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अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary

महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा

DevanagariSanskritpublished337 पृष्ठ

पृष्ठ 143, कुल 337 में से

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पृष्ठ 143

(82) अगस्त्य-संहिता ────────────────────────────────────────── शालग्रामशिलायां च तुलसीदलकल्पिता। पूजा श्रीरामचन्द्रस्य कोटिकोटिगुणाधिका।।31।। प्रतिमायां च यन्त्रे वा भूमावग्नौ विवस्वति। तले वा हृदये वापि विधायाराधयेद्¹ रहः।।32।। शालग्राम की शिला पर तुलसीदास से श्रीराम की पूजा करोड़ो करोड़ गुणा फल देती है। प्रतिमा पर अथवा यन्त्र पर, भूमि पर अथवा अग्नि में, सूर्य में, हाथ की तलहथी पर अथवा अपने हृदय में श्री राम की पूजा एकान्त में करें। कालेनैवोपचाराणां² पूजयेत्तुलसीदलैः। घण्टां च वादयेद् दद्याद् देवायाचमनीयकम्।।33।। मध्ये मध्ये च तद्वच्च नत्वा नत्वा समर्पयेत्। समयानुसार सभी उपचारों के स्थान में तुलसीदल डालें; घंटा बजावें तथा देवता को आचमनीय समर्पित करें। बीच बीच में उन अर्घ्य वस्तु को नमन कर समर्पित करें। मुकुलैः पतितैश्चैव खण्डितैः शोषितैरपि।।34।। अनर्हैरपि पुष्पैश्च दलैः पत्रैंश्च नार्चयेत्।³। मुरझाए हुए, गिरे हुए, टूटे हुए, सूखे हुए तथा पूजा के अयोग्य पुष्प, पत्र और दल से पूजा न करें। येन केनापि पुष्पेण पत्रेणापि फलेन वा।।35।। यतः कुतश्चिदानीय यत्रकुत्रोद्भवेन च। भवार्थं जीवितार्थं च नोऽर्चयेद् गर्हितस्थले।।36।। जिस किसी भी फूल, पत्र एवं फल से जो इधर उधर जन्में हों और इधर उधर से अर्थात् अपवित्र स्थान से लाये गये हों, उनसे अशुभ स्थान में सांसारिक सुख और जीवन के लिए पूजा नहीं करनी चाहिए। गंगायां गोप्रदानेन दिव्यवर्षशतत्रयम्। तत्फलं प्राप्यते नित्यमाराध्याप्नोति तद्धरिम्।।37।। गंगा के तट पर गोदान करने से जो तीन सौ दिव्य वर्ष तक स्वर्गवास का फल मिलता है वही फल उसे भी मिलता है जो प्रतिदिन श्री हरि की पूजा करें। ──────────────────────────────────────────

  1. घ. विधायावाहयेद्रहः। 2. घ. अभावे चोपचाराणां। 3. घ. पत्रैर्न पूजयेत् Rarest Archiver
अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक) · पृष्ठ 143, कुल 337 में से · BharatKosha