अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)
Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary
महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा
(88) अगस्त्य-संहिता एक कोण से दूसरे कोण तक की दूरी का आधा कोणार्द्ध कहलाता है। उस कोणार्द्ध का आठवाँ भाग के बराबर की दूरी पर चतुष्कोण में चिह्न लगा लेना चाहिए। तब उन चिह्नों से होकर एक वृत्त बनाना चाहिए। यह वर्तुल कुण्ड कहलाता है। अगस्त्य-संहिता का भी यहीं मत प्रतीत होता है, किन्तु इस स्थल पर पाण्डुलिपि ‘क’ अपठनीय है।) मेखलास्वष्टपत्राणि वर्तुलस्य तपोनिधे। पद्माकारं भवेदेतत् कुण्डं सर्वफलप्रदम्।¹।17।। वर्तुल कुण्ड की मेखलाओं में आठ दल होंगे। इस प्रकार वह कुण्ड कमल के आकार का होगा, जो सभी प्रकार से फलदायक है। शतहोमे रत्निमात्रं तदूर्ध्वं मुष्टिसम्मितम्। सहस्रेप्ययुतेऽप्यर्द्धलक्षे लक्षेऽपि च क्रमात्।।18।। पञ्चपञ्चाङ्गुलाधिक्याद् वर्द्धतेऽरत्निमात्रतः। कुण्डञ्च कोटिहोमेऽपि तदूर्द्धर्वेऽपि कराष्टकम्।।19।। सौ आहुति वाले होम में मुट्ठी बँधे हाथ की लम्बाई के बराबर, इसके ऊपर मुट्ठी खुले हाथ की लम्बाई के बराबर कुण्ड बनावें। हजार, दश हजार और उससे ऊपर लाखों आहुति के लिए क्रमशः मुट्ठी बँधे हाथ की लम्बाई से पाँच पाँच अंगुल क्रमशः बढ़ाते हुए एक हाथ तक बढ़ावें इस प्रकार कोटि होम तक के लिए कुण्ड बनावें। उसके ऊपर आहुति संख्या होने पर आठ हाथ की लंबाई-चौड़ाई वाला कुण्ड बनावें। मुष्ट्यरत्निमिते कुण्डे दशाद्वादशसंख्यया। क्रमेणैवाङ्गुलानां च प्रथमा मेखला भवेत्।।20।। मुट्ठी खोलकर एक हाथ की लम्बाई वाले कुण्ड में बारह अंगुल तथा बन्द मुट्ठी वाले हाथ की लम्बाई के परिमाण के कुण्ड में बारह अंगुल की पहली मेखला होती है। द्वितीये च तृतीये च त्र्यंशे त्र्यंशे विनिर्दिशेत्। सर्वेषामेव कुण्डानामह्लिद्वयवृद्धितः।।21।। प्रथमा मेखला कार्या त्र्यंशेऽप्यन्या तु पूर्ववत्। कण्ठोऽष्टयवमात्रः स्यात् कुण्डे च करमात्रके।।22।। कुण्डे षड्यवमात्रः स्यात् कण्ठो रत्निप्रमाणके। तथा चतुर्यवैः कण्ठो मुष्टिमात्रे विनिर्दिशेत्।।23।।
- घ. में अनुपलब्ध। Rarest Archiver
चतुर्दशोऽध्यायः (89) दूसरी और तीसरी मेखला भी एक तिहाई भाग में होनी चाहिए। सभी प्रकार के कुण्डों में दो-दो अंगुलियाँ बढ़ाकर मेखला बनानी चाहिए। पहली मेखला एक तिहाई भाग में बनावें और अन्य मेखलाएँ पूर्ववत् परिमाण में बनाएँ। एक हाथवाले कुण्ड में कण्ठ का भाग (योनि का अग्रभाग, जो कुण्ड में निराधार स्थापित किया जाये) आठ यव के परिमाण का होगा तथा रत्निप्रमाण (मुट्ठी बँधा हाथ) के कुण्ड में कण्ठ छह यव के परिमाण का होगा तथा मुट्ठी वाले भाग से रहित एक हाथ के प्रमाण वाले कुण्ड में चार यव के परिमाण का कण्ठ बनावें। सर्वेषु कुण्डमानेषु चाङ्गुलिद्वयवृद्धितः। कुण्डो यत्नेन कर्तव्यो भुक्तिमुक्तिफलेप्सुभिः ।।२४।। भोग और मोक्ष की इच्छा रखनेवाले सभी प्रकार के कुण्डों में दो-दो अंगुल बढ़ाकर यत्नपूर्वक कुण्ड का निर्माण करें। सात्त्विकी राजसी चैव तामसी च क्रमाद् भवेत्। प्रथमा च द्वितीया च तृतीया मेखला स्मृता ।।२५।। कुण्ड तीन प्रकार के होते हैं- सात्विकी, राजसी एवं तामसी तथा मेखला भी प्रथमा, द्वितीया एवं तृतीया के नाम से तीन होतीं हैं। योनिः कुण्डानुसारेण कुर्यादाद्यन्तमध्यतः। उक्ताङ्गुलिप्रमाणेण द्विगुणाञ्च चतुर्गुणाम् ।।२६।। होमसंख्यानुविधिना सर्वलक्षणलक्षितम् । स्रुवं बाहुप्रमाणेण होमार्थं विदधीत वै ।।२७।। कुण्ड के परिमाण के अनुसार कुण्ड की योनि आरम्भ, अन्त और मध्य भाग का निर्माण पूर्वोक्त अंगुल के प्रमाण से दो दुना या चारगुना करें। होम- संख्या के अनुसार सभी लक्षणों से सम्पन्न मेखलाओं का निर्माण करें। होम के लिए एक हाथ का स्रुव बनावें। चतुरस्रं विधायादौ सप्तपञ्चाङ्गुलं क्रमात्। तृतीयांशेन गर्तः स्यादन्तर्वृत्तशोभितम् ।।२८।। खनित्वा समं तिर्यगूर्ध्वंवतदधः शोधयेद् बहिः। चतुर्थाशं चाङ्गुलस्य शेषं त्वर्द्धं¹ तदन्ततः ।।२९।।
- घ. शेषाच्चार्द्धम्।
(90) अगस्त्य-संहिता कुण्ड निर्माण के लिए सबसे पहले समतल भूमि पर बारह अंगुल पर्यन्त चौकोर गड्ढा बनावें। इसके बाद एक तिहाई भाग वृत्ताकार बनावें। इसके बाद टेढ़ा कर ऊपर की ओर खनें। इस क्रम में पहले एक अंगुल के चौथाई भाग तक खनें तथा अन्त तक आधा अंगुल टेढ़ा खनें। रम्यां च मेखलां खाते शिष्टेनार्द्धेन कारयेत्। कुर्यात् त्रिभागविस्तारां चाङ्गुष्ठेन समायुताम्।।30।। सार्द्धमङ्गुष्ठकं चास्य तदग्रे तु मुखं भवेत्। चतुरङ्गुलविस्तारं पञ्चाङ्गुलमथापि वा।।31।। द्वित्रयाङ्गुलकं तस्य मध्यान्तं च शोभनम्। सुषिरं कुण्डदेशे स्याद् विशेद्यावत्कनीयसी।।32।। शेषं दण्डं च कर्त्तव्यं यथारुचि विचित्रकम्।1 तब शेष भाग के बीच में सुन्दर मेखला बनानी चाहिए। यह मेखला तीन अंगूठे की चौड़ाई लेकर बनावें। तब इसके आगे डेढ़ अंगूठे का मुख बनावें। यह मुख चार अंगुल अथवा पाँच अंगुल चौड़ा होगा। दो अथवा तीन अंगुल चौड़ा इसका मध्य भाग तथा अन्तिम भाग होगा, जिसे वह देखने में सुन्दर लगे। कुण्ड के समीप एक छिद्रयुक्त नालिका रखें, जिनमें कनिष्ठा अंगुली घुस सके। एक डंडा भी अपनी रुचि के अनुसार रंग-बिरंगा रखें। चतुःकोणसमायुक्तो हस्तमात्रः स्रुवो भवेत्।।33।। चतुष्कं शोभनं वृत्तं द्व्यङ्गुलं विदधीत वै। यथल्पपङ्के गोः पादं रुचिरं दृश्यते तथा।।34।। एक हाथ की लम्बाई वाला चौकोर स्रुव होता है। दो अंगुल परिमाण के सुन्दर चार वृत्त दो अंगुल के परिमाण में रहना चाहिए। जैसे थोड़े कीचड़ में गाय के खुर की सुन्दर आकृति बन जाती है, उसी प्रकार स्रुव का आकार होना चाहिए। पलाशपत्रे निच्छिद्रे रुचिरे स्रुकुस्रुवौ मुने। विदध्याद् वाश्वत्थपत्रे संक्षिप्ते होमकर्मणि।।35।। संक्षिप्त हवन में बिना छिद्र वाले पलाश अथवा पीपल के पत्ते का उपयोग स्रुव एवं स्रुक् के अनुकल्प में करना चाहिए।
- घ. यथाकिञ्चिद विचित्रकम्।
चतुर्दशोऽध्यायः (91)
ततः कुण्डस्थलं सम्यग् गोमयेनोपलिप्य च। शालितण्डुलचूर्णैश्च नीलपीतसितासितैः ।।३६।। शोभोपशोभासंयुक्तं मण्डलं व्यक्तमुज्ज्वलम् । कुण्डस्य सन्निधौ¹ सम्यग् वायव्ये विदधीत वै ।।३७।। तब कुण्ड के स्थल को भलीभाँति गाय के गोबर से लीप कर चावल के नील, पीला, सफेद और काला पीठा से विभिन्न प्रकार से सजाकर स्पष्ट एवं चमकीला यन्त्र कुण्ड के समीप वायुकोण (पश्चिमोत्तर कोण) में लिखें। तत्राष्टपत्रं कमलं वृत्तत्रयपरिवृतम्। सोमसूर्याग्निबिम्बे द्वे तथा कुर्याद् विचक्षणः ।।३८।। वहाँ अष्टदल कमल लिखें, जो तीन वृत्तों से घिरा हुआ हो तथा उसपर चन्द्रमा, सूर्य और अग्नि के दो बिम्ब बनाएँ। चतुरस्रं बहिस्तस्य षट्कोणं कर्णिकान्तरे। पीतं पूर्वे सितं देयं पश्चिमेऽप्युत्तरे तथा ।।३९।। रक्तं तु दक्षिणे कृष्णं पाटलं वह्निसंस्थितम् । निर्ऋति नीलवर्णन्तु वायव्ये धूम्रवर्णकम् ।।४०।। ऐशे गौरं विनिर्दिष्टमष्टपत्रे त्वयं क्रमः। इसके बाहर चतुर्भुज बनाएँ तथा कर्णिका (मध्यभाग) में षट्कोण बनाएँ। शङ्खचक्रगदापद्मं धनुर्बाणांश्च² मण्डले ।।४१।। विलिखेद् वर्णकैः सम्यक् तत्र रामं समर्च्चयेत्। शंख, चक्र, गदा, पद्म, धनुष और बाण इस षट्कोण में सुन्दर ढंग से बनाएँ और वहाँ श्रीराम की अर्चना करें। कुण्डान्तरेष्वेवमेवाराध्य श्रद्धया मुने ।³।४२।। आदौ वह्निमुखं कुर्यादुपविष्टः सुविष्टरे। दूसरे कुण्डों में भी इसी प्रकार श्रद्धा से आराधना कर सुन्दर विष्टर (25 कुशों से निर्मित अधःकेश पुंज) पर बैठकर सबसे पहले अग्निमुख करें। प्राणानायम्य मनसा जपेन्मन्त्रमनन्यधीः ।।४३।। यावन्मरुत् संचरति सर्वाङ्गेष्वपि निश्चलः।
- घ. दक्षिणे। 2. घ. धनुर्बाणानि । 3. घ. शृणुयान्मुने । Rarest Archiver
(92) अगस्त्य-संहिता प्राणायाम कर मन ही मन एकाग्र होकर मन्त्र का जप तब तक करें, जबतक कि वायु सभी अंगों में निश्चल होकर संचरण न करने लगे। सङ्कल्प्य स्थण्डिले कुण्डे कृत्वा लेखाश्च मध्यमाः ।।44।। ऊर्ध्वं तिर्यक् तिस्र एव वह्निमत्रादधीत वै। प्रोक्ष्योपसार्य्य¹ तत्पश्चाद्दत्वा विष्टरमादरात् ।।45।। स्थण्डिल अथवा कुण्ड में संकल्प कर मध्य में तीन रेखाएँ नीचे से ऊपर की ओर तथा तीन दायें से बाये आलेखन करें। तब यहाँ अग्नि का आधान करें। इसके बाद अग्नि का प्रोक्षण और अपसारण कर कुश से परिस्तरण करें। लक्ष्मीमृतुमतीं तत्र प्रभोर्नारायणस्य च। ग्राम्यधर्मेण सञ्जातमग्निं तत्र विचिन्तयेत् ।।46।। वहाँ लक्ष्मी को रजस्वला के रूप में ध्यान करें और प्रभु नारायण के संयोग से उत्पन्न अग्नि का स्मरण करें। प्रमथ्य विधिनैवाग्निमाहिताग्नेर्गृहादपि। आनीय चादधीतात्र कुशैः प्रज्वाल्य यत्नतः ।।47।। अग्नि का विधानपूर्वक मन्थन कर अथवा आहिताग्नि के घर से लाकर कुश से अग्नि प्रज्वलित कर यहाँ आधान करें। सम्प्रोक्ष्य याज्ञिकैः काष्ठैः पुनः प्रज्वालयेदपि। प्राणायामन्ततः कुर्यात् परिस्तार्य कुशाङ्कुरैः ।।48।। यज्ञीय काष्ठ से प्रोक्षण कर पुनः उसे प्रज्वलित करें, तब कुश से परिस्तरण कर प्राणायाम करें। स्वगृह्योक्तविधानेन वासुदेवादिभिर्मुने। पात्राण्यासाद्य विधिवदिध्ममन्त्रेण तन्त्रवित् ।।49।। हे मुनि सुतीक्ष्ण! मन्त्र के ज्ञानी अपनी शाखा के गृह्यसूक्त की विधि के अनुसार अथवा वासुदेव आदि की पद्धति के अनुसार पात्रों को यथास्थान विधानपूर्वक इध्ममन्त्र से रखें। तान्यवेक्ष्य पवित्रेण चोत्तमानि विधाय च। पुनः प्रोक्ष्यानयेत् पात्रं परिपूर्य शुभाम्बुना ।।50।।
- घ. प्रोक्ष्य प्रसार्य्य।
चतुर्दशोऽध्यायः (93) पवित्री कुश हाथ में रखकर उन पात्रों का अवेक्षण (अवलोकन) कर उन्हें उत्तान स्थापित कर फिर प्रोक्षण (धोकर) कर पात्रों को शुभ जल से भरकर रखें। कृत्वा कुशपवित्रं च तत्रोत्पूर्य निधाय तत्। दिश्युत्तरस्यां तत्पात्रं प्रणीतेत्युच्यते बुधैः।।५१।। कुश की दो पवित्री का निर्माण जल भरे पात्र के ऊपर रखें। उत्तर दिशा में रखे गये उस पात्र को प्रणीता कहा जाता है। तत्रार्चयेत् प्रभुं विष्णुं ब्रह्माणं ब्रह्मणार्चयेत्।२ आज्यं२ संस्कृत्य विधिवत् स्रुक्स्रुवावोमिति ब्रुवन्।।५२।। वहाँ प्रभु विष्णु तथा ब्रह्मा की अर्चना ब्रह्मसूक्त से करें तथा घृत का संस्कार तापन एवं उद्धरण विधि से कर ॐकार का उच्चारण करते हुए स्रुक् और स्रुव का संस्कार करें। गर्भाधानादिकं वह्नेर्विवाहान्तं समाचरेत्। अष्टावष्टौ च तारेण चेकैकस्य तु कर्मणः।।५३।। तब अग्नि के गर्भाधान से विवाह पर्यन्त की विधि करें। इनमें आठ आठ बार ॐकार का उच्चारण प्रत्येक विधि में करें। जुहुयादर्चिते वह्नौ वौषडन्तं समाप्य च। कर्मान्तरं समारभ्य तदप्येवं समापयेत्।।५४।। इस प्रकार पूजित अग्नि में वौषट् से समाप्त कर हवन करें। अन्य कर्म भी प्रारम्भ कर इसी प्रकार समाप्त करें। एवमग्नौ सुसम्पन्ने वैष्णवं श्रपयेच्चरुम्। इध्माधानादग्निमुखावाज्यभागौ जुहुयात् पुनः।।५५।। इस प्रकार सम्यक् प्रकार से अग्नि-पूजन समाप्त कर विष्णु को समर्पित करने योग्य चरु पकायें। तब अग्नि का आधान से अग्निमुख कर्म पर्यन्त कर दोनों आज्यभाग हवन करें। साङ्गावाहनमन्त्रान्नौ पूजयेद्रघुनन्दनम्।३ समिदाज्यचरूणां च प्रत्येकं षोडशाहुतीः।।५६।। जुहुयान्मूलमन्त्रेण परिवारेभ्य एव च। तिस्रो विनायकादिभ्यः सर्वेभ्योऽप्याहुतीर्मुने।।५७।। १. घ. ब्राह्मणोऽर्चयेत्। २. घ. कामं। ३. घ. पूजयेद्रघुनायकम् Rarest Archiver
(94) अगस्त्य-संहिता मूल मन्त्र से परिवार देवताओं को आहुति देकर गणेश आदि सभी देवताओं को आहुति दें। द्वाराङ्गपरिवारेभ्यः सुरेभ्यो जुहुयात्पुनः। हुत्वाज्येनाहुतीस्तत्तत् प्रदद्यात्तत्तदाप्तये ।।58।। द्वारदेवता, अंगदेवता, परिवार देवता एवं अन्य देवताओं को भी आहुति देकर पुनः घृत से उन उन देवताओं की कृपा पाने के लिए आहुतियाँ दें। तत्तद्द्द्रव्यैश्च जुहुयात् सर्वं चारुमनोहरैः। द्वारपीठसुरेभ्यश्च हुत्वादौ जुहुयात्ततः ।।59।। अङ्गादिवैष्णवान्तेभ्यः तिस्र आज्याहुतीः पृथक्। देवताओं के लिए विहित उन मनोहर द्रव्यों से द्वारदेवता एवं पीठदेवता को आहुति देकर तब हवन करें। अङ्ग देवताओं से आरम्भ कर विष्णु-भक्तों तक तीन तीन आहुतियाँ पृथक् पृथक् दें। ततः स्विष्टकृतं हुत्वा घृतेन मुनिसत्तम ।।60।। जलेन विधिना सम्यक् परिषिञ्च्य¹ समं ततः। हे मुनिश्रेष्ठ सुतीक्ष्ण! तब स्विष्टकृत् होम घृत से करें और विधानपूर्वक जल से परिषेचन करें। प्रणीतामार्जनं कृत्वा दद्याच्च ब्रह्मदक्षिणाम् ।।61।। स्वस्ववित्तानुसारेण लोभमोहविवर्जितः। ततो ब्रह्माणमुद्वास्य ब्राह्मणान्भोजयेत्तथा ।।62।। प्रणीतापात्र को खँघाल कर अपने विभव के अनुसार लोभ और मोह का परित्याग करते हुए ब्रह्मा को दक्षिणा दें। तब ब्रह्मा को विसर्जित करें और ब्राह्मणों को भोजन कराएँ। अग्निमध्यगतं देवं पुनः स्वात्मनि योजयेत्। एकीभूतं विचिन्त्येव वाचयेत् स्वस्तिवाचनम् ।।63।। आशीर्वचोभिर्विदुषामेध्यमानः सुखी भवेत्। तब अग्नि के मध्य में स्थित देव श्रीराम का आधान अपने हृदय में करें और श्रीराम के साथ एकाकार हो जाने का चिन्तन करें। तब स्वस्तिवाचन कराएँ। विद्वानों के आशीर्वचन से यजमान वृद्धि करता हुआ सुखी रहता है।
- घ. चाभिषिञ्च्य।
हुतशेषं ततः प्राश्य कुक्कुटाण्डप्रमाणकम् ।। ६४ ।। मन्त्रितं रामगायत्र्या ततस्तस्मै बलिं हरेत् । सन्निधावपि देवस्य बाह्यान्तर्दिक्षु चान्धसा ।। ६५ ।। तब हवन करने से शेष बचे पदार्थ में से मुर्गी के अंडे बराबर मात्रा में लेकर रामगायत्री से अभिमन्त्रित कर भक्षण करें। तब देवता के समीप, बाहर- भीतर एवं सभी दिशाओं में लिए भात (अन्धस्) से बलि दें। नित्ये नैमित्तिके काम्येऽप्येतदग्निमुखं स्मृतम् । सर्वत्राभ्युदयश्राद्धमङ्कुरारोपणं तथा। आदावन्ते प्रकुर्वन्ति कर्माण्यभ्युदयार्थिनः ।¹।। ६६ ।। नित्य, नैमित्तिक एवं काम्य तीनों कर्मों में इस प्रकार हवन स्मृतियों में कहा गया है। इन सभी कर्मों के आरम्भ एवं अंत में आभ्युदयिक श्राद्ध और अंकुरारोपण भी उन्नति के आकांक्षियों के लिए स्मृत है। इत्यगस्त्यसंहितायां परमरहस्ये कुण्डमान- होमान्तादिविधिप्रकरणं नाम चतुर्दशोऽध्यायः ।। १४ ।। अथ पञ्चदशोऽध्यायः अगस्त्य उवाच अथ प्रयोगं² वक्ष्यामि चतुर्णामिष्टदं³ मुने । मन्दभाग्योऽपि येनेष्टमायासेनैति वांछितम् ।। १ ।। अगस्त्य बोले- हे मुनि सुतीक्ष्ण, अब चारो वर्णों को वांछित फल देने वाला प्रयोग बतलाता हूँ, जिसे करने मन्दभाग्य भी इच्छित वस्तु प्राप्त कर लेता है। निधाय विधिवत्सम्यगग्निभागान्तमुक्तवत् । ततोऽग्नौ देवमावाह्य पूजयेदुपचारकैः ।। २ ।। पञ्चभिर्वा षोडशभिः पूज्योपकरणैः पृथक् । पलाशश्वत्थखदिरोदुम्बराम्रवटेन्धनैः ।। ३ ।। अग्निं प्रज्वालयेत् सम्यग्याज्ञिकैर्वाथ वेन्धनैः । तत्रैव पूजयेत् सम्यग् जुहुयादपि राघवम् ⁴ ।। ४ ।। १. घ. कर्मणोऽभ्युदयार्थतः। २. घ. प्रयोगान्। ३. घ. चतुर्णामिष्टदान्। ४. घ. माधवम्।
(96) अगस्त्य-संहिता
लक्षं तदर्द्धमथवा जपित्वा तद्दशांशतः। तिलैर्वामलकैर्हुत्वा¹ यद्यदिष्टं तदश्नुते।।५।। विधानपूर्वक पीछे कही गयी विधि से होमकर्म पर्यन्त कर अग्नि में देवता का आवाहन कर पाँच या सोलह उपचारों से पृथक्-पृथक् पूजा कर पलाश, पीपल, खैर, गूलर, आम, बड़, या अन्य यज्ञीय की समिधा से अग्नि प्रज्वलित करें। वहीं 'श्रीराम की पूजा सम्यक् रूप से कर एक लाख अथवा पचास हजार जप कर उसका दशांश हवन करें। तिल से अथवा आँवला से हवन कर अभीष्ट वस्तु की प्राप्ति होती है। बिल्वप्रसूनैरैश्वर्यमर्चितेऽग्नौ हुतैर्भवेत्। पलाशकुसुमैर्हुत्वा मेधावी वेदविद् भवेत्।।६।। दूर्वाभिश्च गुडीचीभिः² प्रत्येकमाप चाक्षतैः। निरामयोऽपि दीर्घायुर्भवत्येव तपोधन³।।७।। पूजित अग्नि में बेल के फूल से हवन करने पर ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है। पलाश के फूल से हवन कर वह मेधावी और वेद ज्ञानी होता है। दूर्वा या गुरुच के साथ अक्षत मिलाकर हवन करने से यजमान नीरोग और दीर्घायु होते हैं। सम्यक् चन्दनतोयेन प्रत्यग्रैश्च समुक्षितैः। जातीप्रसूनैर्हुत्वा तु राजानं वशमानयेत्।।८।। चन्दन के जल से सुगन्धित खिलेहुए तथा उचित रीति से तोड़े गये ताजे जूही के फूल से हवन कर राजा को वश में करे। ध्यात्वा च मन्मथं रामं⁴ सीतामपि रतिं स्मरेत्। सर्ववश्यप्रयोगेषु जपहोमादिकर्मसु।।९।। श्रीराम का कामदेव के रूप में तथा सीता को रति के रूप में सभी वशीकरण के प्रयोग में, जप होम आदि में स्मरण करें। रामं नवोपयन्तारं स्मरेणाराध्य⁵ भक्तितः। उपैति सदृशीं कन्यां लाजहोमेन साधकः।।१०।। कामबीज (क्लीं) से नव विवाहित श्रीराम की भक्तिपूर्वक आराधना कर धान के खील से हवन करने से साधक श्रीसीता के समान कन्या पत्नी के रूप में प्राप्त करता है।
- घ. कमलैर्हुत्वा। 2. घ. गुलूचीभिः। 3. घ. तपोनिधे। 4. घ. ध्यात्वापि राघवं कामं। 5. घ. स्मरन्नाराध्य।
पञ्चदशोऽध्यायः (97) वाञ्छितं फलमाप्नोति हुत्वा रक्तोत्पलैर्नवैः । हुत्वा नीलोत्पलैः सम्यग् वशयेदखिलं जगत् ।।11।। ताजे लाल कमल से हवन कर इच्छित फल प्राप्त करता है तथा नीलकमल से हवन कर समग्र संसार को वश में करता है। रामं विधिवदाराध्य ज्वलितेऽग्नौ प्रयोगवित्। मधुरत्रययुक्तेन पायसेन हुतेन तु ।।12।। सर्वाधिपत्यं वैदुष्यं भवत्येव न संशयः। तिलैश्च तण्डुलैराज्यैर्हुत्वा लोकस्य पूज्यताम् ।।13।। प्रज्वलित अग्नि में श्रीराम की विधिपूर्वक आराधना कर प्रयोग जानने वाला तीन मधुर (मधु, गुड़ एवं मिसरी) मिले खीर से हवन कर सभी पर आधिपत्य और वैदुष्य प्राप्त करता है और तिल, चावल एवं घृत से हवन कर संसार में पूजित होता है। आराध्य वत्सरं यावत्¹ षट्सहस्रं दिने दिने। जपेच्च जुहुयादग्नौदशांशं तद्गतान्धसा ।।14।। अयमेवान्नदो लोके सर्वेषामपि जायते। बिल्वप्रसूनैः कुमुदैस्तथा बिल्वदलैरपि ।।15।। हुत्वा स लभते लक्ष्मीमचिरान्मन्त्रसाधकः। प्रतिदिन छह हजार मन्त्र का जप कर अग्नि में पूर्वोक्त विधि उससे युक्त भात (अन्धस्) से दशांश हवन करें। यहीं इस संसार में सबके लिए अन्न देने वाला प्रयोग है। बेल का फूल, कुमुद तथा बिल्वपत्र से हवन कर मन्त्रसाधक शीघ्र लक्ष्मी प्राप्त करता है। आराध्य रामं चण्डांशुमण्डले वत्सरं मुने ।।16।। उदयास्तमने तं च जपेद्राममन्त्रमनन्यधीः।² फलं भवति तस्याशु देवानामपि दुर्लभम् ।।17।। वैदुष्येणाधिपत्येन सभ्यानामुत्तमो³ भवेत्। पूर्णिमासु निशीथिन्यामुदयास्तमयव्रतम् ।।18।।
- घ. आरात् संवत्सरं यावत्। 2. घ. उदयास्तमनं यावत् जपेन्मन्त्रमनन्यधीः। 3. घ. समानामुत्तमो।
(98) अगस्त्य-संहिता संवत्सरं प्रकुर्वीत जपहूोमादिकं विभोः। रात्रौ जपेद्दिवा होमं कुर्यादिवापरेऽहनि।।19।। ब्राह्मणान् भोजयित्वा तु व्रतमेतत् समापयेत्। सोमसूर्यात्मकं यस्तु व्रतं कुर्वीत मानवः।।20।। इह भुक्तिं च मुक्तिञ्च लभते नात्र संशयः। एक वर्ष तक सूर्य के प्रभामण्डल में उदय और अस्त के समय श्रीराम की आराधना कर एकाग्रचित्त होकर श्रीराम के मन्त्र का जप करे, तो इसका जो फल शीघ्र उसे मिलता है, वह देवताओं के लिए भी दुर्लभ है। वह विद्वत्ता और आधिपत्य से सभा में स्थित लोगों में श्रेष्ठ हो जाता है। साथ ही पूर्णिमा की रात में चन्द्रोदय एवं चन्द्रास्त के समय यह व्रत जप, होम आदि विधि में वर्ष पर्यन्त करे। रात्रि में जप कर दूसरे दिन हवन करे; ब्राह्मण भोजन कराकर यह व्रत जो मनुष्य करे, वह इस संसार में भोग और मुक्ति प्राप्त करे, इसमें सन्देह नहीं। रक्तपद्मैश्च बन्धूकैस्तथा रक्तोत्पलैरपि।।21।। अभीष्टलोकवश्यार्थो जुहुयादर्चितेऽनले। लाल कमल, बन्धूक (दुपहरिया फूल) और लाल उत्पल से अभीष्ट व्यक्ति के वशीकरण के लिए पूजित अग्नि में हवन करें। राज्यैश्वर्योपभोगार्थी गिरौ¹ लक्षमनन्यधीः।।22।। पद्मैर्बिल्वप्रसूनैर्वा दशांशं जुहुयान्मुने। राज्य और ऐश्वर्य के उपभोग का इच्छुक एकचित्त होकर पर्वत पर लाख जप कर लाल कमल या बिल्वपुष्प से दशांश हवन करे। समुद्रतीरे गोष्ठे वा लक्षजापी पयोव्रतः।।23।। पायसेनाज्ययुक्तेन हुत्वा विद्यानिधिर्भवेत्। समुद्र के तट पर अथवा गाय के घर में केवल दूध पीकर एक लाख जप कर घृत डालकर पायस से हवन कर विद्वान् होता है। परिक्षीणाधिपत्यो² यः शाकाहारी जलान्तरे।।24।। जपेल्लक्षं च जुहुयाद् बिल्वपत्रैर्दशान्ततः। तदेव पुनरायाति स्वाधिपत्यं न संशयः।।25।।
- घ. जपेत्। 2. घ. परिक्षताधिपत्यो।
पञ्चदशोऽध्यायः (99) राज्यच्युत व्यक्ति यदि केवल साग खाकर जल में खड़ा होकर एक लाख जप करे और बिल्वपत्र से दशांश हवन करे, तो उसका शासन पुनः लौट आता है; इसमें सन्देह नहीं। उपोष्य गङ्गादिजलान्तरस्थो रामं समाराध्य जपेच्च लक्षम्। हुत्वा दशांशं कमलैस्तिलैर्वा बिल्वप्रसूनैर्मधुरत्रयाक्तैः ।।२६।। राज्यश्रियं विन्दति मन्दभाग्योऽ- प्यमुष्य दास्यं वरवाञ्छितं स्यात्। १वैदुष्यमिष्टञ्च सुतादिलाभो युद्धे जयः सर्व्वसमृद्धिवृद्धिः।।२७।। गंगा आदि पवित्र नदी के जल में उपवास करते हुए खड़ा होकर श्रीराम की आराधना कर एक लाख जप करे और तीन मधुर से युक्त तिल अथवा बिल्वपत्र से दशांश हवन करे, तो मन्दभाग्य को भी श्रीराम की दासता और इच्छित वर मिले। राममाराध्य विधिवदर्चितेऽग्नौ जपेदपि। सूर्यबिम्बेऽपि तोयस्थो जुहुयादिक्षुदण्डकैः।।२८।। राज्यलक्ष्मीमवाप्नोति शरत्काले तपोधन।।२९।। जल में खड़ा होकर सूर्य विम्ब में श्रीराम की विधिवत् आराधना कर जप भी करे और शरद् ऋतु में पूजित अग्नि में ईख के टुकड़े से हवन भी करे तो हे तपोधन! सुतीक्ष्ण! वह राज्यलक्ष्मी प्राप्त करता है। वैशाखे राघवं सूर्य्ये सम्पश्यन्ननिमेक्षणः। निराहारो जपेल्लक्षं मौनी पञ्चाग्निमध्यतः।।३०।। दशांशं कमलैर्हुत्वा सार्वभौमो भवेद् ध्रुवम्। वैशाख मास में निराहार रहकर, मौन धारण कर, पंचाग्नि व्रत करते हुए (चारो ओर अग्नि जलाकर तथा पाँचवें सूर्य को देखते हुए) सूर्य में श्रीराम को अपलक देखते हुए एक लाख मन्त्र का जप करे और उसका दशांश कमल से हवन कर निश्चय सार्वभौम बन जाता है।
- क. यहाँ से दो चरण अनुपलब्ध।
(100) अगस्त्य-संहिता
माघमासे जले स्थित्वा कन्दमूलफलाशिनः¹ ।।131।। जपेल्लक्षं च जुहुयात् पायसेनार्चितेऽनले। दशांशं पुत्रपौत्राय² तच्छेषं प्राशयेत् प्रियाम् ।।132।। श्रीरामसदृशः पुत्रः पौत्रौ वाप्यस्य जायते। माघ मास में कन्द, मूल, फल खाकर व्रत करते हुए जल में खड़ा होकर जो लाख जप करे और पूजित अग्नि में पायस से दशांश हवन करे और पुत्र पौत्र आदि की प्राप्ति के लिए आहुति शेष पत्नी को विधिपूर्वक खिलावे तो श्रीराम के समान पुत्र अथवा पौत्र प्राप्त होता है। बलिष्ठैः शत्रुभिर्मन्त्री परिभूतोऽवमानितः ।।133।। तदा हनहनेत्युक्त्वा नामान्ते वैरिणो जपेत्। ध्यात्वा रघुपतिं क्रुद्धं कालानलमिवापरम्³ ।।134।। आकर्णान्तशराकृष्टकोदण्डभुजमण्डलम् । रणाङ्गणे रिपून् सर्वास्तीक्ष्णमार्गणवृष्टिभिः ।।135।। संहरन्तं महावीरमुग्रमैन्द्ररथस्थितम्⁴। लक्ष्मणादिमहावीरैर्युतं हनुमदादिभिः ।।136।। कोटिकोटिमहावीरैः शैलवृक्षकरोद्यतैः। वेगात् करालहुङ्कारभौँकारमहारवैः ।।137।। नदद्भिरभिधावद्भिः समरे रावणं प्रति। एवं ध्यात्वा निराहारो मारणाय⁵ रिपोः पुनः।38।। जुहुयात् शाल्मलीपुष्पैर्दशांशं मन्त्रसाधकः। अत्यैश्वर्यसमृद्धोऽपि⁶ न शत्रुरवशिष्यते ।।139।। यदि मन्त्र साधक शक्तिशाली शत्रु से हारकर अपमानित हुआ हो तो 'हन हन' यह कहकर शत्रु का नाम अन्त में जोड़कर जप करे। जो श्रीराम क्रोधित हैं, दूसरे कालाग्नि के समान हैं, कान तक खिंचे हुए बाण वाले धनुष हाथ में धारण किए हुए हैं तथा युद्ध-क्षेत्र में तीक्ष्ण बाणों की वर्षा से सभी शत्रुओं का संहार करनेवाले हैं; इन्द्र के रथ पर स्थित हैं। वे लक्ष्मण, हनुमान आदि महान् वीरों से घिरे हुए हैं तथा चट्टानों और वृक्षों को लेकर उठे हाथ वाले, हुंकार करते हुए युद्ध
- घ. फलाशनः। 2. घ. पुत्रपौत्रास्यै। 3. घ. कालाग्निमुव चापरं। 4. घ. महावीरं राममुग्ररथस्थितम्। 5. घ. मरणाय। 6. घ. राज्यैश्वर्य°
पञ्चदशोऽध्यायः (101) में रावण की ओर दौड़ते हुए “भो भौ” शब्द करते हुए करोड़ों करोड़ो महान् वीरों से भी घिरे हुए हैं। ऐसे श्रीराम का ध्यान कर शत्रु को मारने के लिए सेमल के फूल से दशांश हवन करे। इससे अत्यन्त ऐश्वर्य प्राप्त होता है और शत्रु शेष नहीं रहता। वैरिणं रावणं ध्यात्वा तथात्मानं रघूद्वहम्। विधाय पूर्ववत्सर्वमनायासेन मारयेत् ।।40।। येनैव संहृतः¹ कोपात् स यात्येव यमालयम्। रावण के रूप में शत्रु का ध्यान कर स्वयं को श्रीराम मानकर पूर्वोक्त विधि से जप आदि सब कुछ कर सभी शत्रुओं का अनायास मारण करे। क्रोध से जिस पर सन्धान किया जाए वह यमलोक पहुँच जाता है। सीताहरणशोकाब्धिस्तम्भीभूतमचेतनम्² ।।41।। जपेद् रघुपतिं ध्यायन् निराहारो जले वसेत्। दशांशतस्तिलैर्हुत्वा स्तम्भयेच्छत्रुसंहतिम् ।।42।। सीता के अपहरण के कारण शोक रूपी समुद्र में स्तब्ध चित्त वाले श्रीराम का ध्यान करते हुए निराहार रहकर जल में अवस्थित होकर जप करें। उसका दशांश तिल से हवन कर शत्रु के समूह का वह स्तम्भन करे। निधाय वायुबीजान्ते तन्नाम भ्रामयेति च। जपेल्लक्षं निराहारो जुहुयाच्च तिलैरपि ।।43।। रामं ध्यात्वा विषण्णञ्च सीतान्वेषणकातरम्। भ्रामयत्यचिरं साक्षाद्धेमाद्रिमपि वैरिणम् ।।44।। मन्त्र के अन्त में वायु बीज (वं) लगाकर अभीष्ट व्यक्ति का नाम बोलकर ‘भ्रामय’ यह कहे। इस प्रकार निराहार रहते हुए एक लाख जपकर तिल से हवन करें। इस पुरश्चरण में विषादग्रस्त और श्रीसीता की खोज में व्याकुल श्रीराम का ध्यान करे तो वह साक्षात् सुमेरु के समान दृढ़ शत्रु का भी ‘भ्रामण’ करे। समुद्रतीरे लङ्कायां हेमप्राकारसन्निधौ। सुग्रीवादिभिरन्यैश्च देवैर्जांम्बवदादिभिः ।।45।। उपास्यमानं सदसि ध्यात्वा रामं सलक्ष्मणम्।
- घ. तेनायं संहतः। 2. घ. स्तब्धीभूत।
(102) अगस्त्य-संहिता विभीषणायायाचिते प्रसन्नं शरणार्थिने।।46।। वरदं तु जपेल्लक्षं जुहुयात्पङ्कजैरपि। स्वस्थानमानयेच्छीघ्रं राजानमथवा प्रभुम्।।47।। समुद्र के तट पर, लंका में, सोने की अट्टालिका के समक्ष, सुग्रीव जाम्बवान् आदि से घिरे हुए, सभा में आराधित, ऐसे श्रीराम और लक्ष्मण का ध्यान करें, जिनसे विभीषण याचना कर रहे हों और जो शरण चाहनेवालों पर प्रसन्न हों। इस प्रकार ध्यान कर एक लाख जप करें और कमल के फूल से हवन करें, तो अपने निवास स्थान पर राजा अथवा प्रभु का आकर्षण कर लाने में समर्थ हों। निमील्य चक्षुषी स्नेहादुपलाप्य पुनः पुनः। प्रमोदयन्तं सहसा मोदन्तं मैथिलीं प्रियाम्।।48।। रामं ध्यात्वा जपेल्लक्षं हुत्वा रक्ताम्बुजैरपि। सम्मोहयति वेगेन राजानमथवा प्रभुम्।।49।। दोनों आँखें बन्द कर स्नेहपूर्वक बार बार आलाप कर प्रिया सीता को वरवस प्रफुल्लित करते हुए स्वयं भी प्रसन्न श्रीराम का ध्यान कर लाख मन्त्र जपें और लाल कमल से हवन कर शीघ्र ही राजा अथवा प्रभु को सम्मोहित करता है। सुतीक्ष्णमुनिवर्य्यात्र षट्प्रयोगप्रदर्शनम्। सर्वाभीष्टार्थतत्त्वस्य द्योतनाय मनोः पुनः।।50।। नैव कर्त्तव्यमित्येव मुक्तिर्दूरतरा¹ यतः। किञ्च प्रयोगकर्तॄणां परलोको न विद्यते।।51।। हे मुनि सुतीक्ष्ण! यहाँ मैंने सभी अभीष्ट तत्त्वों को स्पष्ट करने के लिए छह प्रयोगों का प्रदर्शन किया फिर कहता हूँ कि इन्हें करना नहीं चाहिए; क्योंकि इससे मुक्ति दूर चली जाती है साथ ही, प्रयोग करनेवालों को परलोक नहीं मिलता। प्रयोगसिद्धिरेतेषां फलं नान्यद् भवत्यपि। नैष्कामानां तु भक्तानां जपहोमादिकर्मसु।।52।। मुक्तिरेव फलं तेषामिह किञ्चिन्न विद्यते। एकैकस्य विधानस्य न कुत्रापि फलद्वयम्।।53।।
- घ. मुक्तिर्भारतरा।
षोडशोऽध्यायः (103) इनके करने से प्रयोगों की ही सिद्धि होती है; अन्य फल उन्हें नहीं मिलता। किन्तु निष्काम भक्तों का जप, होम आदि कर्मों में मुक्ति ही फल होता है; उन्हें इस संसार में कुछ नहीं मिलता क्योंकि एक विधि के कहीं भी दो फल नहीं हो सकते। सुतीक्ष्ण दृश्यते तस्मान्निष्कामो राममर्चयेत्। विद्वान् ब्रह्मास्त्रमादाय शशादौ न विमोचयेत्।¹ नायं मुक्तिपदो मन्त्रो मारणादौ प्रयुज्यताम्।।54।। इसलिए हे सुतीक्ष्ण! इस प्रकार स्पष्ट है कि कामना रहित होकर ही श्रीराम का अर्चन करना चाहिए। विद्वान् ब्रह्मास्त्र लेकर खरगोश पर न छोड़ें। मुक्ति प्रदान करनेवाला षडक्षर राम-मन्त्र का मारण आदि के लिए प्रयोग न करें। इत्यगस्त्यसंहितापरमरहस्ये प्रयोगविधिर्नाम पञ्चदशोऽध्यायः। अथ षोडशोऽध्यायः अगस्त्य उवाच अथ वक्ष्ये विधानानि पौरश्चरणिके विधौ। विना येन न सिद्धः स्यान्मन्त्रो वर्षशतैरपि।।1।। अगस्त्य बोले- अब पुरश्चरण की विधि के विधानों को कहता हूँ, जिनके बिना मन्त्र की सिद्धि सौ वर्षों में भी नहीं होगी। भक्तिश्रद्धेष्टदानानि चिरोपास्ति प्रसादितात्। गुरोर्मन्त्रं वरं लब्ध्वा सर्वाभीष्टप्रदं बुधः।।2।। पूर्ववत् पूजयेन्नित्यं जपेत् नियतव्रतः। षट्सहस्रं सहस्रं वा शतं वाष्टोत्तरं शुचिः।।3।
- घ. ब्रह्मन् ब्रह्मास्त्रमादाय शशादौ न विमोचय।
(104) अगस्त्य-संहिता भक्ति, श्रद्धा और इच्छित दान कर चिरकाल तक की उपासना (सेवा) से प्रसन्न किये हुए गुरु से सभी इच्छाओं की पूर्ति करनेवाला मन्त्रश्रेष्ठ षडक्षर मन्त्र का ग्रहण कर योग्य साधक पूर्वोक्त विधि से नित्य पूजन करें और नियमों का पालन करते हुए पवित्र होकर प्रतिदिन छह हजार, एक हजार अथवा एक सौ आठ बार जप करें। एवमाराधितो रामः परां¹ भक्तिं प्रबोधयेत्। पुरश्चरणकृत्याय पूर्वमेवं विधीयते।।4।। इस प्रकार आराधित श्रीराम परम भक्ति जगाते हैं। पुरश्चरण के लिए इस प्रकार पूर्वकृत्यों का विधान किया जाता है। यथाशक्ति नियम्यान्ते बहिरात्मानमात्मवित्। पुरश्चरणवत्सर्वं कुर्याद् होमं विधानतः²।।5।। ततः संकल्प्य कुर्वीत पुरश्चरणमादरात्। चिरं निरन्तरेणैव नियतात्मा दृढव्रतः।।6।। आत्मज्ञानी यथाशक्ति प्राणायाम कर बाह्य और अन्तःशुद्धि पुरश्चरण की विधि के समान करें। तब विधानपूर्वक हवन करें। इसके बाद संकल्प कर आदर भाव से अधिक दिनों तक लगातार एकाग्र भाव से दृढ़तापूर्वक नियमों का पालन करते हुए पुरश्चरण करें। शैलाग्रे जलमध्ये वा तीरे वा लवणाम्बुधेः। नदीतीरेऽश्वत्थमूले रम्ये बिल्ववनान्तरे।।7।। प्रत्यङ्मुखशिवस्थाने वृषभादिविवर्जिते। अश्वत्थबिल्वतुलसीवने पुष्पान्तरावृते।।8।। गवां गोष्ठेषु तीर्थेषु पुण्यक्षेत्रेषु शस्यते। यह पुरश्चरण पर्वत शिखर पर, जल में, समुद्र के तट पर, नदी के तट पर, पीपल वृक्ष की जड़ में, बेल के रमणीय वन में, पूर्वाभिमुख शिवालय में जहाँ वृषभ आदि न हों, पीपल, बेल तुलसी के वन में जहाँ अन्य फूलों के वृक्ष हों, गाय के घर में, तीर्थों में और पुण्यस्थानों में पुरश्चरण प्रशस्त है। वैदिकाचारयुक्तानां श्रुतानां श्रीमतां सताम्।।9।। स्वकुलस्थानजातानां³ भिक्षाशी चाग्रजन्मनाम्।
- घ. यदा। 2. घ. विधाय तत्। 3. घ. सत्कुलस्थानजातानां।
षोडशोऽध्यायः (105) भुञ्जानो वा हविष्यान्नं शाकं यावकमेव वा ।।10।। पयो मूलं फलं वापि यत्र कुत्रोपलभ्यते ।¹ वैदिक आचार से युक्त, वेदज्ञानी, धनवान्, सज्जन, अपने कुल के निवास स्थान में उत्पन्न, ब्राह्मणों के घर से मिली भिक्षा का भोजन करता हुआ, हविष्यान्न, शाक अथवा यव का सत्तू, दूध, कन्द-मूल, जो अनायास उपलब्ध होते हैं, उनका भोजन करना चाहिए। धूपस्तथाभिधार्यैतत्² संस्कृत्य प्रोक्षणादिभिः ।।11।। वाचयेद् वैदिकैर्मन्त्रैः पुनर्मन्त्रेण मन्त्रवित् ।³ नित्यं नैमित्तिकं काम्यं⁴ कुर्वीतैवाश्रमोदितम् ।।12।। वर्जयेत् काम्यकर्माणि स्वाश्रमाविहितं च यत् । पुरश्चरण के लिए धूप जलाकर प्रोक्षण आदि से संस्कार कर वैदिक मन्त्र से स्वस्तिवाचन करें, तब षडक्षर मन्त्र का जप करें। नित्य, नैमित्तिक और काम्य कर्म जो अपने आश्रम के लिए विहित हो उसे करें। अपने आश्रम के लिए निषिद्ध जो काम्य कर्म हो, उसका त्याग करना चाहिए। लवणं च फलं वापि क्षारं क्षौद्रं रसान्तरम् ।।13।। माषमुद्गमसूराद्यान् कोद्रवांश्चणकानपि । असद्भाषणमन्योन्यं वर्जयेदन्यपूजनम् ।।14।। नमकीन फल, मधु, खारा स्वाद युक्त भोजन एवं अन्य रस, उड़द, मसूर, मूँग, कोदो एवं चना का भक्षण न करें। परस्पर मिथ्या भाषण तथा अन्य देवता की पूजा त्याग दें। तदेव कर्म कुर्वीत तन्मनास्तत्परायणः । अधःशयानः शुद्धात्मा जितक्रोधो जितेन्द्रियः ।।15।। लघुमृष्टहिताशी च विनीतः शान्तचेतनः । दान्तस्त्रिसवनास्नायी मौनी सम्मानितं मतः⁵ ।।16।। भूमि पर शयन करते हुए आत्मा को शुद्ध कर, क्रोध पर काबू पाकर, इन्द्रियों को जीतकर उसी देवता का ध्यान करते हुए, एकाग्रचित्त होकर कम मात्रा में पवित्र और शरीर के लिए पथ्य भोजन करते हुए, विनयी, शान्त चित्त, उद्दान
- घ. यदुपलभ्यते। 2. घ. उपस्तीर्याभिधार्यैतत्। 3. घ. पावयेद् वैष्णवैर्मन्त्रैः पुनर्मूलेन मन्त्रवित्। 4. घ. यद्यत्। 5. घ. सम्मानितान्तरः।
(106) अगस्त्य-संहिता विचारों से ओतप्रोत, तीनों सन्ध्याओं, प्रातः, मध्याह्न एवं सायं में स्नान करनेवाले, मौन धारण करनेवाले तथा सम्मानित साधक पुरश्चरण के योग्य माने जाते हैं। स्त्रीशूद्रपति तव्रात्यनाग्निकोच्छिष्टभाषणम् । अन्यत्संभाषितं¹ जिह्मभाषणं परिवर्जयेत् ।। 17 ।। स्त्री, मूर्ख, पतित, कर्मच्युत, नास्तिक के साथ तथा जूठे मुँह से संभाषण का त्याग करें, अप्रत्यक्ष व्यक्ति के प्रति भाषण, कुटिल भाषण का त्याग करें। सभ्यैरपि न भाषेत जपहोमार्चनादिषु । यदि² भाषेत तत्काले सभ्यैः प्रस्तुतसाधकम् ।।18।। अन्यथानुष्ठितं³ सर्वं भवत्येव निरर्थकम्। जप, होम, अर्चना आदि के बीच सभ्यों के साथ भी बातचीत न करें। यदि इस बीच उपस्थित कार्य का साधक भाषण करते हैं, तो सभी अनुष्ठान व्यर्थ हो जाते हैं। वाङ्मनःकर्मभिर्नित्यमस्पृहो वनितादिषु ।।19।। वर्जयेद् गीतकाव्यादिश्रवणं नृत्यदर्शनम् । ताम्बूलं गन्धलेपञ्च पुष्पधारणमेव च।।20।। मैथुनं तत्कथालापं तद्गोष्ठीरपि वर्जयेत्। कौटिल्यं क्षीरमभ्यङ्गमनिवेदितभोजनम् ।।21।। असंकल्पितकृत्यं च वर्जयेन्मर्दनादिकम्। त्यजेदुष्णोदकस्नानं सुगन्धामलकादिकम् ।।22।। वाणी, मन एवं कर्म से स्त्री आदि में अनासक्त रहें। गीत, काव्य आदि सुनना, नाच देखना, पान खाना, सुगन्धित लेप लगाना, फूल धारण करना, मैथुन, उसकी कथा, आलाप, शृंगारिक गोष्ठी, आदि भी छोड़ दें। कुटिलता, दुग्धपान, तेल मलना, देवता को समर्पित किए बिना भोजन, संकल्प के बिना कोई कर्म और मालिश आदि छोड़ दे। गर्म दूध तथा सुगन्धा, आँवला आदि से स्नान करना भी छोड़ दें। शिरोरुहं⁴ पञ्चगव्येन पावयेद् बहिरन्तरम्। स्नायाच्च पञ्चगव्येन केवलामलकेन वा।।23।।
- घ. असत्यभाषणं। 2. घ. यद्यत्। 3. घ. अन्यथाभाषितं।4. घं. शिरोहे, क. शिरोगं।
षोडशोऽध्यायः (107)
श्रुतिस्मृतिपुराणोक्तमन्त्रैः स्नायादनन्तरम्। अनुतिष्ठेदनुष्ठेयं शुचिव्रततपोऽनिशम्।।२४।। शिर के बाल को पंचगव्य से भीतर बाहर पवित्र करें। पंचगव्य से अथवा केवल आँवले के रस से स्नान करें। इसके बाद वेद, स्मृति, पुराण में कहे गये मन्त्र से स्नान करें। पवित्रता और नियम से दिन रात तप करते हुए अनुष्ठान करें। सितैकविधं हेमन्ते शाल्यन्नं स्वीयसञ्चितम्¹। आशुद्धानिर्हतं प्राद्यादनुतिलमाहृतं च यत्²।।२५।। दधिक्षीरघृतं गव्यं ऐक्षवं गुडवर्जितम्। तिलाश्चैव सिता मुद्गा कन्दः केमुकवर्जितम्।।२६।। नारिकेलफलं वापि कदली लवली तथा। आम्रामामलकं चैव पनसार्द्रं हरीतकी।।२७।। व्रतान्तरप्रशस्तं च हविष्यं मन्यते बुधः। अवैष्णवमसभ्यं वै यत्प्रशस्तं व्रतान्तरे।।२८।। त्याज्यमेवात्र तत्सर्वं यदिच्छेत् सिद्धिमात्मनः।³ एक एक कण करके स्वयं संचित किया हुआ श्वेत रंग के, एक प्रकार के अगहनी धान का चावल, जो सर्वथा शुद्ध हो और पैरों से मसला न गया हो, भोजन करें। गाय का दही, दूध एवं घी, गुड़ को छोड़कर ईख से प्राप्त पदार्थ, सफेद तिल, उजला मूँग, केमुक अर्थात् अरुइ अथवा पेंची से भिन्न कन्द, नारियल का फल, केला, लवली, आम, आँवला, कटहल, आदि, हर्रे तथा अन्य व्रतों में जो भोज्य पदार्थ प्रशस्त माने गये हैं वे हविष्यान्न हैं। किन्तु जो विष्णु को समर्पित न किये गये हों, भले लोग न खाते हों वे हविष्यान्न नहीं हैं। यदि अपनी सिद्धि चाहते हों, तो ऊपर कही गयी त्याज्य वस्तुओं का त्याग करें। जपे तु⁴ वैष्णवं कर्म स्थिरधीः कर्तुमास्थितः। जपेच्च नियतो नित्यं त्रिकालं पुरुषोत्तमम्।।२९।। जप में विष्णु-परम्परा के कर्म करने के लिए स्थिरचित्त होकर बैठकर प्रतिदिन, नियमपूर्वक पुरुषोत्तम श्रीराम का जप प्रातः, मध्याह्न और सन्ध्या में करें। क्षमाहिंसादयाशीलो गृहीतस्थिरनिश्चयः।।३०।। अर्चयन् राममव्यग्रो⁵ यावत् षडलक्षमादितः।⁶
- घ. स्वीयसम्भूतम्। 2. घ. अशूद्रावह्तं प्राद्यादन्यतो नाहृतं च यत्। 3. घ. सिद्धिमुत्तमाम्। 4. घ. यजेत। 5. घ. अर्चयन्नेव चाव्यग्रो। 6. घ. षड़लक्षमादरात्।