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अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary

महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा

DevanagariSanskritpublished337 पृष्ठ

पृष्ठ 159, कुल 337 में से

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पृष्ठ 159

(98) अगस्त्य-संहिता संवत्सरं प्रकुर्वीत जपहूोमादिकं विभोः। रात्रौ जपेद्दिवा होमं कुर्यादिवापरेऽहनि।।19।। ब्राह्मणान् भोजयित्वा तु व्रतमेतत् समापयेत्। सोमसूर्यात्मकं यस्तु व्रतं कुर्वीत मानवः।।20।। इह भुक्तिं च मुक्तिञ्च लभते नात्र संशयः। एक वर्ष तक सूर्य के प्रभामण्डल में उदय और अस्त के समय श्रीराम की आराधना कर एकाग्रचित्त होकर श्रीराम के मन्त्र का जप करे, तो इसका जो फल शीघ्र उसे मिलता है, वह देवताओं के लिए भी दुर्लभ है। वह विद्वत्ता और आधिपत्य से सभा में स्थित लोगों में श्रेष्ठ हो जाता है। साथ ही पूर्णिमा की रात में चन्द्रोदय एवं चन्द्रास्त के समय यह व्रत जप, होम आदि विधि में वर्ष पर्यन्त करे। रात्रि में जप कर दूसरे दिन हवन करे; ब्राह्मण भोजन कराकर यह व्रत जो मनुष्य करे, वह इस संसार में भोग और मुक्ति प्राप्त करे, इसमें सन्देह नहीं। रक्तपद्मैश्च बन्धूकैस्तथा रक्तोत्पलैरपि।।21।। अभीष्टलोकवश्यार्थो जुहुयादर्चितेऽनले। लाल कमल, बन्धूक (दुपहरिया फूल) और लाल उत्पल से अभीष्ट व्यक्ति के वशीकरण के लिए पूजित अग्नि में हवन करें। राज्यैश्वर्योपभोगार्थी गिरौ¹ लक्षमनन्यधीः।।22।। पद्मैर्बिल्वप्रसूनैर्वा दशांशं जुहुयान्मुने। राज्य और ऐश्वर्य के उपभोग का इच्छुक एकचित्त होकर पर्वत पर लाख जप कर लाल कमल या बिल्वपुष्प से दशांश हवन करे। समुद्रतीरे गोष्ठे वा लक्षजापी पयोव्रतः।।23।। पायसेनाज्ययुक्तेन हुत्वा विद्यानिधिर्भवेत्। समुद्र के तट पर अथवा गाय के घर में केवल दूध पीकर एक लाख जप कर घृत डालकर पायस से हवन कर विद्वान् होता है। परिक्षीणाधिपत्यो² यः शाकाहारी जलान्तरे।।24।। जपेल्लक्षं च जुहुयाद् बिल्वपत्रैर्दशान्ततः। तदेव पुनरायाति स्वाधिपत्यं न संशयः।।25।।

  1. घ. जपेत्। 2. घ. परिक्षताधिपत्यो।
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