अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)
Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary
महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंत्रयोदशोऽध्यायः (81) पुष्पाणि पुष्पमाल्यानि विविधानि समर्पयेत्। धूपं दीपञ्च नैवद्यं ताम्बूलं च प्रदक्षिणम्।।24।। नमस्कारञ्च पूजायामुपचास्तु षोडश। अनेक प्रकार के पुष्प और पुष्पमालाएँ समर्पित करें। तब धूप, दीप, नैवेद्य देकर प्रदक्षिणा (चार बार परिक्रमा) करें। पूजा के क्रम में अन्त में प्रणाम करें; ये षोडश उपचार हैं। आवाहनादिकाश्चैव तथैकादश पञ्चधा।।25।। भवन्त्येवोपचारास्तैः पूजां कुर्यादहर्निशम्। आवाहन आदि एकादशोपचार और पञ्चोपचार भी होते हैं। इनसे भी दिन रात पूजा करें। स्नानाद्यैरपि गन्धाद्यैः भक्त्योपकल्पितैः।।26।। द्वारपीठामरानादौ अभ्यर्च्यैव पुनस्ततः। राममाराध्य विधिना सर्वैरप्युपचारकैः।।27।। अङ्गावरणदेवाश्च सम्पूज्यान्यायुधानि च। स्नान आदि से तथा चन्दन आदि से सामर्थ्यानुसार भक्तिपूर्वक द्वार और पीठ के देवताओं की पूजा करके ही विधिपूर्वक सभी उपचारों से श्रीराम की पूजा कर अंग देवताओं तथा आवरण की पूजा कर, श्रीराम के सभी शस्त्रास्त्रों की पूजा करें। एवं सम्यक् समाराध्य साङ्गावरणवाहनम्।।28।। स्तोतव्यमपि यत्नेन रामं शश्वत्प्रणम्य च। यन्त्रस्था अपि मन्त्रैश्च सम्यक् पूज्या प्रयत्नतः।।29।। इस प्रकार प्रतिदिन अंगदेवताओं, आवरण देवताओं तथा वाहनों के साथ श्रीराम की पूजा कर बार बार प्रणाम कर श्रीराम की स्तुति करें तथा यन्त्र पर अवस्थित देवताओं की पूजा मन्त्रों से अच्छी तरह करें। एवमेव यजेदग्नौ होमादावपि राघवम्। तर्पणादावपि¹ जलेष्येवमाराध्य तर्पयेत्।।30।। इसी प्रकार होम आदि में भी पहले श्रीराम की पूजा अग्नि में करें। तर्पण आदि के क्रम में भी जल में इसी प्रकार पूजा कर तर्पण करें।
- घ. दर्पणादा