अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)
Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary
महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा
पृष्ठ 160, कुल 337 में से
संदर्भ में पढ़ेंपञ्चदशोऽध्यायः (99) राज्यच्युत व्यक्ति यदि केवल साग खाकर जल में खड़ा होकर एक लाख जप करे और बिल्वपत्र से दशांश हवन करे, तो उसका शासन पुनः लौट आता है; इसमें सन्देह नहीं। उपोष्य गङ्गादिजलान्तरस्थो रामं समाराध्य जपेच्च लक्षम्। हुत्वा दशांशं कमलैस्तिलैर्वा बिल्वप्रसूनैर्मधुरत्रयाक्तैः ।।२६।। राज्यश्रियं विन्दति मन्दभाग्योऽ- प्यमुष्य दास्यं वरवाञ्छितं स्यात्। १वैदुष्यमिष्टञ्च सुतादिलाभो युद्धे जयः सर्व्वसमृद्धिवृद्धिः।।२७।। गंगा आदि पवित्र नदी के जल में उपवास करते हुए खड़ा होकर श्रीराम की आराधना कर एक लाख जप करे और तीन मधुर से युक्त तिल अथवा बिल्वपत्र से दशांश हवन करे, तो मन्दभाग्य को भी श्रीराम की दासता और इच्छित वर मिले। राममाराध्य विधिवदर्चितेऽग्नौ जपेदपि। सूर्यबिम्बेऽपि तोयस्थो जुहुयादिक्षुदण्डकैः।।२८।। राज्यलक्ष्मीमवाप्नोति शरत्काले तपोधन।।२९।। जल में खड़ा होकर सूर्य विम्ब में श्रीराम की विधिवत् आराधना कर जप भी करे और शरद् ऋतु में पूजित अग्नि में ईख के टुकड़े से हवन भी करे तो हे तपोधन! सुतीक्ष्ण! वह राज्यलक्ष्मी प्राप्त करता है। वैशाखे राघवं सूर्य्ये सम्पश्यन्ननिमेक्षणः। निराहारो जपेल्लक्षं मौनी पञ्चाग्निमध्यतः।।३०।। दशांशं कमलैर्हुत्वा सार्वभौमो भवेद् ध्रुवम्। वैशाख मास में निराहार रहकर, मौन धारण कर, पंचाग्नि व्रत करते हुए (चारो ओर अग्नि जलाकर तथा पाँचवें सूर्य को देखते हुए) सूर्य में श्रीराम को अपलक देखते हुए एक लाख मन्त्र का जप करे और उसका दशांश कमल से हवन कर निश्चय सार्वभौम बन जाता है।
- क. यहाँ से दो चरण अनुपलब्ध।