भारतकोश
अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary

महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा

DevanagariSanskritpublished337 पृष्ठ

पृष्ठ 164, कुल 337 में से

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षोडशोऽध्यायः (103) इनके करने से प्रयोगों की ही सिद्धि होती है; अन्य फल उन्हें नहीं मिलता। किन्तु निष्काम भक्तों का जप, होम आदि कर्मों में मुक्ति ही फल होता है; उन्हें इस संसार में कुछ नहीं मिलता क्योंकि एक विधि के कहीं भी दो फल नहीं हो सकते। सुतीक्ष्ण दृश्यते तस्मान्निष्कामो राममर्चयेत्। विद्वान् ब्रह्मास्त्रमादाय शशादौ न विमोचयेत्।¹ नायं मुक्तिपदो मन्त्रो मारणादौ प्रयुज्यताम्।।54।। इसलिए हे सुतीक्ष्ण! इस प्रकार स्पष्ट है कि कामना रहित होकर ही श्रीराम का अर्चन करना चाहिए। विद्वान् ब्रह्मास्त्र लेकर खरगोश पर न छोड़ें। मुक्ति प्रदान करनेवाला षडक्षर राम-मन्त्र का मारण आदि के लिए प्रयोग न करें। इत्यगस्त्यसंहितापरमरहस्ये प्रयोगविधिर्नाम पञ्चदशोऽध्यायः। अथ षोडशोऽध्यायः अगस्त्य उवाच अथ वक्ष्ये विधानानि पौरश्चरणिके विधौ। विना येन न सिद्धः स्यान्मन्त्रो वर्षशतैरपि।।1।। अगस्त्य बोले- अब पुरश्चरण की विधि के विधानों को कहता हूँ, जिनके बिना मन्त्र की सिद्धि सौ वर्षों में भी नहीं होगी। भक्तिश्रद्धेष्टदानानि चिरोपास्ति प्रसादितात्। गुरोर्मन्त्रं वरं लब्ध्वा सर्वाभीष्टप्रदं बुधः।।2।। पूर्ववत् पूजयेन्नित्यं जपेत् नियतव्रतः। षट्सहस्रं सहस्रं वा शतं वाष्टोत्तरं शुचिः।।3।

  1. घ. ब्रह्मन् ब्रह्मास्त्रमादाय शशादौ न विमोचय।
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