अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)
Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary
महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें_________________ चतुर्दशोऽध्यायः (85) राममाराध्य संस्थाप्य संनिरुध्य च मुद्रया।¹ प्रतिष्ठाप्यार्चयेद् विष्णुं न च तन्निष्फलं भवेत् ।।52।। मुद्रा के द्वारा श्रीराम का आराधना स्थापन एवं संनिरोधन कर प्रतिष्ठित कर विष्णु की पूजा करते हैं तो वह निष्फल नहीं होता। ततो² मुद्रान्तराण्यैव दर्शयिच्चैव सादरम्। प्रसाद्य सम्मुखीकृत्य सन्निधाप्य च पूजयेत् ।।53।। सकलीकृत्य प्राणांस्तु तदानीमिन्द्रियाण्यपि। यद्येवं पूजयेद्रामं भुक्तिं मुक्तिं च विन्दति ।।54।। इसके बाद आदरपूर्वक दूसरी मुद्राएँ भी दिखावें। प्रसादजी, सम्मुखीकरणी और सन्निधापनी मुद्रा दिखाकर पूजा करें। उनके प्राण को सकलीकरण कर उनकी इन्द्रियों का भी सकलीकरण करें। यदि इस प्रकार श्रीराम की पूजा करें तो भुक्ति और मुक्ति दोनों प्राप्त करते हैं। इत्यगस्त्यसंहितायां परमरहस्ये रामपूजाविधिर्नाम त्रयोदशोऽध्यायः ।। अथ चतुर्दशोऽध्यायः अगस्त्य उवाच विधिवत् संस्कृतेप्यग्नौ देवमावाह्य पूजयेत्। पूर्वोक्तेनैव विधिना साङ्गावरणवाहनम्³ ।।1।। विधानपूर्वक मार्जन, उल्लेखन आदि से संस्कार की गयी अग्नि में देवती का आवाहन कर पूर्वोक्त विधि से अंग और आवरण के साथ पूजन करें। विधिं तस्य प्रवक्ष्यामि येनेष्टं साध्यतेऽखिलम्। विहितं येऽनुतिष्ठन्ति त एव फलभाजनाः ।।2।। अब इसकी विधि कहूँगा, जिससे सब कुछ सिद्ध होता है। जो विधानपूर्वक अनुष्ठान करते हैं, वे ही सभी इच्छित फलों के भागी होते हैं, अन्यथा नहीं।
- घ. इसके बाद घ. में प्रसाद्य सम्मुखीकृत्य इत्यादि चार चरण हैं।। 2. घ. तत्तन्मुद्रा°। 3. घ. साङ्गावरणमन्वहम्। Rarest Archiver