अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)
Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary
महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा
पृष्ठ 144, कुल 337 में से
संदर्भ में पढ़ेंचतुर्दशोऽध्यायः (83) — — — — — — — — — — — — — — — — — पत्रं पुष्पं फलं वापि रामाराधनसाधनम्। दद्यादाराधितं यो वै तस्य पुण्यफलं शृणु।।38।। कुरुक्षेत्रे च गङ्गायां प्रयागे पुरुषोत्तमे। गोसहस्रप्रदानेन यत्पुण्यं समवाप्यते।।39।। तदेतदखिलं पुण्यं प्राप्नोत्येव न संशयः। समग्रमसमग्रं वा यो दद्यात् पूजितं हरिम्।।40।। कदाचिदपि नित्यं वा पत्रपुष्पादिकं बहून्। किं तीर्थसेवया दानैरन्यैर्बहुभिरीरितैः।।41।। आराधनासमर्थश्चेद् दद्यादर्चनसाधनम्। श्रीराम की आराधना के साधन पत्र, पुष्प, फल आदि जो दान करते हैं उनके पुण्य का फल सुनें। कुरुक्षेत्र, गंगा के तट, प्रयाग क्षेत्र और पुरुषोत्तम क्षेत्र में हजारों गाय दान करने का फल जो मिलता है, वही समग्र फल वह भी प्राप्त करता है, वही समग्र फल वह भी प्राप्त करता है। पूजा की सभी वस्तुएँ अथवा कुछ वस्तुएँ जो प्रतिदिन अथवा कभी कभी अथवा अधिक मात्रा में पत्र-पुष्प आदि जो दान करते हैं, उनके लिए अन्य स्थलों पर विहित दान और तीर्थ में निवास करना सब व्यर्थ है। स्वयं आराधना करने में जो असमर्थ हों वे आराधना के साधनों का दान करें। ¹प्रदातुं वै नरान् कोऽस्ति कुर्यादर्चनदर्शनम्।।42।। निस्ताराय तदेवालं भवाब्धेः मुनिसत्तम। नैकं च यस्य विद्येत सोऽधो यात्येव नान्यथा।।43।। अथवा मनुष्य को दान करने में भी भला कौन समर्थ है! इसलिए आराधना का दर्शन ही करना चाहिए। संसार के समुद्र में पार लगाने के लिए वही पर्याप्त है। इनमें से जो एक भी नहीं करते उनका अधःपतन निश्चित है। नियमव्यतिरेकेण यः कुर्याद् देवतार्चनम्। किञ्चिदप्यस्य न फलं भस्मनीव हुतं मुने।।44।। योऽर्चयेद् विधिवद् भक्त्या परानीतैश्च साधनैः। पूजा फलार्द्धमेवास्य न समग्रफलं लभेत्।।45।।
- घ. में अनुपलब्ध।