अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)
Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary
महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंषोडशोऽध्यायः (111) यदि होमे त्वशक्तः स्यात् पूजायां तर्पणेऽपि वा।।52।। तावत्संख्याजपेनैव ब्राह्मणाभ्यसनेन¹ च। भवेदङ्गद्वयेनैव पुरश्चरणमार्य वै।।53।। हे आर्य! यदि हवन, पूजा और तर्पण करने की शक्ति न हो, तो उतनी संख्या में जप एवं ब्राह्मण भोजन- इन दो अंगों से ही पुरश्चरण पूरा हो जाता है। यद्यदङ्गं विहायैतत्² संख्याद्विगुणो जपः। कर्तव्यः साङ्गसिद्ध्यर्थं तदशक्तेन भक्तितः।।54।। न चेदङ्गं विहायैतत्³ ततश्चेष्टमवाप्नुयात्।।55।। यदि शक्ति के अभाव में अंगों को छोड़कर पुरश्चरण किया जाता है, तो अंगों की भी सिद्धि के लिए भक्ति-भाव से जप की संख्या दोगुनी होनी चाहिए। यदि अशक्त भक्तिपूर्वक अंगों को छोड़कर भी पुरश्चरण करें, तब भी इच्छित वस्तुओं की प्राप्ति होती है। अङ्गहीनं भवेद्यद्यत् कर्म नेष्टार्थसाधकम्। सर्वथा भोजयेद् विप्रान् कृतसाङ्गत्वसिद्धये।।56।। अंगहीन कर्म जो जो होते हैं, उनसे इच्छित की सिद्धि नहीं होती है; अतः सांगत्व की सिद्धि के लिए ब्राह्मण भोजन कराना चाहिए। विप्राराधनमात्रेण व्यङ्गं साङ्गं तदाप्नुयात्। न्यूनातिरिक्तकर्माणि न फलन्ति मनोरथान्।।57।। केवल ब्राह्मणों की आराधना करने से अंगहीन भी अंगसहित के समान फलदायी होता है, अन्यथा कमी-बेशी जिस कर्म में हुआ हो, उससे मनोरथ पूरे नहीं होते। तेष्वेव यदि पूज्येष्वपर्याप्तानि सन्ति च। अतो यत्नेन विदुषो भोजयेत् सर्वकर्मसु।।58।। विप्रों की आराधना कर लेने पर जो अपर्याप्त अर्थात् अंगहीन पुरश्चरण कर्म हैं, वे भी फलदायी होते हैं; अतः सभी कर्मों में विद्वानों को भोजन कराना चाहिए।
- घ. ब्राह्मणाराधनेन च। 2. घ. विहीयेत। 3. घ. विहीयेत। Rarest Archiver