अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)
Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary
महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा
पृष्ठ 163, कुल 337 में से
संदर्भ में पढ़ें(102) अगस्त्य-संहिता विभीषणायायाचिते प्रसन्नं शरणार्थिने।।46।। वरदं तु जपेल्लक्षं जुहुयात्पङ्कजैरपि। स्वस्थानमानयेच्छीघ्रं राजानमथवा प्रभुम्।।47।। समुद्र के तट पर, लंका में, सोने की अट्टालिका के समक्ष, सुग्रीव जाम्बवान् आदि से घिरे हुए, सभा में आराधित, ऐसे श्रीराम और लक्ष्मण का ध्यान करें, जिनसे विभीषण याचना कर रहे हों और जो शरण चाहनेवालों पर प्रसन्न हों। इस प्रकार ध्यान कर एक लाख जप करें और कमल के फूल से हवन करें, तो अपने निवास स्थान पर राजा अथवा प्रभु का आकर्षण कर लाने में समर्थ हों। निमील्य चक्षुषी स्नेहादुपलाप्य पुनः पुनः। प्रमोदयन्तं सहसा मोदन्तं मैथिलीं प्रियाम्।।48।। रामं ध्यात्वा जपेल्लक्षं हुत्वा रक्ताम्बुजैरपि। सम्मोहयति वेगेन राजानमथवा प्रभुम्।।49।। दोनों आँखें बन्द कर स्नेहपूर्वक बार बार आलाप कर प्रिया सीता को वरवस प्रफुल्लित करते हुए स्वयं भी प्रसन्न श्रीराम का ध्यान कर लाख मन्त्र जपें और लाल कमल से हवन कर शीघ्र ही राजा अथवा प्रभु को सम्मोहित करता है। सुतीक्ष्णमुनिवर्य्यात्र षट्प्रयोगप्रदर्शनम्। सर्वाभीष्टार्थतत्त्वस्य द्योतनाय मनोः पुनः।।50।। नैव कर्त्तव्यमित्येव मुक्तिर्दूरतरा¹ यतः। किञ्च प्रयोगकर्तॄणां परलोको न विद्यते।।51।। हे मुनि सुतीक्ष्ण! यहाँ मैंने सभी अभीष्ट तत्त्वों को स्पष्ट करने के लिए छह प्रयोगों का प्रदर्शन किया फिर कहता हूँ कि इन्हें करना नहीं चाहिए; क्योंकि इससे मुक्ति दूर चली जाती है साथ ही, प्रयोग करनेवालों को परलोक नहीं मिलता। प्रयोगसिद्धिरेतेषां फलं नान्यद् भवत्यपि। नैष्कामानां तु भक्तानां जपहोमादिकर्मसु।।52।। मुक्तिरेव फलं तेषामिह किञ्चिन्न विद्यते। एकैकस्य विधानस्य न कुत्रापि फलद्वयम्।।53।।
- घ. मुक्तिर्भारतरा।