अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)
Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary
महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा
पृष्ठ 158, कुल 337 में से
संदर्भ में पढ़ेंपञ्चदशोऽध्यायः (97) वाञ्छितं फलमाप्नोति हुत्वा रक्तोत्पलैर्नवैः । हुत्वा नीलोत्पलैः सम्यग् वशयेदखिलं जगत् ।।11।। ताजे लाल कमल से हवन कर इच्छित फल प्राप्त करता है तथा नीलकमल से हवन कर समग्र संसार को वश में करता है। रामं विधिवदाराध्य ज्वलितेऽग्नौ प्रयोगवित्। मधुरत्रययुक्तेन पायसेन हुतेन तु ।।12।। सर्वाधिपत्यं वैदुष्यं भवत्येव न संशयः। तिलैश्च तण्डुलैराज्यैर्हुत्वा लोकस्य पूज्यताम् ।।13।। प्रज्वलित अग्नि में श्रीराम की विधिपूर्वक आराधना कर प्रयोग जानने वाला तीन मधुर (मधु, गुड़ एवं मिसरी) मिले खीर से हवन कर सभी पर आधिपत्य और वैदुष्य प्राप्त करता है और तिल, चावल एवं घृत से हवन कर संसार में पूजित होता है। आराध्य वत्सरं यावत्¹ षट्सहस्रं दिने दिने। जपेच्च जुहुयादग्नौदशांशं तद्गतान्धसा ।।14।। अयमेवान्नदो लोके सर्वेषामपि जायते। बिल्वप्रसूनैः कुमुदैस्तथा बिल्वदलैरपि ।।15।। हुत्वा स लभते लक्ष्मीमचिरान्मन्त्रसाधकः। प्रतिदिन छह हजार मन्त्र का जप कर अग्नि में पूर्वोक्त विधि उससे युक्त भात (अन्धस्) से दशांश हवन करें। यहीं इस संसार में सबके लिए अन्न देने वाला प्रयोग है। बेल का फूल, कुमुद तथा बिल्वपत्र से हवन कर मन्त्रसाधक शीघ्र लक्ष्मी प्राप्त करता है। आराध्य रामं चण्डांशुमण्डले वत्सरं मुने ।।16।। उदयास्तमने तं च जपेद्राममन्त्रमनन्यधीः।² फलं भवति तस्याशु देवानामपि दुर्लभम् ।।17।। वैदुष्येणाधिपत्येन सभ्यानामुत्तमो³ भवेत्। पूर्णिमासु निशीथिन्यामुदयास्तमयव्रतम् ।।18।।
- घ. आरात् संवत्सरं यावत्। 2. घ. उदयास्तमनं यावत् जपेन्मन्त्रमनन्यधीः। 3. घ. समानामुत्तमो।