भारतकोश
अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary

महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा

DevanagariSanskritpublished337 पृष्ठ

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पृष्ठ 170

षोडशोऽध्यायः (109) चिरायुर्भाग्यवान् पुत्रपौत्रसौभाग्यवान् सुखी ।।39 ।। निधानमय एव स्याद् धर्मस्य यशसः श्रियः। यदिच्छति लभेदेतन्मनसापि तपोधन ।।40 ।। असाध्यमपि देवानां द्वीपान्तरगतं च यत्। पञ्चाङ्गोपासनं कृत्वा यद्यदिष्टं तदाप्नुयात् ।।41 ।। जो सकाम ज्ञानी साधक पंचांग पुरश्चरण करते हैं, वे विद्या, ऐश्वर्य पुत्र आदि सभी वस्तुओं इस लोक में विजयी होते हैं; अपने परिचितों के बीच दाताओं और भोग करनेवालों में श्रेष्ठ होते हैं; लुप्त शास्त्रों तथा वेदों के व्याख्याता, दीर्घायु, भाग्यवान्, पुत्र-पौत्रवान् सौभाग्यशाली तथा सुखी होते हैं; धर्म, यश, लक्ष्मी के भण्डार बन जाते हैं। वे मन में भी जो इच्छा करते हैं वह भले दूसरे द्वीप में भी क्यों न हो; देवताओं के लिए भी दुर्लभ क्यों न हो उन्हें प्राप्त करते हैं। पंचांग उपासना कर जो जो इच्छा हो उसे प्राप्त करें। आदावन्ते च मध्ये च ब्राह्मणान् भोजयेद् बहून्। दिने दिने यथाशक्त्या राममुद्दिश्य भक्तितः ।। 42 ।। दधिक्षीरघृतापूपव्यञ्जनैस्तृप्तिहेतुभिः । ऐक्षवैरपि पानीयैर्नारिकेलफलैरपि ।। 43 ।। सुपक्वकदलीसारपनसाम्रतिलैरपि । अन्यैश्च षड्रसोपेतैः पदार्थैः भोजयेद् द्विजान् ।। 44 ।। सुभोजितेषु विप्रेषु तत्साङ्गं सफलं भवेत्। यो विप्रं भोजयेन्नित्यं राममुद्दिश्य भक्तितः ।। 45 ।। दरिद्रो मन्दभाग्यो वा कुले तस्य न जायते। आदि, अन्त और मध्य में अथवा प्रतिदिन श्रीराम को समर्पित कर भक्ति-भाव से अपनी शक्ति के अनुसार अनेक ब्राह्मण-भोजन कराएँ। तृप्त करनेवाले दही, दूध, घी, पुआ, व्यंजन, ईख से प्राप्त रस, नारिकेल का जल आदि पेय पदार्थ एवं फल जैसे पका केला, सार (मलाई), कटहल, आम आदि, तिल आदि अन्न तथा अन्य छह रसों से युक्त पदार्थों से ब्राह्मणों को भोजन कराएँ। ब्राह्मण यदि भलीभाँति भोजन कर लें, तो अंगों के साथ पुरश्चरण सफल हो Rarest Archiver