भारतकोश
अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary

महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा

DevanagariSanskritpublished337 पृष्ठ

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पृष्ठ 149

(88) अगस्त्य-संहिता एक कोण से दूसरे कोण तक की दूरी का आधा कोणार्द्ध कहलाता है। उस कोणार्द्ध का आठवाँ भाग के बराबर की दूरी पर चतुष्कोण में चिह्न लगा लेना चाहिए। तब उन चिह्नों से होकर एक वृत्त बनाना चाहिए। यह वर्तुल कुण्ड कहलाता है। अगस्त्य-संहिता का भी यहीं मत प्रतीत होता है, किन्तु इस स्थल पर पाण्डुलिपि ‘क’ अपठनीय है।) मेखलास्वष्टपत्राणि वर्तुलस्य तपोनिधे। पद्माकारं भवेदेतत् कुण्डं सर्वफलप्रदम्।¹।17।। वर्तुल कुण्ड की मेखलाओं में आठ दल होंगे। इस प्रकार वह कुण्ड कमल के आकार का होगा, जो सभी प्रकार से फलदायक है। शतहोमे रत्निमात्रं तदूर्ध्वं मुष्टिसम्मितम्। सहस्रेप्ययुतेऽप्यर्द्धलक्षे लक्षेऽपि च क्रमात्।।18।। पञ्चपञ्चाङ्गुलाधिक्याद् वर्द्धतेऽरत्निमात्रतः। कुण्डञ्च कोटिहोमेऽपि तदूर्द्धर्वेऽपि कराष्टकम्।।19।। सौ आहुति वाले होम में मुट्ठी बँधे हाथ की लम्बाई के बराबर, इसके ऊपर मुट्ठी खुले हाथ की लम्बाई के बराबर कुण्ड बनावें। हजार, दश हजार और उससे ऊपर लाखों आहुति के लिए क्रमशः मुट्ठी बँधे हाथ की लम्बाई से पाँच पाँच अंगुल क्रमशः बढ़ाते हुए एक हाथ तक बढ़ावें इस प्रकार कोटि होम तक के लिए कुण्ड बनावें। उसके ऊपर आहुति संख्या होने पर आठ हाथ की लंबाई-चौड़ाई वाला कुण्ड बनावें। मुष्ट्यरत्निमिते कुण्डे दशाद्वादशसंख्यया। क्रमेणैवाङ्गुलानां च प्रथमा मेखला भवेत्।।20।। मुट्ठी खोलकर एक हाथ की लम्बाई वाले कुण्ड में बारह अंगुल तथा बन्द मुट्ठी वाले हाथ की लम्बाई के परिमाण के कुण्ड में बारह अंगुल की पहली मेखला होती है। द्वितीये च तृतीये च त्र्यंशे त्र्यंशे विनिर्दिशेत्। सर्वेषामेव कुण्डानामह्लिद्वयवृद्धितः।।21।। प्रथमा मेखला कार्या त्र्यंशेऽप्यन्या तु पूर्ववत्। कण्ठोऽष्टयवमात्रः स्यात् कुण्डे च करमात्रके।।22।। कुण्डे षड्यवमात्रः स्यात् कण्ठो रत्निप्रमाणके। तथा चतुर्यवैः कण्ठो मुष्टिमात्रे विनिर्दिशेत्।।23।।

  1. घ. में अनुपलब्ध। Rarest Archiver