भारतकोश
अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary

महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा

DevanagariSanskritpublished337 पृष्ठ

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पृष्ठ 169

(108) अगस्त्य-संहिता तर्पयेच्च विधानेन दशांशं शुद्धवारिणा।।३१।। पुष्पाक्षतादियुक्तेन जले संपूज्य पूर्ववत्। ततो बिल्वफलैः पुष्पैः पत्रैरपि हुताशने।।३२।। राममाराध्य चावाह्य पूर्ववज्जुहुयात् स्वयम्। मधुरत्रययुक्तैश्च पद्मैर्वा पायसेन वा।।३३।। तिलैर्वाऽन्यन्तरैरेषां ब्राह्मणान् भोजयेत् ततः। क्षमाशील, अहिंसाव्रती और दयालु होकर दृढ़निश्चयी साधक आरम्भ से छह लाख मन्त्र जप सम्पन्न होने तक व्याकुलता का त्याग कर श्रीराम की अर्चना करता हुआ उसका दशांश तर्पण शुद्ध जल से विधानपूर्वक करे। पूर्वोक्त विधि से जल में (कलश पर) पुष्प, अक्षत आदि से श्रीराम की पूजा करे। तब अग्नि में आवाहन कर, श्रीराम की आराधना कर, बेल का फल, पुष्प और पत्र से पूजा कर तीन मधुरों से युक्त कमल फूल, पायस, तिल अथवा अन्य सामग्री से पूर्वोक्त विधि से हवन करें। तब ब्राह्मण भोजन कराये। पूजा त्रैकालिकी नित्यं जपस्तर्पणमेव च।।३४।। होमो ब्राह्मणभुक्तिश्च पुरश्चरणमुच्यते। गुरोर्लब्धस्य मन्त्रस्य प्रसन्नाच्च यथाविधि।।३५।। पञ्चाङ्गोपासनं सिद्धेः पुरश्चैतदधीयते। निष्कामानामेनेनैव साक्षात्कारो भवेदिति¹।।३६।। अथ सिद्धिः सकामानां सर्वं तन्निष्फलं भवेत्। त्रिकाल पूजन, नित्य जप एवं तर्पण, हवन एवं ब्राह्मण भोजन को पुरश्चरण कहते हैं। सिद्ध एवं प्रसन्न गुरु से विधानपूर्वक प्राप्त मन्त्र की पंचांग उपासना को पुरश्चरण कहते हैं। निष्काम साधक का ईश्वर से साक्षात्कार केवल इतना ही करने से हो सकता है। सकाम साधकों को कामनाएँ सिद्ध होती है, किन्तु ईश्वर से साक्षात्कार निष्फल हो जाता है। पञ्चाङ्गमेतत् कुर्वीत यः पुरश्चरणं बुधः।।३७।। सर्वं विजयेते लोके विद्यैश्वर्यसुतादिभिः। दाता भोक्ता वरिष्ठोऽयं² जायते ज्ञातिषु स्वयम्।।३८।। व्याख्याता लुप्तशास्त्रस्य³ श्रुतानामेव⁴ भूतले।

  1. घ. भवेदपि। 2. घ. बलिष्ठोऽयं। 3. घ. श्रुतिशास्त्राणां। 4. घ. श्रुतानामपि।