अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)
Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary
महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा
पृष्ठ 173, कुल 337 में से
संदर्भ में पढ़ें(112) अगस्त्य-संहिता
यानि यान्यपि¹ कर्माणि हीयते द्विजभोजनैः। निरर्थकानि तानि स्युः पथि बीजाङ्कुरा इव ।।159।। जो कोई कर्म ब्राह्मण-भोजन के अभाव में च्युत हो जाते हैं, वे रास्ते पर गिरे बीज के अंकुर के समान निरर्थक हो जाते हैं। तस्यैव स्तुतिलक्षेषु शस्यते बहिरर्चनम्। रामाराधनकोटिभ्यः स ध्यानजप उत्तमः ।।160।। लाखों स्तुतियों के द्वारा की गयी अर्चनाओ में बाह्यार्चन प्रशस्त है और श्रीराम की आराधना की अनेक श्रेणियों में ध्यान के साथ जप उत्तम है। मन्त्रार्थलोचनात्मायं स्वयमेवेष्टसाधकः। योऽर्चयेद् बहुशो² नित्यं रामं तेष्वेव चिन्तयन् ।।61।। इह भुक्तिश्च मुक्तिश्च भवेत्तस्य न संशयः ।।62।। मन्त्रार्थ रूपी आँखों वाला, इष्टसाधक, स्वयं ही, अनेक प्रकार से, प्रतिदिन, मन्त्रों में हीं श्रीराम की सत्ता का चिन्तन करते हुए, आराधना करते हैं, उन्हें संसार में भोग और जीवनान्त में मोक्ष उन्हें मिलता है, इसमें सन्देह नहीं। इत्यगस्त्यसंहितायां परमरहस्ये पुरश्चरणविधिर्नाम षोडशोऽध्यायः। अथ सप्तदशोऽध्यायः अगस्त्य उवाच अथाभिषेकं वक्ष्यामि दीक्षाविधिमनुत्तमम्। उपासनाशतैनापि विना येन न सिद्ध्यति ।।1।। अगस्त्य बोले- 'अब मैं दीक्षा विधान के अन्तर्गत अभिषेक की विधि बतलाता हूँ, जिसके विना सैकड़ो उपासना करने से भी प्रयोजन की सिद्धि नहीं होती है।'
- घ. यान्यनल्पानि। 2. घ. विदुषो।