अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)
Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary
महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा
चतुर्दशोऽध्यायः (83) — — — — — — — — — — — — — — — — — पत्रं पुष्पं फलं वापि रामाराधनसाधनम्। दद्यादाराधितं यो वै तस्य पुण्यफलं शृणु।।38।। कुरुक्षेत्रे च गङ्गायां प्रयागे पुरुषोत्तमे। गोसहस्रप्रदानेन यत्पुण्यं समवाप्यते।।39।। तदेतदखिलं पुण्यं प्राप्नोत्येव न संशयः। समग्रमसमग्रं वा यो दद्यात् पूजितं हरिम्।।40।। कदाचिदपि नित्यं वा पत्रपुष्पादिकं बहून्। किं तीर्थसेवया दानैरन्यैर्बहुभिरीरितैः।।41।। आराधनासमर्थश्चेद् दद्यादर्चनसाधनम्। श्रीराम की आराधना के साधन पत्र, पुष्प, फल आदि जो दान करते हैं उनके पुण्य का फल सुनें। कुरुक्षेत्र, गंगा के तट, प्रयाग क्षेत्र और पुरुषोत्तम क्षेत्र में हजारों गाय दान करने का फल जो मिलता है, वही समग्र फल वह भी प्राप्त करता है, वही समग्र फल वह भी प्राप्त करता है। पूजा की सभी वस्तुएँ अथवा कुछ वस्तुएँ जो प्रतिदिन अथवा कभी कभी अथवा अधिक मात्रा में पत्र-पुष्प आदि जो दान करते हैं, उनके लिए अन्य स्थलों पर विहित दान और तीर्थ में निवास करना सब व्यर्थ है। स्वयं आराधना करने में जो असमर्थ हों वे आराधना के साधनों का दान करें। ¹प्रदातुं वै नरान् कोऽस्ति कुर्यादर्चनदर्शनम्।।42।। निस्ताराय तदेवालं भवाब्धेः मुनिसत्तम। नैकं च यस्य विद्येत सोऽधो यात्येव नान्यथा।।43।। अथवा मनुष्य को दान करने में भी भला कौन समर्थ है! इसलिए आराधना का दर्शन ही करना चाहिए। संसार के समुद्र में पार लगाने के लिए वही पर्याप्त है। इनमें से जो एक भी नहीं करते उनका अधःपतन निश्चित है। नियमव्यतिरेकेण यः कुर्याद् देवतार्चनम्। किञ्चिदप्यस्य न फलं भस्मनीव हुतं मुने।।44।। योऽर्चयेद् विधिवद् भक्त्या परानीतैश्च साधनैः। पूजा फलार्द्धमेवास्य न समग्रफलं लभेत्।।45।।
- घ. में अनुपलब्ध।
(84) ________ अगस्त्य-संहिता नियमों के विपरीत जो देवता की अर्चना करते हैं, उन्हें राख में हवन करने के समान कुछ भी फल नहीं होता है। जो विधानों के अनुसार भक्तिपूर्वक दूसरे के द्वारा लाये गये साधनों से पूजा करते हैं उन्हें आधा फल ही मिलता है; पूरा नहीं। ¹यस्तु भक्त्या प्रयत्नेन स्वयं सम्पाद्य चाखिलम्। साधनं चार्चयेद् विद्वान् समग्रफलभाग् भवेत्।।146।। यो धनव्ययमायासमविचार्यार्चयेद् हरिम्। स्वयं सम्पाद्य तत्सर्वं सवरं तत्फलं लभेत्।²147।। जो भक्तिपूर्वक स्वयं यत्न करके सभी सामग्रियों की व्यवस्था कर अर्चन करते हैं, उन्हें समग्र फल की प्राप्ति होती है। जो धन का व्यय और प्रयत्न दोनों की परवाह किए बिना श्रीहरि की आराधना स्वयं साधन जुटाकर करते हैं तथा उन्हें नैवेद्य आदि अर्पित करते हैं, वे वर के साथ सम्पूर्ण फल पाते हैं। स्वयमानीय चोत्पाद्य पूजोपकरणानि यः। पूजयेत्तद्विधेयं स्यादुत्तमं प्रार्थदं हरिम्।³148।। स्वयं लाकर और स्वयं उगाकर पूजा सामग्रियों से श्रीहरि की पूजा करते हैं वह उत्तम विधि है इससे अच्छी प्रकार प्रयोजनों की सिद्धि होती है। कलत्रपुत्रशिष्यादि⁴ तत्तत् सम्पादितं च यत्। मध्यमं चार्चनं तेन तैः सार्द्धं तत्फलं लभेत्।।149।। पत्नी, पुत्र, शिष्य आदि के द्वारा व्यवस्था किए जाने पर मध्यम प्रकार की पूजा होती है उससे आधा फल मिलता है। अन्यैः सम्पाद्य यद्दत्तं क्रयक्रीतेन तेन वा। गौणमाराधितं तेन पादमात्रफलं लभेत्।।150।। दूसरे के द्वारा व्यवस्था कर दान की गयी सामग्रियों से अथवा खरीदकर की गयी पूजा तुच्छ होती है इससे चौथाई फल ही मिलता है। परारोपितवृक्षेभ्यः पुष्पाणानीय वार्चयेत्। अविज्ञाप्यैव तैर्यस्तु निष्फलं तस्य पूजनम्।।151।। दूसरे के द्वारा लगाये गये वृक्ष से बिना सूचना दिये हुए फूल लाकर जो पूजा करते हैं वह निष्फल होती है।
- चार चरण तक 'क' में अनुपलब्ध। 2. घ. सर्वं तत् सफलं भवेत्। 3. घ. मुनिसत्तम। 4. घ. नियोज्य यत्र शिष्यादि।
_________________ चतुर्दशोऽध्यायः (85) राममाराध्य संस्थाप्य संनिरुध्य च मुद्रया।¹ प्रतिष्ठाप्यार्चयेद् विष्णुं न च तन्निष्फलं भवेत् ।।52।। मुद्रा के द्वारा श्रीराम का आराधना स्थापन एवं संनिरोधन कर प्रतिष्ठित कर विष्णु की पूजा करते हैं तो वह निष्फल नहीं होता। ततो² मुद्रान्तराण्यैव दर्शयिच्चैव सादरम्। प्रसाद्य सम्मुखीकृत्य सन्निधाप्य च पूजयेत् ।।53।। सकलीकृत्य प्राणांस्तु तदानीमिन्द्रियाण्यपि। यद्येवं पूजयेद्रामं भुक्तिं मुक्तिं च विन्दति ।।54।। इसके बाद आदरपूर्वक दूसरी मुद्राएँ भी दिखावें। प्रसादजी, सम्मुखीकरणी और सन्निधापनी मुद्रा दिखाकर पूजा करें। उनके प्राण को सकलीकरण कर उनकी इन्द्रियों का भी सकलीकरण करें। यदि इस प्रकार श्रीराम की पूजा करें तो भुक्ति और मुक्ति दोनों प्राप्त करते हैं। इत्यगस्त्यसंहितायां परमरहस्ये रामपूजाविधिर्नाम त्रयोदशोऽध्यायः ।। अथ चतुर्दशोऽध्यायः अगस्त्य उवाच विधिवत् संस्कृतेप्यग्नौ देवमावाह्य पूजयेत्। पूर्वोक्तेनैव विधिना साङ्गावरणवाहनम्³ ।।1।। विधानपूर्वक मार्जन, उल्लेखन आदि से संस्कार की गयी अग्नि में देवती का आवाहन कर पूर्वोक्त विधि से अंग और आवरण के साथ पूजन करें। विधिं तस्य प्रवक्ष्यामि येनेष्टं साध्यतेऽखिलम्। विहितं येऽनुतिष्ठन्ति त एव फलभाजनाः ।।2।। अब इसकी विधि कहूँगा, जिससे सब कुछ सिद्ध होता है। जो विधानपूर्वक अनुष्ठान करते हैं, वे ही सभी इच्छित फलों के भागी होते हैं, अन्यथा नहीं।
- घ. इसके बाद घ. में प्रसाद्य सम्मुखीकृत्य इत्यादि चार चरण हैं।। 2. घ. तत्तन्मुद्रा°। 3. घ. साङ्गावरणमन्वहम्। Rarest Archiver
(86) अगस्त्य-संहिता
सर्वेषामीप्सितार्थानामन्यथा वै तथा नहि। न्यायार्जितैः साधनैश्च दानहोमार्चनादिकम् ।।३।। कुर्यान्न चेदधो याति भक्त्या कुर्वन्नपि द्विजः। न्यायपूर्वक स्वयं अर्जित साधनों से दान, होम, अर्चना आदि करें, नहीं तो भक्तिपूर्वक इन्हें करते हुए भी अधोगति प्राप्त करते हैं। भूमिस्थानं समीकृत्य षट्चतुष्काङ्गुलोत्तरम्¹ ।।४।। तावत् तन्निखनेदन्तश्चतुष्कोणन्तथान्ततः। दिशि दिश्यन्तरञ्चैव पार्श्वस्थलचतुष्टयम् ।।५।। भूमि को समतल कर दश अंगुल ऊँची वेदिका बनाएँ। तब अन्दर की ओर चौकोर खनें। तब चारो दिशाओं और कोणों में भी चार पार्श्व बनावें। (इस प्रकार नीचे अष्टकोण बन जाएगा।) एवं सलक्षणं² कृत्वा बहिः कुर्याच्च मेखलाः। द्वादशाष्टचतुर्मानां स्वाङ्गुलैश्च क्रमान्मुने।।६।। एवमुत्सेध आयामश्चतुराङ्गुलमेव तत्। आयामोत्सेधरूपेण चतुष्काधिक्यतः क्रमात् ।।७।। चतुष्कत्रितयं कुर्यादेवं हि मेखलाक्रमः। इस प्रकार के लक्षणों से कुण्ड बनाकर तब बाहर तीन मेखला क्रमशः बारह अंगुल आठ अंगुल और चार अंगुल मान से बनावें। इस प्रकार उठाकर विस्तार चार अंगुल ही रखें। चौड़ाई और ऊँचाई दोनों क्रमशः चार-चार अंगुल क्रमशः होगी। चार अंगुल की तीन मेखला बनावें; यही क्रम है। कुण्डस्य पश्चिमे भागे योनिं कुर्यात्सलक्षणाम् ।।८।। अश्वत्थपत्रसदृशीं कुण्डे किञ्चित् प्रतिष्ठिताम्। षट्चतुर्द्वयङ्गुलाक्षा³ च क्रमान्निम्ना भवेत्पुनः।।९।। विस्तारेणापि सा योनिर्भवत्येव दशांगुला।⁴ मूलं नालं तथाग्रं च व्युत्क्रमात् षट्चतुस्त्रिकम् ।।१०।। तन्मानाङ्गुलमानं स्यादेतत् कुण्डस्य लक्षणम्। एकहस्तस्य कुण्डस्य⁵ प्रकारोऽयं प्रकाशितः ।।११।।
- घ. षट्चतुर्द्ध्वङ्गुलोत्तरम्। 2. घ. सुलक्षणम्। 3. घ. षट्चतुस्त्र्यङ्गुला सापि। 4. योनिर्भवेत् पञ्चदशाङ्गुला। 5. घ. चतुष्कोणैकहस्तस्य।
चतुर्दशोऽध्यायः (87) कुण्ड के पश्चिम भाग में लक्षण के अनुसार योनि बनावें। पीपल के पत्ते के आकार की योनि कुण्ड पर प्रतिष्ठित करनी चाहिए। छह अंगुल के बाद चार अंगुल, तब दो अंगुल, इस प्रकार क्रमशः योनि आगे की ओर ढालवाली होनी चाहिए। चौड़ाई और दस अंगुल लम्बाई की योनि होती है। योनिमूल में अवस्थित गाल और योनि के अग्रभाग की ऊँचाई नीचे के क्रम में छह अंगुल, चार अंगुल तथा तीन अंगुल की होनी चाहिए। यह कुण्ड का लक्षण है। यह एक हाथ लंबाई- चौड़ाईवाले कुण्ड का प्रकार स्पष्ट किया गया है। द्विहस्तकुण्डमध्येवं द्विगुणीकृत्य मेखलाम्। नाभेरप्यथवा कुण्डमेकमेखलकं भवेत् ।।12।। संक्षेपकर्मसु तथा वर्त्तुलं स्यात् सुलक्षणम्। इसी प्रकार दो हाथ के कुण्ड में मेखला तथा नाभि दो गुनी होगी। अथवा संक्षिप्त कर्म में एक मेखलावाला कुण्ड हो सकता है तथा सभी लक्षणों से सम्पन्न वर्त्तुल कुण्ड का भी निर्माण किया जा सकता है। चतुष्कोणैकहस्तस्य मध्ये कुण्डस्य चाङ्कनम् ।।13।। मध्यान्निधाय सूत्रेण भ्रामयेदभितो मुने। कोणेषु यच्चाप्यधिकं तद्दिक्ष्वेव विनिर्दिशेत् ।।14।। इदञ्च वर्त्तुलं कुण्डं ततः स्यादर्धचन्द्रकम् । दिशि चोत्तरतः कुण्डकोणभागादर्द्धभागतः ।।15।। बहिरैन्द्र्या च वारुण्या यत्नान्मध्ये तु लांछयेत्। संस्थाप्य भ्रामयेदेतदर्द्धचन्द्रं शुभ्रप्रदम् ¹ ।।16।। एक हाथ के चौकोर भूमि के मध्य में कुण्ड का अंकन करना चाहिए। मध्यभाग से एक धागा लेकर उसे चारो ओर घुमावें। कोणों में और दिशाओं में चिह्न लगावें। यह वर्त्तुल कुण्ड कहलाता है। इसके बाद अर्द्धचन्द्र कुण्ड भी होता है। कुण्ड में उत्तर की ओर से कोण के आधे भाग पर पुनः पूर्व दिशा से पश्चिम दिशा तक सूत्र रखकर मध्य में स्थापित कर घुमावें। यह अर्द्धचन्द्राकार कुण्ड शुभ फल देता है। (महामहोपाध्याय मधुसूदन ओझा ने 'यज्ञमधुसूदन' नामक ग्रन्थ में वर्त्तुल कुण्ड बनाने की तीन विधियाँ दी हैं, जिनमें एक विधि के अनुसार चौकोर क्षेत्र में
- घ. सुशोभनम् ।
(88) अगस्त्य-संहिता एक कोण से दूसरे कोण तक की दूरी का आधा कोणार्द्ध कहलाता है। उस कोणार्द्ध का आठवाँ भाग के बराबर की दूरी पर चतुष्कोण में चिह्न लगा लेना चाहिए। तब उन चिह्नों से होकर एक वृत्त बनाना चाहिए। यह वर्तुल कुण्ड कहलाता है। अगस्त्य-संहिता का भी यहीं मत प्रतीत होता है, किन्तु इस स्थल पर पाण्डुलिपि ‘क’ अपठनीय है।) मेखलास्वष्टपत्राणि वर्तुलस्य तपोनिधे। पद्माकारं भवेदेतत् कुण्डं सर्वफलप्रदम्।¹।17।। वर्तुल कुण्ड की मेखलाओं में आठ दल होंगे। इस प्रकार वह कुण्ड कमल के आकार का होगा, जो सभी प्रकार से फलदायक है। शतहोमे रत्निमात्रं तदूर्ध्वं मुष्टिसम्मितम्। सहस्रेप्ययुतेऽप्यर्द्धलक्षे लक्षेऽपि च क्रमात्।।18।। पञ्चपञ्चाङ्गुलाधिक्याद् वर्द्धतेऽरत्निमात्रतः। कुण्डञ्च कोटिहोमेऽपि तदूर्द्धर्वेऽपि कराष्टकम्।।19।। सौ आहुति वाले होम में मुट्ठी बँधे हाथ की लम्बाई के बराबर, इसके ऊपर मुट्ठी खुले हाथ की लम्बाई के बराबर कुण्ड बनावें। हजार, दश हजार और उससे ऊपर लाखों आहुति के लिए क्रमशः मुट्ठी बँधे हाथ की लम्बाई से पाँच पाँच अंगुल क्रमशः बढ़ाते हुए एक हाथ तक बढ़ावें इस प्रकार कोटि होम तक के लिए कुण्ड बनावें। उसके ऊपर आहुति संख्या होने पर आठ हाथ की लंबाई-चौड़ाई वाला कुण्ड बनावें। मुष्ट्यरत्निमिते कुण्डे दशाद्वादशसंख्यया। क्रमेणैवाङ्गुलानां च प्रथमा मेखला भवेत्।।20।। मुट्ठी खोलकर एक हाथ की लम्बाई वाले कुण्ड में बारह अंगुल तथा बन्द मुट्ठी वाले हाथ की लम्बाई के परिमाण के कुण्ड में बारह अंगुल की पहली मेखला होती है। द्वितीये च तृतीये च त्र्यंशे त्र्यंशे विनिर्दिशेत्। सर्वेषामेव कुण्डानामह्लिद्वयवृद्धितः।।21।। प्रथमा मेखला कार्या त्र्यंशेऽप्यन्या तु पूर्ववत्। कण्ठोऽष्टयवमात्रः स्यात् कुण्डे च करमात्रके।।22।। कुण्डे षड्यवमात्रः स्यात् कण्ठो रत्निप्रमाणके। तथा चतुर्यवैः कण्ठो मुष्टिमात्रे विनिर्दिशेत्।।23।।
- घ. में अनुपलब्ध। Rarest Archiver
चतुर्दशोऽध्यायः (89) दूसरी और तीसरी मेखला भी एक तिहाई भाग में होनी चाहिए। सभी प्रकार के कुण्डों में दो-दो अंगुलियाँ बढ़ाकर मेखला बनानी चाहिए। पहली मेखला एक तिहाई भाग में बनावें और अन्य मेखलाएँ पूर्ववत् परिमाण में बनाएँ। एक हाथवाले कुण्ड में कण्ठ का भाग (योनि का अग्रभाग, जो कुण्ड में निराधार स्थापित किया जाये) आठ यव के परिमाण का होगा तथा रत्निप्रमाण (मुट्ठी बँधा हाथ) के कुण्ड में कण्ठ छह यव के परिमाण का होगा तथा मुट्ठी वाले भाग से रहित एक हाथ के प्रमाण वाले कुण्ड में चार यव के परिमाण का कण्ठ बनावें। सर्वेषु कुण्डमानेषु चाङ्गुलिद्वयवृद्धितः। कुण्डो यत्नेन कर्तव्यो भुक्तिमुक्तिफलेप्सुभिः ।।२४।। भोग और मोक्ष की इच्छा रखनेवाले सभी प्रकार के कुण्डों में दो-दो अंगुल बढ़ाकर यत्नपूर्वक कुण्ड का निर्माण करें। सात्त्विकी राजसी चैव तामसी च क्रमाद् भवेत्। प्रथमा च द्वितीया च तृतीया मेखला स्मृता ।।२५।। कुण्ड तीन प्रकार के होते हैं- सात्विकी, राजसी एवं तामसी तथा मेखला भी प्रथमा, द्वितीया एवं तृतीया के नाम से तीन होतीं हैं। योनिः कुण्डानुसारेण कुर्यादाद्यन्तमध्यतः। उक्ताङ्गुलिप्रमाणेण द्विगुणाञ्च चतुर्गुणाम् ।।२६।। होमसंख्यानुविधिना सर्वलक्षणलक्षितम् । स्रुवं बाहुप्रमाणेण होमार्थं विदधीत वै ।।२७।। कुण्ड के परिमाण के अनुसार कुण्ड की योनि आरम्भ, अन्त और मध्य भाग का निर्माण पूर्वोक्त अंगुल के प्रमाण से दो दुना या चारगुना करें। होम- संख्या के अनुसार सभी लक्षणों से सम्पन्न मेखलाओं का निर्माण करें। होम के लिए एक हाथ का स्रुव बनावें। चतुरस्रं विधायादौ सप्तपञ्चाङ्गुलं क्रमात्। तृतीयांशेन गर्तः स्यादन्तर्वृत्तशोभितम् ।।२८।। खनित्वा समं तिर्यगूर्ध्वंवतदधः शोधयेद् बहिः। चतुर्थाशं चाङ्गुलस्य शेषं त्वर्द्धं¹ तदन्ततः ।।२९।।
- घ. शेषाच्चार्द्धम्।
(90) अगस्त्य-संहिता कुण्ड निर्माण के लिए सबसे पहले समतल भूमि पर बारह अंगुल पर्यन्त चौकोर गड्ढा बनावें। इसके बाद एक तिहाई भाग वृत्ताकार बनावें। इसके बाद टेढ़ा कर ऊपर की ओर खनें। इस क्रम में पहले एक अंगुल के चौथाई भाग तक खनें तथा अन्त तक आधा अंगुल टेढ़ा खनें। रम्यां च मेखलां खाते शिष्टेनार्द्धेन कारयेत्। कुर्यात् त्रिभागविस्तारां चाङ्गुष्ठेन समायुताम्।।30।। सार्द्धमङ्गुष्ठकं चास्य तदग्रे तु मुखं भवेत्। चतुरङ्गुलविस्तारं पञ्चाङ्गुलमथापि वा।।31।। द्वित्रयाङ्गुलकं तस्य मध्यान्तं च शोभनम्। सुषिरं कुण्डदेशे स्याद् विशेद्यावत्कनीयसी।।32।। शेषं दण्डं च कर्त्तव्यं यथारुचि विचित्रकम्।1 तब शेष भाग के बीच में सुन्दर मेखला बनानी चाहिए। यह मेखला तीन अंगूठे की चौड़ाई लेकर बनावें। तब इसके आगे डेढ़ अंगूठे का मुख बनावें। यह मुख चार अंगुल अथवा पाँच अंगुल चौड़ा होगा। दो अथवा तीन अंगुल चौड़ा इसका मध्य भाग तथा अन्तिम भाग होगा, जिसे वह देखने में सुन्दर लगे। कुण्ड के समीप एक छिद्रयुक्त नालिका रखें, जिनमें कनिष्ठा अंगुली घुस सके। एक डंडा भी अपनी रुचि के अनुसार रंग-बिरंगा रखें। चतुःकोणसमायुक्तो हस्तमात्रः स्रुवो भवेत्।।33।। चतुष्कं शोभनं वृत्तं द्व्यङ्गुलं विदधीत वै। यथल्पपङ्के गोः पादं रुचिरं दृश्यते तथा।।34।। एक हाथ की लम्बाई वाला चौकोर स्रुव होता है। दो अंगुल परिमाण के सुन्दर चार वृत्त दो अंगुल के परिमाण में रहना चाहिए। जैसे थोड़े कीचड़ में गाय के खुर की सुन्दर आकृति बन जाती है, उसी प्रकार स्रुव का आकार होना चाहिए। पलाशपत्रे निच्छिद्रे रुचिरे स्रुकुस्रुवौ मुने। विदध्याद् वाश्वत्थपत्रे संक्षिप्ते होमकर्मणि।।35।। संक्षिप्त हवन में बिना छिद्र वाले पलाश अथवा पीपल के पत्ते का उपयोग स्रुव एवं स्रुक् के अनुकल्प में करना चाहिए।
- घ. यथाकिञ्चिद विचित्रकम्।
चतुर्दशोऽध्यायः (91)
ततः कुण्डस्थलं सम्यग् गोमयेनोपलिप्य च। शालितण्डुलचूर्णैश्च नीलपीतसितासितैः ।।३६।। शोभोपशोभासंयुक्तं मण्डलं व्यक्तमुज्ज्वलम् । कुण्डस्य सन्निधौ¹ सम्यग् वायव्ये विदधीत वै ।।३७।। तब कुण्ड के स्थल को भलीभाँति गाय के गोबर से लीप कर चावल के नील, पीला, सफेद और काला पीठा से विभिन्न प्रकार से सजाकर स्पष्ट एवं चमकीला यन्त्र कुण्ड के समीप वायुकोण (पश्चिमोत्तर कोण) में लिखें। तत्राष्टपत्रं कमलं वृत्तत्रयपरिवृतम्। सोमसूर्याग्निबिम्बे द्वे तथा कुर्याद् विचक्षणः ।।३८।। वहाँ अष्टदल कमल लिखें, जो तीन वृत्तों से घिरा हुआ हो तथा उसपर चन्द्रमा, सूर्य और अग्नि के दो बिम्ब बनाएँ। चतुरस्रं बहिस्तस्य षट्कोणं कर्णिकान्तरे। पीतं पूर्वे सितं देयं पश्चिमेऽप्युत्तरे तथा ।।३९।। रक्तं तु दक्षिणे कृष्णं पाटलं वह्निसंस्थितम् । निर्ऋति नीलवर्णन्तु वायव्ये धूम्रवर्णकम् ।।४०।। ऐशे गौरं विनिर्दिष्टमष्टपत्रे त्वयं क्रमः। इसके बाहर चतुर्भुज बनाएँ तथा कर्णिका (मध्यभाग) में षट्कोण बनाएँ। शङ्खचक्रगदापद्मं धनुर्बाणांश्च² मण्डले ।।४१।। विलिखेद् वर्णकैः सम्यक् तत्र रामं समर्च्चयेत्। शंख, चक्र, गदा, पद्म, धनुष और बाण इस षट्कोण में सुन्दर ढंग से बनाएँ और वहाँ श्रीराम की अर्चना करें। कुण्डान्तरेष्वेवमेवाराध्य श्रद्धया मुने ।³।४२।। आदौ वह्निमुखं कुर्यादुपविष्टः सुविष्टरे। दूसरे कुण्डों में भी इसी प्रकार श्रद्धा से आराधना कर सुन्दर विष्टर (25 कुशों से निर्मित अधःकेश पुंज) पर बैठकर सबसे पहले अग्निमुख करें। प्राणानायम्य मनसा जपेन्मन्त्रमनन्यधीः ।।४३।। यावन्मरुत् संचरति सर्वाङ्गेष्वपि निश्चलः।
- घ. दक्षिणे। 2. घ. धनुर्बाणानि । 3. घ. शृणुयान्मुने । Rarest Archiver
(92) अगस्त्य-संहिता प्राणायाम कर मन ही मन एकाग्र होकर मन्त्र का जप तब तक करें, जबतक कि वायु सभी अंगों में निश्चल होकर संचरण न करने लगे। सङ्कल्प्य स्थण्डिले कुण्डे कृत्वा लेखाश्च मध्यमाः ।।44।। ऊर्ध्वं तिर्यक् तिस्र एव वह्निमत्रादधीत वै। प्रोक्ष्योपसार्य्य¹ तत्पश्चाद्दत्वा विष्टरमादरात् ।।45।। स्थण्डिल अथवा कुण्ड में संकल्प कर मध्य में तीन रेखाएँ नीचे से ऊपर की ओर तथा तीन दायें से बाये आलेखन करें। तब यहाँ अग्नि का आधान करें। इसके बाद अग्नि का प्रोक्षण और अपसारण कर कुश से परिस्तरण करें। लक्ष्मीमृतुमतीं तत्र प्रभोर्नारायणस्य च। ग्राम्यधर्मेण सञ्जातमग्निं तत्र विचिन्तयेत् ।।46।। वहाँ लक्ष्मी को रजस्वला के रूप में ध्यान करें और प्रभु नारायण के संयोग से उत्पन्न अग्नि का स्मरण करें। प्रमथ्य विधिनैवाग्निमाहिताग्नेर्गृहादपि। आनीय चादधीतात्र कुशैः प्रज्वाल्य यत्नतः ।।47।। अग्नि का विधानपूर्वक मन्थन कर अथवा आहिताग्नि के घर से लाकर कुश से अग्नि प्रज्वलित कर यहाँ आधान करें। सम्प्रोक्ष्य याज्ञिकैः काष्ठैः पुनः प्रज्वालयेदपि। प्राणायामन्ततः कुर्यात् परिस्तार्य कुशाङ्कुरैः ।।48।। यज्ञीय काष्ठ से प्रोक्षण कर पुनः उसे प्रज्वलित करें, तब कुश से परिस्तरण कर प्राणायाम करें। स्वगृह्योक्तविधानेन वासुदेवादिभिर्मुने। पात्राण्यासाद्य विधिवदिध्ममन्त्रेण तन्त्रवित् ।।49।। हे मुनि सुतीक्ष्ण! मन्त्र के ज्ञानी अपनी शाखा के गृह्यसूक्त की विधि के अनुसार अथवा वासुदेव आदि की पद्धति के अनुसार पात्रों को यथास्थान विधानपूर्वक इध्ममन्त्र से रखें। तान्यवेक्ष्य पवित्रेण चोत्तमानि विधाय च। पुनः प्रोक्ष्यानयेत् पात्रं परिपूर्य शुभाम्बुना ।।50।।
- घ. प्रोक्ष्य प्रसार्य्य।
चतुर्दशोऽध्यायः (93) पवित्री कुश हाथ में रखकर उन पात्रों का अवेक्षण (अवलोकन) कर उन्हें उत्तान स्थापित कर फिर प्रोक्षण (धोकर) कर पात्रों को शुभ जल से भरकर रखें। कृत्वा कुशपवित्रं च तत्रोत्पूर्य निधाय तत्। दिश्युत्तरस्यां तत्पात्रं प्रणीतेत्युच्यते बुधैः।।५१।। कुश की दो पवित्री का निर्माण जल भरे पात्र के ऊपर रखें। उत्तर दिशा में रखे गये उस पात्र को प्रणीता कहा जाता है। तत्रार्चयेत् प्रभुं विष्णुं ब्रह्माणं ब्रह्मणार्चयेत्।२ आज्यं२ संस्कृत्य विधिवत् स्रुक्स्रुवावोमिति ब्रुवन्।।५२।। वहाँ प्रभु विष्णु तथा ब्रह्मा की अर्चना ब्रह्मसूक्त से करें तथा घृत का संस्कार तापन एवं उद्धरण विधि से कर ॐकार का उच्चारण करते हुए स्रुक् और स्रुव का संस्कार करें। गर्भाधानादिकं वह्नेर्विवाहान्तं समाचरेत्। अष्टावष्टौ च तारेण चेकैकस्य तु कर्मणः।।५३।। तब अग्नि के गर्भाधान से विवाह पर्यन्त की विधि करें। इनमें आठ आठ बार ॐकार का उच्चारण प्रत्येक विधि में करें। जुहुयादर्चिते वह्नौ वौषडन्तं समाप्य च। कर्मान्तरं समारभ्य तदप्येवं समापयेत्।।५४।। इस प्रकार पूजित अग्नि में वौषट् से समाप्त कर हवन करें। अन्य कर्म भी प्रारम्भ कर इसी प्रकार समाप्त करें। एवमग्नौ सुसम्पन्ने वैष्णवं श्रपयेच्चरुम्। इध्माधानादग्निमुखावाज्यभागौ जुहुयात् पुनः।।५५।। इस प्रकार सम्यक् प्रकार से अग्नि-पूजन समाप्त कर विष्णु को समर्पित करने योग्य चरु पकायें। तब अग्नि का आधान से अग्निमुख कर्म पर्यन्त कर दोनों आज्यभाग हवन करें। साङ्गावाहनमन्त्रान्नौ पूजयेद्रघुनन्दनम्।३ समिदाज्यचरूणां च प्रत्येकं षोडशाहुतीः।।५६।। जुहुयान्मूलमन्त्रेण परिवारेभ्य एव च। तिस्रो विनायकादिभ्यः सर्वेभ्योऽप्याहुतीर्मुने।।५७।। १. घ. ब्राह्मणोऽर्चयेत्। २. घ. कामं। ३. घ. पूजयेद्रघुनायकम् Rarest Archiver
(94) अगस्त्य-संहिता मूल मन्त्र से परिवार देवताओं को आहुति देकर गणेश आदि सभी देवताओं को आहुति दें। द्वाराङ्गपरिवारेभ्यः सुरेभ्यो जुहुयात्पुनः। हुत्वाज्येनाहुतीस्तत्तत् प्रदद्यात्तत्तदाप्तये ।।58।। द्वारदेवता, अंगदेवता, परिवार देवता एवं अन्य देवताओं को भी आहुति देकर पुनः घृत से उन उन देवताओं की कृपा पाने के लिए आहुतियाँ दें। तत्तद्द्द्रव्यैश्च जुहुयात् सर्वं चारुमनोहरैः। द्वारपीठसुरेभ्यश्च हुत्वादौ जुहुयात्ततः ।।59।। अङ्गादिवैष्णवान्तेभ्यः तिस्र आज्याहुतीः पृथक्। देवताओं के लिए विहित उन मनोहर द्रव्यों से द्वारदेवता एवं पीठदेवता को आहुति देकर तब हवन करें। अङ्ग देवताओं से आरम्भ कर विष्णु-भक्तों तक तीन तीन आहुतियाँ पृथक् पृथक् दें। ततः स्विष्टकृतं हुत्वा घृतेन मुनिसत्तम ।।60।। जलेन विधिना सम्यक् परिषिञ्च्य¹ समं ततः। हे मुनिश्रेष्ठ सुतीक्ष्ण! तब स्विष्टकृत् होम घृत से करें और विधानपूर्वक जल से परिषेचन करें। प्रणीतामार्जनं कृत्वा दद्याच्च ब्रह्मदक्षिणाम् ।।61।। स्वस्ववित्तानुसारेण लोभमोहविवर्जितः। ततो ब्रह्माणमुद्वास्य ब्राह्मणान्भोजयेत्तथा ।।62।। प्रणीतापात्र को खँघाल कर अपने विभव के अनुसार लोभ और मोह का परित्याग करते हुए ब्रह्मा को दक्षिणा दें। तब ब्रह्मा को विसर्जित करें और ब्राह्मणों को भोजन कराएँ। अग्निमध्यगतं देवं पुनः स्वात्मनि योजयेत्। एकीभूतं विचिन्त्येव वाचयेत् स्वस्तिवाचनम् ।।63।। आशीर्वचोभिर्विदुषामेध्यमानः सुखी भवेत्। तब अग्नि के मध्य में स्थित देव श्रीराम का आधान अपने हृदय में करें और श्रीराम के साथ एकाकार हो जाने का चिन्तन करें। तब स्वस्तिवाचन कराएँ। विद्वानों के आशीर्वचन से यजमान वृद्धि करता हुआ सुखी रहता है।
- घ. चाभिषिञ्च्य।
हुतशेषं ततः प्राश्य कुक्कुटाण्डप्रमाणकम् ।। ६४ ।। मन्त्रितं रामगायत्र्या ततस्तस्मै बलिं हरेत् । सन्निधावपि देवस्य बाह्यान्तर्दिक्षु चान्धसा ।। ६५ ।। तब हवन करने से शेष बचे पदार्थ में से मुर्गी के अंडे बराबर मात्रा में लेकर रामगायत्री से अभिमन्त्रित कर भक्षण करें। तब देवता के समीप, बाहर- भीतर एवं सभी दिशाओं में लिए भात (अन्धस्) से बलि दें। नित्ये नैमित्तिके काम्येऽप्येतदग्निमुखं स्मृतम् । सर्वत्राभ्युदयश्राद्धमङ्कुरारोपणं तथा। आदावन्ते प्रकुर्वन्ति कर्माण्यभ्युदयार्थिनः ।¹।। ६६ ।। नित्य, नैमित्तिक एवं काम्य तीनों कर्मों में इस प्रकार हवन स्मृतियों में कहा गया है। इन सभी कर्मों के आरम्भ एवं अंत में आभ्युदयिक श्राद्ध और अंकुरारोपण भी उन्नति के आकांक्षियों के लिए स्मृत है। इत्यगस्त्यसंहितायां परमरहस्ये कुण्डमान- होमान्तादिविधिप्रकरणं नाम चतुर्दशोऽध्यायः ।। १४ ।। अथ पञ्चदशोऽध्यायः अगस्त्य उवाच अथ प्रयोगं² वक्ष्यामि चतुर्णामिष्टदं³ मुने । मन्दभाग्योऽपि येनेष्टमायासेनैति वांछितम् ।। १ ।। अगस्त्य बोले- हे मुनि सुतीक्ष्ण, अब चारो वर्णों को वांछित फल देने वाला प्रयोग बतलाता हूँ, जिसे करने मन्दभाग्य भी इच्छित वस्तु प्राप्त कर लेता है। निधाय विधिवत्सम्यगग्निभागान्तमुक्तवत् । ततोऽग्नौ देवमावाह्य पूजयेदुपचारकैः ।। २ ।। पञ्चभिर्वा षोडशभिः पूज्योपकरणैः पृथक् । पलाशश्वत्थखदिरोदुम्बराम्रवटेन्धनैः ।। ३ ।। अग्निं प्रज्वालयेत् सम्यग्याज्ञिकैर्वाथ वेन्धनैः । तत्रैव पूजयेत् सम्यग् जुहुयादपि राघवम् ⁴ ।। ४ ।। १. घ. कर्मणोऽभ्युदयार्थतः। २. घ. प्रयोगान्। ३. घ. चतुर्णामिष्टदान्। ४. घ. माधवम्।
(96) अगस्त्य-संहिता
लक्षं तदर्द्धमथवा जपित्वा तद्दशांशतः। तिलैर्वामलकैर्हुत्वा¹ यद्यदिष्टं तदश्नुते।।५।। विधानपूर्वक पीछे कही गयी विधि से होमकर्म पर्यन्त कर अग्नि में देवता का आवाहन कर पाँच या सोलह उपचारों से पृथक्-पृथक् पूजा कर पलाश, पीपल, खैर, गूलर, आम, बड़, या अन्य यज्ञीय की समिधा से अग्नि प्रज्वलित करें। वहीं 'श्रीराम की पूजा सम्यक् रूप से कर एक लाख अथवा पचास हजार जप कर उसका दशांश हवन करें। तिल से अथवा आँवला से हवन कर अभीष्ट वस्तु की प्राप्ति होती है। बिल्वप्रसूनैरैश्वर्यमर्चितेऽग्नौ हुतैर्भवेत्। पलाशकुसुमैर्हुत्वा मेधावी वेदविद् भवेत्।।६।। दूर्वाभिश्च गुडीचीभिः² प्रत्येकमाप चाक्षतैः। निरामयोऽपि दीर्घायुर्भवत्येव तपोधन³।।७।। पूजित अग्नि में बेल के फूल से हवन करने पर ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है। पलाश के फूल से हवन कर वह मेधावी और वेद ज्ञानी होता है। दूर्वा या गुरुच के साथ अक्षत मिलाकर हवन करने से यजमान नीरोग और दीर्घायु होते हैं। सम्यक् चन्दनतोयेन प्रत्यग्रैश्च समुक्षितैः। जातीप्रसूनैर्हुत्वा तु राजानं वशमानयेत्।।८।। चन्दन के जल से सुगन्धित खिलेहुए तथा उचित रीति से तोड़े गये ताजे जूही के फूल से हवन कर राजा को वश में करे। ध्यात्वा च मन्मथं रामं⁴ सीतामपि रतिं स्मरेत्। सर्ववश्यप्रयोगेषु जपहोमादिकर्मसु।।९।। श्रीराम का कामदेव के रूप में तथा सीता को रति के रूप में सभी वशीकरण के प्रयोग में, जप होम आदि में स्मरण करें। रामं नवोपयन्तारं स्मरेणाराध्य⁵ भक्तितः। उपैति सदृशीं कन्यां लाजहोमेन साधकः।।१०।। कामबीज (क्लीं) से नव विवाहित श्रीराम की भक्तिपूर्वक आराधना कर धान के खील से हवन करने से साधक श्रीसीता के समान कन्या पत्नी के रूप में प्राप्त करता है।
- घ. कमलैर्हुत्वा। 2. घ. गुलूचीभिः। 3. घ. तपोनिधे। 4. घ. ध्यात्वापि राघवं कामं। 5. घ. स्मरन्नाराध्य।
पञ्चदशोऽध्यायः (97) वाञ्छितं फलमाप्नोति हुत्वा रक्तोत्पलैर्नवैः । हुत्वा नीलोत्पलैः सम्यग् वशयेदखिलं जगत् ।।11।। ताजे लाल कमल से हवन कर इच्छित फल प्राप्त करता है तथा नीलकमल से हवन कर समग्र संसार को वश में करता है। रामं विधिवदाराध्य ज्वलितेऽग्नौ प्रयोगवित्। मधुरत्रययुक्तेन पायसेन हुतेन तु ।।12।। सर्वाधिपत्यं वैदुष्यं भवत्येव न संशयः। तिलैश्च तण्डुलैराज्यैर्हुत्वा लोकस्य पूज्यताम् ।।13।। प्रज्वलित अग्नि में श्रीराम की विधिपूर्वक आराधना कर प्रयोग जानने वाला तीन मधुर (मधु, गुड़ एवं मिसरी) मिले खीर से हवन कर सभी पर आधिपत्य और वैदुष्य प्राप्त करता है और तिल, चावल एवं घृत से हवन कर संसार में पूजित होता है। आराध्य वत्सरं यावत्¹ षट्सहस्रं दिने दिने। जपेच्च जुहुयादग्नौदशांशं तद्गतान्धसा ।।14।। अयमेवान्नदो लोके सर्वेषामपि जायते। बिल्वप्रसूनैः कुमुदैस्तथा बिल्वदलैरपि ।।15।। हुत्वा स लभते लक्ष्मीमचिरान्मन्त्रसाधकः। प्रतिदिन छह हजार मन्त्र का जप कर अग्नि में पूर्वोक्त विधि उससे युक्त भात (अन्धस्) से दशांश हवन करें। यहीं इस संसार में सबके लिए अन्न देने वाला प्रयोग है। बेल का फूल, कुमुद तथा बिल्वपत्र से हवन कर मन्त्रसाधक शीघ्र लक्ष्मी प्राप्त करता है। आराध्य रामं चण्डांशुमण्डले वत्सरं मुने ।।16।। उदयास्तमने तं च जपेद्राममन्त्रमनन्यधीः।² फलं भवति तस्याशु देवानामपि दुर्लभम् ।।17।। वैदुष्येणाधिपत्येन सभ्यानामुत्तमो³ भवेत्। पूर्णिमासु निशीथिन्यामुदयास्तमयव्रतम् ।।18।।
- घ. आरात् संवत्सरं यावत्। 2. घ. उदयास्तमनं यावत् जपेन्मन्त्रमनन्यधीः। 3. घ. समानामुत्तमो।
(98) अगस्त्य-संहिता संवत्सरं प्रकुर्वीत जपहूोमादिकं विभोः। रात्रौ जपेद्दिवा होमं कुर्यादिवापरेऽहनि।।19।। ब्राह्मणान् भोजयित्वा तु व्रतमेतत् समापयेत्। सोमसूर्यात्मकं यस्तु व्रतं कुर्वीत मानवः।।20।। इह भुक्तिं च मुक्तिञ्च लभते नात्र संशयः। एक वर्ष तक सूर्य के प्रभामण्डल में उदय और अस्त के समय श्रीराम की आराधना कर एकाग्रचित्त होकर श्रीराम के मन्त्र का जप करे, तो इसका जो फल शीघ्र उसे मिलता है, वह देवताओं के लिए भी दुर्लभ है। वह विद्वत्ता और आधिपत्य से सभा में स्थित लोगों में श्रेष्ठ हो जाता है। साथ ही पूर्णिमा की रात में चन्द्रोदय एवं चन्द्रास्त के समय यह व्रत जप, होम आदि विधि में वर्ष पर्यन्त करे। रात्रि में जप कर दूसरे दिन हवन करे; ब्राह्मण भोजन कराकर यह व्रत जो मनुष्य करे, वह इस संसार में भोग और मुक्ति प्राप्त करे, इसमें सन्देह नहीं। रक्तपद्मैश्च बन्धूकैस्तथा रक्तोत्पलैरपि।।21।। अभीष्टलोकवश्यार्थो जुहुयादर्चितेऽनले। लाल कमल, बन्धूक (दुपहरिया फूल) और लाल उत्पल से अभीष्ट व्यक्ति के वशीकरण के लिए पूजित अग्नि में हवन करें। राज्यैश्वर्योपभोगार्थी गिरौ¹ लक्षमनन्यधीः।।22।। पद्मैर्बिल्वप्रसूनैर्वा दशांशं जुहुयान्मुने। राज्य और ऐश्वर्य के उपभोग का इच्छुक एकचित्त होकर पर्वत पर लाख जप कर लाल कमल या बिल्वपुष्प से दशांश हवन करे। समुद्रतीरे गोष्ठे वा लक्षजापी पयोव्रतः।।23।। पायसेनाज्ययुक्तेन हुत्वा विद्यानिधिर्भवेत्। समुद्र के तट पर अथवा गाय के घर में केवल दूध पीकर एक लाख जप कर घृत डालकर पायस से हवन कर विद्वान् होता है। परिक्षीणाधिपत्यो² यः शाकाहारी जलान्तरे।।24।। जपेल्लक्षं च जुहुयाद् बिल्वपत्रैर्दशान्ततः। तदेव पुनरायाति स्वाधिपत्यं न संशयः।।25।।
- घ. जपेत्। 2. घ. परिक्षताधिपत्यो।
पञ्चदशोऽध्यायः (99) राज्यच्युत व्यक्ति यदि केवल साग खाकर जल में खड़ा होकर एक लाख जप करे और बिल्वपत्र से दशांश हवन करे, तो उसका शासन पुनः लौट आता है; इसमें सन्देह नहीं। उपोष्य गङ्गादिजलान्तरस्थो रामं समाराध्य जपेच्च लक्षम्। हुत्वा दशांशं कमलैस्तिलैर्वा बिल्वप्रसूनैर्मधुरत्रयाक्तैः ।।२६।। राज्यश्रियं विन्दति मन्दभाग्योऽ- प्यमुष्य दास्यं वरवाञ्छितं स्यात्। १वैदुष्यमिष्टञ्च सुतादिलाभो युद्धे जयः सर्व्वसमृद्धिवृद्धिः।।२७।। गंगा आदि पवित्र नदी के जल में उपवास करते हुए खड़ा होकर श्रीराम की आराधना कर एक लाख जप करे और तीन मधुर से युक्त तिल अथवा बिल्वपत्र से दशांश हवन करे, तो मन्दभाग्य को भी श्रीराम की दासता और इच्छित वर मिले। राममाराध्य विधिवदर्चितेऽग्नौ जपेदपि। सूर्यबिम्बेऽपि तोयस्थो जुहुयादिक्षुदण्डकैः।।२८।। राज्यलक्ष्मीमवाप्नोति शरत्काले तपोधन।।२९।। जल में खड़ा होकर सूर्य विम्ब में श्रीराम की विधिवत् आराधना कर जप भी करे और शरद् ऋतु में पूजित अग्नि में ईख के टुकड़े से हवन भी करे तो हे तपोधन! सुतीक्ष्ण! वह राज्यलक्ष्मी प्राप्त करता है। वैशाखे राघवं सूर्य्ये सम्पश्यन्ननिमेक्षणः। निराहारो जपेल्लक्षं मौनी पञ्चाग्निमध्यतः।।३०।। दशांशं कमलैर्हुत्वा सार्वभौमो भवेद् ध्रुवम्। वैशाख मास में निराहार रहकर, मौन धारण कर, पंचाग्नि व्रत करते हुए (चारो ओर अग्नि जलाकर तथा पाँचवें सूर्य को देखते हुए) सूर्य में श्रीराम को अपलक देखते हुए एक लाख मन्त्र का जप करे और उसका दशांश कमल से हवन कर निश्चय सार्वभौम बन जाता है।
- क. यहाँ से दो चरण अनुपलब्ध।
(100) अगस्त्य-संहिता
माघमासे जले स्थित्वा कन्दमूलफलाशिनः¹ ।।131।। जपेल्लक्षं च जुहुयात् पायसेनार्चितेऽनले। दशांशं पुत्रपौत्राय² तच्छेषं प्राशयेत् प्रियाम् ।।132।। श्रीरामसदृशः पुत्रः पौत्रौ वाप्यस्य जायते। माघ मास में कन्द, मूल, फल खाकर व्रत करते हुए जल में खड़ा होकर जो लाख जप करे और पूजित अग्नि में पायस से दशांश हवन करे और पुत्र पौत्र आदि की प्राप्ति के लिए आहुति शेष पत्नी को विधिपूर्वक खिलावे तो श्रीराम के समान पुत्र अथवा पौत्र प्राप्त होता है। बलिष्ठैः शत्रुभिर्मन्त्री परिभूतोऽवमानितः ।।133।। तदा हनहनेत्युक्त्वा नामान्ते वैरिणो जपेत्। ध्यात्वा रघुपतिं क्रुद्धं कालानलमिवापरम्³ ।।134।। आकर्णान्तशराकृष्टकोदण्डभुजमण्डलम् । रणाङ्गणे रिपून् सर्वास्तीक्ष्णमार्गणवृष्टिभिः ।।135।। संहरन्तं महावीरमुग्रमैन्द्ररथस्थितम्⁴। लक्ष्मणादिमहावीरैर्युतं हनुमदादिभिः ।।136।। कोटिकोटिमहावीरैः शैलवृक्षकरोद्यतैः। वेगात् करालहुङ्कारभौँकारमहारवैः ।।137।। नदद्भिरभिधावद्भिः समरे रावणं प्रति। एवं ध्यात्वा निराहारो मारणाय⁵ रिपोः पुनः।38।। जुहुयात् शाल्मलीपुष्पैर्दशांशं मन्त्रसाधकः। अत्यैश्वर्यसमृद्धोऽपि⁶ न शत्रुरवशिष्यते ।।139।। यदि मन्त्र साधक शक्तिशाली शत्रु से हारकर अपमानित हुआ हो तो 'हन हन' यह कहकर शत्रु का नाम अन्त में जोड़कर जप करे। जो श्रीराम क्रोधित हैं, दूसरे कालाग्नि के समान हैं, कान तक खिंचे हुए बाण वाले धनुष हाथ में धारण किए हुए हैं तथा युद्ध-क्षेत्र में तीक्ष्ण बाणों की वर्षा से सभी शत्रुओं का संहार करनेवाले हैं; इन्द्र के रथ पर स्थित हैं। वे लक्ष्मण, हनुमान आदि महान् वीरों से घिरे हुए हैं तथा चट्टानों और वृक्षों को लेकर उठे हाथ वाले, हुंकार करते हुए युद्ध
- घ. फलाशनः। 2. घ. पुत्रपौत्रास्यै। 3. घ. कालाग्निमुव चापरं। 4. घ. महावीरं राममुग्ररथस्थितम्। 5. घ. मरणाय। 6. घ. राज्यैश्वर्य°
पञ्चदशोऽध्यायः (101) में रावण की ओर दौड़ते हुए “भो भौ” शब्द करते हुए करोड़ों करोड़ो महान् वीरों से भी घिरे हुए हैं। ऐसे श्रीराम का ध्यान कर शत्रु को मारने के लिए सेमल के फूल से दशांश हवन करे। इससे अत्यन्त ऐश्वर्य प्राप्त होता है और शत्रु शेष नहीं रहता। वैरिणं रावणं ध्यात्वा तथात्मानं रघूद्वहम्। विधाय पूर्ववत्सर्वमनायासेन मारयेत् ।।40।। येनैव संहृतः¹ कोपात् स यात्येव यमालयम्। रावण के रूप में शत्रु का ध्यान कर स्वयं को श्रीराम मानकर पूर्वोक्त विधि से जप आदि सब कुछ कर सभी शत्रुओं का अनायास मारण करे। क्रोध से जिस पर सन्धान किया जाए वह यमलोक पहुँच जाता है। सीताहरणशोकाब्धिस्तम्भीभूतमचेतनम्² ।।41।। जपेद् रघुपतिं ध्यायन् निराहारो जले वसेत्। दशांशतस्तिलैर्हुत्वा स्तम्भयेच्छत्रुसंहतिम् ।।42।। सीता के अपहरण के कारण शोक रूपी समुद्र में स्तब्ध चित्त वाले श्रीराम का ध्यान करते हुए निराहार रहकर जल में अवस्थित होकर जप करें। उसका दशांश तिल से हवन कर शत्रु के समूह का वह स्तम्भन करे। निधाय वायुबीजान्ते तन्नाम भ्रामयेति च। जपेल्लक्षं निराहारो जुहुयाच्च तिलैरपि ।।43।। रामं ध्यात्वा विषण्णञ्च सीतान्वेषणकातरम्। भ्रामयत्यचिरं साक्षाद्धेमाद्रिमपि वैरिणम् ।।44।। मन्त्र के अन्त में वायु बीज (वं) लगाकर अभीष्ट व्यक्ति का नाम बोलकर ‘भ्रामय’ यह कहे। इस प्रकार निराहार रहते हुए एक लाख जपकर तिल से हवन करें। इस पुरश्चरण में विषादग्रस्त और श्रीसीता की खोज में व्याकुल श्रीराम का ध्यान करे तो वह साक्षात् सुमेरु के समान दृढ़ शत्रु का भी ‘भ्रामण’ करे। समुद्रतीरे लङ्कायां हेमप्राकारसन्निधौ। सुग्रीवादिभिरन्यैश्च देवैर्जांम्बवदादिभिः ।।45।। उपास्यमानं सदसि ध्यात्वा रामं सलक्ष्मणम्।
- घ. तेनायं संहतः। 2. घ. स्तब्धीभूत।
(102) अगस्त्य-संहिता विभीषणायायाचिते प्रसन्नं शरणार्थिने।।46।। वरदं तु जपेल्लक्षं जुहुयात्पङ्कजैरपि। स्वस्थानमानयेच्छीघ्रं राजानमथवा प्रभुम्।।47।। समुद्र के तट पर, लंका में, सोने की अट्टालिका के समक्ष, सुग्रीव जाम्बवान् आदि से घिरे हुए, सभा में आराधित, ऐसे श्रीराम और लक्ष्मण का ध्यान करें, जिनसे विभीषण याचना कर रहे हों और जो शरण चाहनेवालों पर प्रसन्न हों। इस प्रकार ध्यान कर एक लाख जप करें और कमल के फूल से हवन करें, तो अपने निवास स्थान पर राजा अथवा प्रभु का आकर्षण कर लाने में समर्थ हों। निमील्य चक्षुषी स्नेहादुपलाप्य पुनः पुनः। प्रमोदयन्तं सहसा मोदन्तं मैथिलीं प्रियाम्।।48।। रामं ध्यात्वा जपेल्लक्षं हुत्वा रक्ताम्बुजैरपि। सम्मोहयति वेगेन राजानमथवा प्रभुम्।।49।। दोनों आँखें बन्द कर स्नेहपूर्वक बार बार आलाप कर प्रिया सीता को वरवस प्रफुल्लित करते हुए स्वयं भी प्रसन्न श्रीराम का ध्यान कर लाख मन्त्र जपें और लाल कमल से हवन कर शीघ्र ही राजा अथवा प्रभु को सम्मोहित करता है। सुतीक्ष्णमुनिवर्य्यात्र षट्प्रयोगप्रदर्शनम्। सर्वाभीष्टार्थतत्त्वस्य द्योतनाय मनोः पुनः।।50।। नैव कर्त्तव्यमित्येव मुक्तिर्दूरतरा¹ यतः। किञ्च प्रयोगकर्तॄणां परलोको न विद्यते।।51।। हे मुनि सुतीक्ष्ण! यहाँ मैंने सभी अभीष्ट तत्त्वों को स्पष्ट करने के लिए छह प्रयोगों का प्रदर्शन किया फिर कहता हूँ कि इन्हें करना नहीं चाहिए; क्योंकि इससे मुक्ति दूर चली जाती है साथ ही, प्रयोग करनेवालों को परलोक नहीं मिलता। प्रयोगसिद्धिरेतेषां फलं नान्यद् भवत्यपि। नैष्कामानां तु भक्तानां जपहोमादिकर्मसु।।52।। मुक्तिरेव फलं तेषामिह किञ्चिन्न विद्यते। एकैकस्य विधानस्य न कुत्रापि फलद्वयम्।।53।।
- घ. मुक्तिर्भारतरा।