अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)
Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary
महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा
DevanagariSanskritpublished337 पृष्ठ
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(86) अगस्त्य-संहिता
सर्वेषामीप्सितार्थानामन्यथा वै तथा नहि। न्यायार्जितैः साधनैश्च दानहोमार्चनादिकम् ।।३।। कुर्यान्न चेदधो याति भक्त्या कुर्वन्नपि द्विजः। न्यायपूर्वक स्वयं अर्जित साधनों से दान, होम, अर्चना आदि करें, नहीं तो भक्तिपूर्वक इन्हें करते हुए भी अधोगति प्राप्त करते हैं। भूमिस्थानं समीकृत्य षट्चतुष्काङ्गुलोत्तरम्¹ ।।४।। तावत् तन्निखनेदन्तश्चतुष्कोणन्तथान्ततः। दिशि दिश्यन्तरञ्चैव पार्श्वस्थलचतुष्टयम् ।।५।। भूमि को समतल कर दश अंगुल ऊँची वेदिका बनाएँ। तब अन्दर की ओर चौकोर खनें। तब चारो दिशाओं और कोणों में भी चार पार्श्व बनावें। (इस प्रकार नीचे अष्टकोण बन जाएगा।) एवं सलक्षणं² कृत्वा बहिः कुर्याच्च मेखलाः। द्वादशाष्टचतुर्मानां स्वाङ्गुलैश्च क्रमान्मुने।।६।। एवमुत्सेध आयामश्चतुराङ्गुलमेव तत्। आयामोत्सेधरूपेण चतुष्काधिक्यतः क्रमात् ।।७।। चतुष्कत्रितयं कुर्यादेवं हि मेखलाक्रमः। इस प्रकार के लक्षणों से कुण्ड बनाकर तब बाहर तीन मेखला क्रमशः बारह अंगुल आठ अंगुल और चार अंगुल मान से बनावें। इस प्रकार उठाकर विस्तार चार अंगुल ही रखें। चौड़ाई और ऊँचाई दोनों क्रमशः चार-चार अंगुल क्रमशः होगी। चार अंगुल की तीन मेखला बनावें; यही क्रम है। कुण्डस्य पश्चिमे भागे योनिं कुर्यात्सलक्षणाम् ।।८।। अश्वत्थपत्रसदृशीं कुण्डे किञ्चित् प्रतिष्ठिताम्। षट्चतुर्द्वयङ्गुलाक्षा³ च क्रमान्निम्ना भवेत्पुनः।।९।। विस्तारेणापि सा योनिर्भवत्येव दशांगुला।⁴ मूलं नालं तथाग्रं च व्युत्क्रमात् षट्चतुस्त्रिकम् ।।१०।। तन्मानाङ्गुलमानं स्यादेतत् कुण्डस्य लक्षणम्। एकहस्तस्य कुण्डस्य⁵ प्रकारोऽयं प्रकाशितः ।।११।।
- घ. षट्चतुर्द्ध्वङ्गुलोत्तरम्। 2. घ. सुलक्षणम्। 3. घ. षट्चतुस्त्र्यङ्गुला सापि। 4. योनिर्भवेत् पञ्चदशाङ्गुला। 5. घ. चतुष्कोणैकहस्तस्य।