भारतकोश
अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary

महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा

DevanagariSanskritpublished337 पृष्ठ

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पृष्ठ 168

षोडशोऽध्यायः (107)

श्रुतिस्मृतिपुराणोक्तमन्त्रैः स्नायादनन्तरम्। अनुतिष्ठेदनुष्ठेयं शुचिव्रततपोऽनिशम्।।२४।। शिर के बाल को पंचगव्य से भीतर बाहर पवित्र करें। पंचगव्य से अथवा केवल आँवले के रस से स्नान करें। इसके बाद वेद, स्मृति, पुराण में कहे गये मन्त्र से स्नान करें। पवित्रता और नियम से दिन रात तप करते हुए अनुष्ठान करें। सितैकविधं हेमन्ते शाल्यन्नं स्वीयसञ्चितम्¹। आशुद्धानिर्हतं प्राद्यादनुतिलमाहृतं च यत्²।।२५।। दधिक्षीरघृतं गव्यं ऐक्षवं गुडवर्जितम्। तिलाश्चैव सिता मुद्गा कन्दः केमुकवर्जितम्।।२६।। नारिकेलफलं वापि कदली लवली तथा। आम्रामामलकं चैव पनसार्द्रं हरीतकी।।२७।। व्रतान्तरप्रशस्तं च हविष्यं मन्यते बुधः। अवैष्णवमसभ्यं वै यत्प्रशस्तं व्रतान्तरे।।२८।। त्याज्यमेवात्र तत्सर्वं यदिच्छेत् सिद्धिमात्मनः।³ एक एक कण करके स्वयं संचित किया हुआ श्वेत रंग के, एक प्रकार के अगहनी धान का चावल, जो सर्वथा शुद्ध हो और पैरों से मसला न गया हो, भोजन करें। गाय का दही, दूध एवं घी, गुड़ को छोड़कर ईख से प्राप्त पदार्थ, सफेद तिल, उजला मूँग, केमुक अर्थात् अरुइ अथवा पेंची से भिन्न कन्द, नारियल का फल, केला, लवली, आम, आँवला, कटहल, आदि, हर्रे तथा अन्य व्रतों में जो भोज्य पदार्थ प्रशस्त माने गये हैं वे हविष्यान्न हैं। किन्तु जो विष्णु को समर्पित न किये गये हों, भले लोग न खाते हों वे हविष्यान्न नहीं हैं। यदि अपनी सिद्धि चाहते हों, तो ऊपर कही गयी त्याज्य वस्तुओं का त्याग करें। जपे तु⁴ वैष्णवं कर्म स्थिरधीः कर्तुमास्थितः। जपेच्च नियतो नित्यं त्रिकालं पुरुषोत्तमम्।।२९।। जप में विष्णु-परम्परा के कर्म करने के लिए स्थिरचित्त होकर बैठकर प्रतिदिन, नियमपूर्वक पुरुषोत्तम श्रीराम का जप प्रातः, मध्याह्न और सन्ध्या में करें। क्षमाहिंसादयाशीलो गृहीतस्थिरनिश्चयः।।३०।। अर्चयन् राममव्यग्रो⁵ यावत् षडलक्षमादितः।⁶

  1. घ. स्वीयसम्भूतम्। 2. घ. अशूद्रावह्तं प्राद्यादन्यतो नाहृतं च यत्। 3. घ. सिद्धिमुत्तमाम्। 4. घ. यजेत। 5. घ. अर्चयन्नेव चाव्यग्रो। 6. घ. षड़लक्षमादरात्।