अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)
Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary
महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा
पृष्ठ 171, कुल 337 में से
संदर्भ में पढ़ें(110) अगस्त्य-संहिता जाता है। जो प्रतिदिन श्रीराम के नाम पर ब्राह्मण भोजन कराते हैं, उसके कुल में दरिद्र अथवा मंदभाग्य का व्यक्ति कोई नहीं होता। उपोष्य द्वादशीष्वेकां द्विजं यो भोजयेद् द्विजः।।46।। गन्धैः पुष्पाक्षतैर्भक्त्या राममाराध्य भक्तितः। नैव तत्कुलजातानां दुःखं दारिद्र्यमेव च।।47।। एक भी द्वादशी तिथियों में भी व्रत कर जो द्विज चन्दन, फूल और अक्षत से भक्तिपूर्वक श्रीराम की आराधना कर द्विजों को भोजन कराते हैं, उनके कुल में जन्म लेनेवालों को इस संसार में दुःख और दरिद्रता नहीं होती है। संक्रान्तौ पुण्ययोगे च¹ पर्वस्वपि कदाचन। रामं यो² भोजयेद् विप्रं स वै नरपतिर्भवेत्।।48।। संक्रान्ति में, अन्य पुण्यमय योग में या पर्वों (अमावस्या, पूर्णिमा, अष्टमी तथा चतुर्दशी) में श्रीराम के स्वरूप विप्रों को जो भोजन कराते हैं, वे राजा बन जाते हैं। यः पुरश्चरणं कुर्यात् सर्वेषां स विशिष्यते। विद्यया पुत्रपौत्रैश्च धनधान्यादिसंपदा।।49।। जो पुरश्चरण करते हैं, वे सबमें विद्या, पुत्र, पौत्रादि तथा धन-धान्य, सम्पत्ति से सभी लोगों में विशिष्ट बन जाते हैं। संसारे दुःखभूयिष्ठे य इच्छेत् सुखमात्मनः। पञ्चाङ्गोपासेनेनैव रामं भजत भक्तितः।।50।। संसार अनेक प्रकार के दुःखों से परिपूर्ण है; इसमें जो अपना सुख चाहते हैं वे पंचांग उपासना कर श्रीराम की आराधना करें। पञ्चाङ्गोपासनं भक्त्या पुरश्चरणमुच्यते। एतद्धि विदुषां श्रेष्ठं संसारोच्छेदकारणम्।।51।। नानेन सदृशो धर्मो नानेन सदृशं तपः। नानेन सदृशः किञ्चिदिष्टार्थस्य तपोधन।।52।। हे विद्वानों में श्रेष्ठ सुतीक्ष्ण! भक्तिपूर्वक पंचांग उपासना को पुरश्चरण कहते हैं। यह संसार में पुनर्जन्म का नाश करता है। इसके समान कोई धर्म, तपस्या और अभीष्ट सिद्धि का दूसरा कोई मार्ग नहीं है।
- घ. संक्रान्त्यां पुण्ययोगेषु। 2. घ. कामं च।