अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)
Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary
महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा
पृष्ठ 145, कुल 337 में से
संदर्भ में पढ़ें(84) ________ अगस्त्य-संहिता नियमों के विपरीत जो देवता की अर्चना करते हैं, उन्हें राख में हवन करने के समान कुछ भी फल नहीं होता है। जो विधानों के अनुसार भक्तिपूर्वक दूसरे के द्वारा लाये गये साधनों से पूजा करते हैं उन्हें आधा फल ही मिलता है; पूरा नहीं। ¹यस्तु भक्त्या प्रयत्नेन स्वयं सम्पाद्य चाखिलम्। साधनं चार्चयेद् विद्वान् समग्रफलभाग् भवेत्।।146।। यो धनव्ययमायासमविचार्यार्चयेद् हरिम्। स्वयं सम्पाद्य तत्सर्वं सवरं तत्फलं लभेत्।²147।। जो भक्तिपूर्वक स्वयं यत्न करके सभी सामग्रियों की व्यवस्था कर अर्चन करते हैं, उन्हें समग्र फल की प्राप्ति होती है। जो धन का व्यय और प्रयत्न दोनों की परवाह किए बिना श्रीहरि की आराधना स्वयं साधन जुटाकर करते हैं तथा उन्हें नैवेद्य आदि अर्पित करते हैं, वे वर के साथ सम्पूर्ण फल पाते हैं। स्वयमानीय चोत्पाद्य पूजोपकरणानि यः। पूजयेत्तद्विधेयं स्यादुत्तमं प्रार्थदं हरिम्।³148।। स्वयं लाकर और स्वयं उगाकर पूजा सामग्रियों से श्रीहरि की पूजा करते हैं वह उत्तम विधि है इससे अच्छी प्रकार प्रयोजनों की सिद्धि होती है। कलत्रपुत्रशिष्यादि⁴ तत्तत् सम्पादितं च यत्। मध्यमं चार्चनं तेन तैः सार्द्धं तत्फलं लभेत्।।149।। पत्नी, पुत्र, शिष्य आदि के द्वारा व्यवस्था किए जाने पर मध्यम प्रकार की पूजा होती है उससे आधा फल मिलता है। अन्यैः सम्पाद्य यद्दत्तं क्रयक्रीतेन तेन वा। गौणमाराधितं तेन पादमात्रफलं लभेत्।।150।। दूसरे के द्वारा व्यवस्था कर दान की गयी सामग्रियों से अथवा खरीदकर की गयी पूजा तुच्छ होती है इससे चौथाई फल ही मिलता है। परारोपितवृक्षेभ्यः पुष्पाणानीय वार्चयेत्। अविज्ञाप्यैव तैर्यस्तु निष्फलं तस्य पूजनम्।।151।। दूसरे के द्वारा लगाये गये वृक्ष से बिना सूचना दिये हुए फूल लाकर जो पूजा करते हैं वह निष्फल होती है।
- चार चरण तक 'क' में अनुपलब्ध। 2. घ. सर्वं तत् सफलं भवेत्। 3. घ. मुनिसत्तम। 4. घ. नियोज्य यत्र शिष्यादि।