अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)
Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary
महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा
पृष्ठ 167, कुल 337 में से
संदर्भ में पढ़ें(106) अगस्त्य-संहिता विचारों से ओतप्रोत, तीनों सन्ध्याओं, प्रातः, मध्याह्न एवं सायं में स्नान करनेवाले, मौन धारण करनेवाले तथा सम्मानित साधक पुरश्चरण के योग्य माने जाते हैं। स्त्रीशूद्रपति तव्रात्यनाग्निकोच्छिष्टभाषणम् । अन्यत्संभाषितं¹ जिह्मभाषणं परिवर्जयेत् ।। 17 ।। स्त्री, मूर्ख, पतित, कर्मच्युत, नास्तिक के साथ तथा जूठे मुँह से संभाषण का त्याग करें, अप्रत्यक्ष व्यक्ति के प्रति भाषण, कुटिल भाषण का त्याग करें। सभ्यैरपि न भाषेत जपहोमार्चनादिषु । यदि² भाषेत तत्काले सभ्यैः प्रस्तुतसाधकम् ।।18।। अन्यथानुष्ठितं³ सर्वं भवत्येव निरर्थकम्। जप, होम, अर्चना आदि के बीच सभ्यों के साथ भी बातचीत न करें। यदि इस बीच उपस्थित कार्य का साधक भाषण करते हैं, तो सभी अनुष्ठान व्यर्थ हो जाते हैं। वाङ्मनःकर्मभिर्नित्यमस्पृहो वनितादिषु ।।19।। वर्जयेद् गीतकाव्यादिश्रवणं नृत्यदर्शनम् । ताम्बूलं गन्धलेपञ्च पुष्पधारणमेव च।।20।। मैथुनं तत्कथालापं तद्गोष्ठीरपि वर्जयेत्। कौटिल्यं क्षीरमभ्यङ्गमनिवेदितभोजनम् ।।21।। असंकल्पितकृत्यं च वर्जयेन्मर्दनादिकम्। त्यजेदुष्णोदकस्नानं सुगन्धामलकादिकम् ।।22।। वाणी, मन एवं कर्म से स्त्री आदि में अनासक्त रहें। गीत, काव्य आदि सुनना, नाच देखना, पान खाना, सुगन्धित लेप लगाना, फूल धारण करना, मैथुन, उसकी कथा, आलाप, शृंगारिक गोष्ठी, आदि भी छोड़ दें। कुटिलता, दुग्धपान, तेल मलना, देवता को समर्पित किए बिना भोजन, संकल्प के बिना कोई कर्म और मालिश आदि छोड़ दे। गर्म दूध तथा सुगन्धा, आँवला आदि से स्नान करना भी छोड़ दें। शिरोरुहं⁴ पञ्चगव्येन पावयेद् बहिरन्तरम्। स्नायाच्च पञ्चगव्येन केवलामलकेन वा।।23।।
- घ. असत्यभाषणं। 2. घ. यद्यत्। 3. घ. अन्यथाभाषितं।4. घं. शिरोहे, क. शिरोगं।