनी होगी। अथवा संक्षिप्त कर्म में एक मेखलावाला कुण्ड हो सकता है तथा सभी लक्षणों से सम्पन्न वर्त्तुल कुण्ड का भी निर्माण किया जा सकता है। चतुष्कोणैकहस्तस्य मध्ये कुण्डस्य चाङ्कनम् ।।13।। मध्यान्निधाय सूत्रेण भ्रामयेदभितो मुने। कोणेषु यच्चाप्यधिकं तद्दिक्ष्वेव विनिर्दिशेत् ।।14।। इदञ्च वर्त्तुलं कुण्डं ततः स्यादर्धचन्द्रकम् । दिशि चोत्तरतः कुण्डकोणभागादर्द्धभागतः ।।15।। बहिरैन्द्र्या च वारुण्या यत्नान्मध्ये तु लांछयेत्। संस्थाप्य भ्रामयेदेतदर्द्धचन्द्रं शुभ्रप्रदम् ¹ ।।16।। एक हाथ के चौकोर भूमि के मध्य में कुण्ड का अंकन करना चाहिए। मध्यभाग से एक धागा लेकर उसे चारो ओर घुमावें। कोणों में और दिशाओं में चिह्न लगावें। यह वर्त्तुल कुण्ड कहलाता है। इसके बाद अर्द्धचन्द्र कुण्ड भी होता है। कुण्ड में उत्तर की ओर से कोण के आधे भाग पर पुनः पूर्व दिशा से पश्चिम दिशा तक सूत्र रखकर मध्य में स्थापित कर घुमावें। यह अर्द्धचन्द्राकार कुण्ड शुभ फल देता है। (महामहोपाध्याय मधुसूदन ओझा ने 'यज्ञमधुसूदन' नामक ग्रन्थ में वर्त्तुल कुण्ड बनाने की तीन विधियाँ दी हैं, जिनमें एक विधि के अनुसार चौकोर क्षेत्र में

  1. घ. सुशोभनम् ।