अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)
Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary
महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा
पृष्ठ 161, कुल 337 में से
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माघमासे जले स्थित्वा कन्दमूलफलाशिनः¹ ।।131।। जपेल्लक्षं च जुहुयात् पायसेनार्चितेऽनले। दशांशं पुत्रपौत्राय² तच्छेषं प्राशयेत् प्रियाम् ।।132।। श्रीरामसदृशः पुत्रः पौत्रौ वाप्यस्य जायते। माघ मास में कन्द, मूल, फल खाकर व्रत करते हुए जल में खड़ा होकर जो लाख जप करे और पूजित अग्नि में पायस से दशांश हवन करे और पुत्र पौत्र आदि की प्राप्ति के लिए आहुति शेष पत्नी को विधिपूर्वक खिलावे तो श्रीराम के समान पुत्र अथवा पौत्र प्राप्त होता है। बलिष्ठैः शत्रुभिर्मन्त्री परिभूतोऽवमानितः ।।133।। तदा हनहनेत्युक्त्वा नामान्ते वैरिणो जपेत्। ध्यात्वा रघुपतिं क्रुद्धं कालानलमिवापरम्³ ।।134।। आकर्णान्तशराकृष्टकोदण्डभुजमण्डलम् । रणाङ्गणे रिपून् सर्वास्तीक्ष्णमार्गणवृष्टिभिः ।।135।। संहरन्तं महावीरमुग्रमैन्द्ररथस्थितम्⁴। लक्ष्मणादिमहावीरैर्युतं हनुमदादिभिः ।।136।। कोटिकोटिमहावीरैः शैलवृक्षकरोद्यतैः। वेगात् करालहुङ्कारभौँकारमहारवैः ।।137।। नदद्भिरभिधावद्भिः समरे रावणं प्रति। एवं ध्यात्वा निराहारो मारणाय⁵ रिपोः पुनः।38।। जुहुयात् शाल्मलीपुष्पैर्दशांशं मन्त्रसाधकः। अत्यैश्वर्यसमृद्धोऽपि⁶ न शत्रुरवशिष्यते ।।139।। यदि मन्त्र साधक शक्तिशाली शत्रु से हारकर अपमानित हुआ हो तो 'हन हन' यह कहकर शत्रु का नाम अन्त में जोड़कर जप करे। जो श्रीराम क्रोधित हैं, दूसरे कालाग्नि के समान हैं, कान तक खिंचे हुए बाण वाले धनुष हाथ में धारण किए हुए हैं तथा युद्ध-क्षेत्र में तीक्ष्ण बाणों की वर्षा से सभी शत्रुओं का संहार करनेवाले हैं; इन्द्र के रथ पर स्थित हैं। वे लक्ष्मण, हनुमान आदि महान् वीरों से घिरे हुए हैं तथा चट्टानों और वृक्षों को लेकर उठे हाथ वाले, हुंकार करते हुए युद्ध
- घ. फलाशनः। 2. घ. पुत्रपौत्रास्यै। 3. घ. कालाग्निमुव चापरं। 4. घ. महावीरं राममुग्ररथस्थितम्। 5. घ. मरणाय। 6. घ. राज्यैश्वर्य°