अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)
Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary
महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा
पृष्ठ 165, कुल 337 में से
संदर्भ में पढ़ें(104) अगस्त्य-संहिता भक्ति, श्रद्धा और इच्छित दान कर चिरकाल तक की उपासना (सेवा) से प्रसन्न किये हुए गुरु से सभी इच्छाओं की पूर्ति करनेवाला मन्त्रश्रेष्ठ षडक्षर मन्त्र का ग्रहण कर योग्य साधक पूर्वोक्त विधि से नित्य पूजन करें और नियमों का पालन करते हुए पवित्र होकर प्रतिदिन छह हजार, एक हजार अथवा एक सौ आठ बार जप करें। एवमाराधितो रामः परां¹ भक्तिं प्रबोधयेत्। पुरश्चरणकृत्याय पूर्वमेवं विधीयते।।4।। इस प्रकार आराधित श्रीराम परम भक्ति जगाते हैं। पुरश्चरण के लिए इस प्रकार पूर्वकृत्यों का विधान किया जाता है। यथाशक्ति नियम्यान्ते बहिरात्मानमात्मवित्। पुरश्चरणवत्सर्वं कुर्याद् होमं विधानतः²।।5।। ततः संकल्प्य कुर्वीत पुरश्चरणमादरात्। चिरं निरन्तरेणैव नियतात्मा दृढव्रतः।।6।। आत्मज्ञानी यथाशक्ति प्राणायाम कर बाह्य और अन्तःशुद्धि पुरश्चरण की विधि के समान करें। तब विधानपूर्वक हवन करें। इसके बाद संकल्प कर आदर भाव से अधिक दिनों तक लगातार एकाग्र भाव से दृढ़तापूर्वक नियमों का पालन करते हुए पुरश्चरण करें। शैलाग्रे जलमध्ये वा तीरे वा लवणाम्बुधेः। नदीतीरेऽश्वत्थमूले रम्ये बिल्ववनान्तरे।।7।। प्रत्यङ्मुखशिवस्थाने वृषभादिविवर्जिते। अश्वत्थबिल्वतुलसीवने पुष्पान्तरावृते।।8।। गवां गोष्ठेषु तीर्थेषु पुण्यक्षेत्रेषु शस्यते। यह पुरश्चरण पर्वत शिखर पर, जल में, समुद्र के तट पर, नदी के तट पर, पीपल वृक्ष की जड़ में, बेल के रमणीय वन में, पूर्वाभिमुख शिवालय में जहाँ वृषभ आदि न हों, पीपल, बेल तुलसी के वन में जहाँ अन्य फूलों के वृक्ष हों, गाय के घर में, तीर्थों में और पुण्यस्थानों में पुरश्चरण प्रशस्त है। वैदिकाचारयुक्तानां श्रुतानां श्रीमतां सताम्।।9।। स्वकुलस्थानजातानां³ भिक्षाशी चाग्रजन्मनाम्।
- घ. यदा। 2. घ. विधाय तत्। 3. घ. सत्कुलस्थानजातानां।