अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)
Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary
महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा
पृष्ठ 162, कुल 337 में से
संदर्भ में पढ़ेंपञ्चदशोऽध्यायः (101) में रावण की ओर दौड़ते हुए “भो भौ” शब्द करते हुए करोड़ों करोड़ो महान् वीरों से भी घिरे हुए हैं। ऐसे श्रीराम का ध्यान कर शत्रु को मारने के लिए सेमल के फूल से दशांश हवन करे। इससे अत्यन्त ऐश्वर्य प्राप्त होता है और शत्रु शेष नहीं रहता। वैरिणं रावणं ध्यात्वा तथात्मानं रघूद्वहम्। विधाय पूर्ववत्सर्वमनायासेन मारयेत् ।।40।। येनैव संहृतः¹ कोपात् स यात्येव यमालयम्। रावण के रूप में शत्रु का ध्यान कर स्वयं को श्रीराम मानकर पूर्वोक्त विधि से जप आदि सब कुछ कर सभी शत्रुओं का अनायास मारण करे। क्रोध से जिस पर सन्धान किया जाए वह यमलोक पहुँच जाता है। सीताहरणशोकाब्धिस्तम्भीभूतमचेतनम्² ।।41।। जपेद् रघुपतिं ध्यायन् निराहारो जले वसेत्। दशांशतस्तिलैर्हुत्वा स्तम्भयेच्छत्रुसंहतिम् ।।42।। सीता के अपहरण के कारण शोक रूपी समुद्र में स्तब्ध चित्त वाले श्रीराम का ध्यान करते हुए निराहार रहकर जल में अवस्थित होकर जप करें। उसका दशांश तिल से हवन कर शत्रु के समूह का वह स्तम्भन करे। निधाय वायुबीजान्ते तन्नाम भ्रामयेति च। जपेल्लक्षं निराहारो जुहुयाच्च तिलैरपि ।।43।। रामं ध्यात्वा विषण्णञ्च सीतान्वेषणकातरम्। भ्रामयत्यचिरं साक्षाद्धेमाद्रिमपि वैरिणम् ।।44।। मन्त्र के अन्त में वायु बीज (वं) लगाकर अभीष्ट व्यक्ति का नाम बोलकर ‘भ्रामय’ यह कहे। इस प्रकार निराहार रहते हुए एक लाख जपकर तिल से हवन करें। इस पुरश्चरण में विषादग्रस्त और श्रीसीता की खोज में व्याकुल श्रीराम का ध्यान करे तो वह साक्षात् सुमेरु के समान दृढ़ शत्रु का भी ‘भ्रामण’ करे। समुद्रतीरे लङ्कायां हेमप्राकारसन्निधौ। सुग्रीवादिभिरन्यैश्च देवैर्जांम्बवदादिभिः ।।45।। उपास्यमानं सदसि ध्यात्वा रामं सलक्ष्मणम्।
- घ. तेनायं संहतः। 2. घ. स्तब्धीभूत।